Monday, August 19, 2024

उत्तराखंड को संविधान की पांचवी अनुसूची में क्यों शामिल होना चाइए।

 उत्तराखंड को संविधान की पाँचवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग के पीछे कुछ महत्वपूर्ण तर्क हैं, जो इस राज्य के जनजातीय और पर्वतीय क्षेत्रों की विशिष्ट चुनौतियों और आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए उठाए जा रहे हैं। यहाँ कुछ प्रमुख कारण दिए गए हैं कि क्यों उत्तराखंड को पाँचवीं अनुसूची में शामिल किया जाना चाहिए:


### 1. **जनजातीय आबादी का संरक्षण और विकास:**

उत्तराखंड में भोटिया, थारू, बुक्सा, और जौनसारी जैसी कई जनजातियाँ निवास करती हैं। ये जनजातियाँ अपनी विशिष्ट संस्कृति, परंपराओं, और जीवनशैली के लिए जानी जाती हैं, लेकिन आधुनिक विकास और बाहरी प्रभावों के कारण उनके अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है। पाँचवीं अनुसूची में शामिल होने से इन जनजातियों के भूमि और संसाधनों की रक्षा की जा सकेगी, और उनकी संस्कृति और जीवनशैली को संरक्षित रखने में मदद मिलेगी।


### 2. **भौगोलिक और आर्थिक चुनौतियाँ:**

उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में विकासात्मक गतिविधियाँ अन्य राज्यों की तुलना में अधिक चुनौतीपूर्ण हैं। यहां की कठिन भौगोलिक परिस्थितियाँ, जैसे कि कठिनाई से पहुंच सकने वाले पहाड़ी क्षेत्र, आर्थिक पिछड़ेपन का कारण बनती हैं। पाँचवीं अनुसूची के तहत विशेष प्रावधान लागू कर इन क्षेत्रों में सतत विकास सुनिश्चित किया जा सकता है।


### 3. **भूमि और संसाधनों की सुरक्षा:**

उत्तराखंड में भूमि और प्राकृतिक संसाधनों पर बाहरी व्यक्तियों और कंपनियों का हस्तक्षेप बढ़ता जा रहा है। इससे स्थानीय जनजातियों की भूमि और संसाधनों के स्वामित्व पर खतरा उत्पन्न हो गया है। पाँचवीं अनुसूची में शामिल होने से राज्यपाल को ऐसे मामलों में हस्तक्षेप करने का अधिकार मिल जाएगा, जिससे बाहरी हस्तक्षेप को रोका जा सकेगा और जनजातीय समुदायों के अधिकारों की रक्षा हो सकेगी।


### 4. **संस्कृति और परंपराओं का संरक्षण:**

पाँचवीं अनुसूची में शामिल होने से उत्तराखंड की जनजातीय संस्कृति, परंपराओं और भाषा का संरक्षण और संवर्धन संभव हो सकेगा। इससे न केवल जनजातीय समुदायों को अपनी पहचान बनाए रखने में मदद मिलेगी, बल्कि उन्हें विकास के अवसर भी प्रदान किए जा सकेंगे जो उनकी सांस्कृतिक धरोहर के अनुकूल हो।


### 5. **विकासात्मक योजनाओं में प्राथमिकता:**

पाँचवीं अनुसूची के अंतर्गत आने वाले क्षेत्रों में विकासात्मक योजनाओं और परियोजनाओं को प्राथमिकता दी जाती है। इससे उत्तराखंड के जनजातीय और पहाड़ी क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे के विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और रोजगार के अवसरों को बढ़ावा मिलेगा।


### 6. **स्वशासन और निर्णय लेने में भागीदारी:**

उत्तराखंड को पाँचवीं अनुसूची में शामिल करने से यहाँ के जनजातीय समुदायों को अधिक स्वशासन और निर्णय लेने की क्षमता मिलेगी। इससे जनजातीय समुदायों को अपने क्षेत्र के विकास में सक्रिय भागीदारी करने का अवसर मिलेगा और उनकी वास्तविक समस्याओं का समाधान हो सकेगा।


### निष्कर्ष


उत्तराखंड को संविधान की पाँचवीं अनुसूची में शामिल करने से न केवल राज्य की जनजातीय आबादी की सुरक्षा और विकास सुनिश्चित होगा, बल्कि राज्य के समग्र विकास में भी तेजी आएगी। यह कदम न केवल जनजातीय अधिकारों की रक्षा करेगा, बल्कि उत्तराखंड के पहाड़ी और दूरदराज के क्षेत्रों में सतत और समावेशी विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल साबित होगा।

Saturday, August 17, 2024

प्रेस क्लब और प्रेस एसोसिएशन में अंतर

 प्रेस क्लब और प्रेस एसोसिएशन दोनों ही पत्रकारिता और मीडिया से जुड़े संगठन हैं, लेकिन उनके उद्देश्यों, कार्यों, और संरचनाओं में कुछ महत्वपूर्ण अंतर होते हैं। यहां उनके बीच के प्रमुख अंतर दिए जा रहे हैं:


### 1. **उद्देश्य और भूमिका**:

   - **प्रेस क्लब**: 

     - प्रेस क्लब का मुख्य उद्देश्य पत्रकारों के लिए एक सामाजिक और पेशेवर मंच प्रदान करना है। यह पत्रकारों के बीच नेटवर्किंग, सहयोग, और समर्थन की भावना को बढ़ावा देता है। 

     - प्रेस क्लब का वातावरण अक्सर अनौपचारिक होता है और इसमें सामाजिक, सांस्कृतिक, और पेशेवर गतिविधियों का आयोजन होता है, जैसे कि सेमिनार, कार्यशालाएँ, और सांस्कृतिक कार्यक्रम।


   - **प्रेस एसोसिएशन**:

     - प्रेस एसोसिएशन एक पेशेवर संगठन होता है जो पत्रकारों और मीडिया कर्मियों के अधिकारों और हितों की रक्षा करने के उद्देश्य से काम करता है।

     - इसका ध्यान मुख्य रूप से प्रेस की स्वतंत्रता, पत्रकारों की सुरक्षा, और उनके अधिकारों की रक्षा पर होता है। प्रेस एसोसिएशन आमतौर पर पत्रकारों की पेशेवर जिम्मेदारियों, नैतिकता, और कामकाजी परिस्थितियों पर ध्यान केंद्रित करती है।


### 2. **सदस्यता**:

   - **प्रेस क्लब**: 

     - प्रेस क्लब की सदस्यता पत्रकारों, संपादकों, और मीडिया कर्मियों को प्रदान की जाती है। इसके अलावा, कई प्रेस क्लबों में सम्मानित गैर-पत्रकारों को भी सदस्यता दी जा सकती है। सदस्यता का उद्देश्य पेशेवर और सामाजिक नेटवर्किंग के लिए अवसर प्रदान करना है।

  

   - **प्रेस एसोसिएशन**:

     - प्रेस एसोसिएशन में सदस्यता विशेष रूप से पत्रकारों, संवाददाताओं, और मीडिया के पेशेवरों तक सीमित होती है। इसमें उन लोगों को शामिल किया जाता है जो सक्रिय रूप से मीडिया उद्योग में कार्यरत हैं और संगठन के उद्देश्यों का समर्थन करते हैं।


### 3. **गतिविधियाँ और कार्यक्रम**:

   - **प्रेस क्लब**: 

     - प्रेस क्लब आमतौर पर सामाजिक, सांस्कृतिक, और पेशेवर विकास के कार्यक्रम आयोजित करता है। यह पत्रकारों के बीच संबंधों को मजबूत करने और उनके सामाजिक जीवन को बढ़ावा देने पर ध्यान केंद्रित करता है।

     - इसमें खेलकूद, संगीत, और अन्य मनोरंजन गतिविधियों का आयोजन भी किया जा सकता है।

  

   - **प्रेस एसोसिएशन**:

     - प्रेस एसोसिएशन का ध्यान मुख्य रूप से पेशेवर और कानूनी मुद्दों पर होता है। यह प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा, पत्रकारों के अधिकारों की वकालत, और उनके पेशेवर नैतिकता को बढ़ावा देने के लिए सेमिनार, प्रशिक्षण, और कानूनी सहायता कार्यक्रम आयोजित करता है।

     - यह संगठन आमतौर पर पत्रकारों के लिए सुरक्षा प्रोटोकॉल और मानकों को भी विकसित करता है।


### 4. **संरचना और संगठनात्मक दृष्टिकोण**:

   - **प्रेस क्लब**:

     - प्रेस क्लब अधिक अनौपचारिक हो सकता है और इसका ध्यान पत्रकारों के बीच सामुदायिक और सामाजिक जुड़ाव पर रहता है। इसकी संरचना में प्रबंधन समितियां हो सकती हैं, जो क्लब के संचालन और गतिविधियों का प्रबंधन करती हैं।

  

   - **प्रेस एसोसिएशन**:

     - प्रेस एसोसिएशन अधिक औपचारिक संगठन होता है, जिसमें पत्रकारों के अधिकारों और हितों की रक्षा करने के लिए कठोर संरचना और नियम होते हैं। इसमें पदाधिकारी होते हैं जो संगठन के उद्देश्यों को आगे बढ़ाने के लिए कार्य करते हैं, जैसे कि अध्यक्ष, महासचिव, और अन्य सदस्य।


### 5. **समाज और मीडिया पर प्रभाव**:

   - **प्रेस क्लब**:

     - प्रेस क्लब समाज और मीडिया में सामुदायिक भावना को बढ़ावा देने पर ध्यान केंद्रित करता है। यह पत्रकारों के लिए एक सामाजिक मंच है, जहाँ वे अपने पेशेवर जीवन के अलावा अपने व्यक्तिगत जीवन में भी मेल-जोल कर सकते हैं।

  

   - **प्रेस एसोसिएशन**:

     - प्रेस एसोसिएशन का समाज और मीडिया पर गहरा प्रभाव होता है, क्योंकि यह पत्रकारिता के मानकों को बढ़ावा देने और पत्रकारों के अधिकारों की रक्षा करने का कार्य करता है। यह संगठन मीडिया में नैतिकता और जिम्मेदारी को बढ़ावा देता है।


संक्षेप में, प्रेस क्लब मुख्य रूप से पत्रकारों के लिए एक सामाजिक और पेशेवर नेटवर्किंग मंच है, जबकि प्रेस एसोसिएशन एक पेशेवर संगठन है जो पत्रकारों के अधिकारों, सुरक्षा, और प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए काम करता है।

प्रेस क्लब का महत्व और उसकी उपलब्धियाँ पत्रकारिता और मीडिया के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

 प्रेस क्लब एक ऐसा संगठन है जो पत्रकारों, मीडिया कर्मियों, और संवाददाताओं के बीच नेटवर्किंग, सहयोग, और समर्थन प्रदान करने के उद्देश्य से स्थापित किया गया है। इसका मुख्य उद्देश्य पत्रकारिता को मजबूत बनाना, प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा करना, और पत्रकारों के हितों की रक्षा करना है।


### प्रेस क्लब का महत्व:

1. **मीडिया का समर्थन और सहयोग**: प्रेस क्लब पत्रकारों के लिए एक ऐसा मंच प्रदान करता है जहाँ वे अपने अनुभव साझा कर सकते हैं, नए विचारों का आदान-प्रदान कर सकते हैं, और एक दूसरे की सहायता कर सकते हैं।


2. **प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा**: प्रेस क्लब प्रेस की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करता है और यदि किसी पत्रकार को किसी प्रकार की चुनौती या दबाव का सामना करना पड़ता है, तो प्रेस क्लब उसके साथ खड़ा होता है।


3. **सूचना और प्रशिक्षण**: प्रेस क्लब विभिन्न प्रकार के सेमिनार, कार्यशालाएं, और वार्ता का आयोजन करता है, जिससे पत्रकारों को उनके पेशेवर कौशल को बढ़ाने का मौका मिलता है। 


4. **सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियाँ**: प्रेस क्लब पत्रकारों और उनके परिवारों के लिए सांस्कृतिक और सामाजिक कार्यक्रमों का आयोजन भी करता है, जिससे उनके बीच आपसी जुड़ाव बढ़ता है।


5. **संपर्क और नेटवर्किंग**: प्रेस क्लब के माध्यम से पत्रकार और मीडिया कर्मी विभिन्न सरकारी, गैर-सरकारी, और अन्य संगठनों के साथ संपर्क स्थापित कर सकते हैं, जिससे उनकी कार्य क्षमता और जानकारी का विस्तार होता है।


### प्रेस क्लब की उपलब्धियाँ:

1. **प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा**: कई देशों और राज्यों में प्रेस क्लब ने प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। जब भी पत्रकारों के ऊपर दबाव आया या उनकी स्वतंत्रता पर हमला हुआ, प्रेस क्लब ने उनके समर्थन में आवाज उठाई है।


2. **पेशेवर उत्कृष्टता**: प्रेस क्लब के माध्यम से कई पत्रकारों ने अपने पेशेवर कौशल में वृद्धि की है और उच्च मानकों वाली पत्रकारिता के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया है।


3. **सामाजिक जिम्मेदारी**: प्रेस क्लब ने समय-समय पर समाज के महत्वपूर्ण मुद्दों पर जागरूकता फैलाने और सामाजिक परिवर्तन लाने में भी भूमिका निभाई है। 


4. **पुरस्कार और मान्यता**: प्रेस क्लब द्वारा उत्कृष्ट पत्रकारिता को मान्यता देने के लिए पुरस्कारों का आयोजन किया जाता है। इससे पत्रकारों को उनके काम के लिए प्रोत्साहन मिलता है।


5. **संकट में सहायता**: जब भी किसी पत्रकार को संकट का सामना करना पड़ा है, जैसे कि कानूनी चुनौतियाँ या सुरक्षा संबंधी समस्याएँ, प्रेस क्लब ने उनकी सहायता के लिए कदम उठाए हैं।


प्रेस क्लब, पत्रकारिता और समाज के बीच पुल का काम करता है। इसके द्वारा मीडिया कर्मियों को न केवल पेशेवर विकास के अवसर मिलते हैं, बल्कि उन्हें समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को निभाने का मंच भी मिलता है।

गढ़वाली सिनेमा का इतिहास उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

 गढ़वाली सिनेमा का इतिहास उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसका आरंभ 1983 में हुआ था जब पहली गढ़वाली फ़िल्म **"जग्वाल"** रिलीज़ हुई थी। इस फ़िल्म का निर्देशन उत्तराखंड के प्रसिद्ध फ़िल्म निर्माता और निर्देशक *पराशर गौड़* ने किया था। 


### प्रमुख घटनाएं और मील के पत्थर:

1. **"जग्वाल" (1983)**: यह गढ़वाली सिनेमा की पहली फ़िल्म थी, जो एक सामाजिक मुद्दे पर आधारित थी और इसमें पहाड़ी समाज की समस्याओं को दिखाया गया था। इस फ़िल्म को गढ़वाली सिनेमा के इतिहास में एक मील का पत्थर माना जाता है।

   

2. **1980 और 1990 का दशक**: इस समय गढ़वाली सिनेमा में धीमी गति से विकास हुआ। कुछ फ़िल्में तो आईं, लेकिन दर्शकों की कमी और सीमित संसाधनों के कारण यह उद्योग तेजी से बढ़ नहीं पाया।


3. **2000 का दशक**: उत्तराखंड राज्य बनने के बाद गढ़वाली सिनेमा में एक नई ऊर्जा आई। इस दौर में कई फ़िल्में बनीं जिनमें *"सुपड़िया,"* *"कन्यादान,"* और *"ब्योली"* प्रमुख हैं। इन फ़िल्मों ने क्षेत्रीय संस्कृति को मजबूत किया और लोककथाओं व पारंपरिक मूल्यों को प्रदर्शित किया।


4. **आधुनिक गढ़वाली सिनेमा**: 2010 के बाद से गढ़वाली सिनेमा ने डिजिटल फ़िल्म निर्माण के साथ नया मोड़ लिया। आजकल कई गढ़वाली फ़िल्में यूट्यूब और अन्य डिजिटल प्लेटफार्मों पर भी उपलब्ध हैं। युवा निर्देशकों और अभिनेताओं ने गढ़वाली सिनेमा को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया है। 


गढ़वाली सिनेमा की प्रमुख चुनौतियों में बजट की कमी, सीमित दर्शक वर्ग, और प्रचार-प्रसार के साधनों की कमी शामिल हैं। फिर भी, यह उद्योग धीरे-धीरे अपने आप को स्थापित कर रहा है और उत्तराखंड की संस्कृति और परंपराओं को संजोए रखने का प्रयास कर रहा है। 


गढ़वाली फ़िल्में आज भी स्थानीय संस्कृति, रीति-रिवाज और सामाजिक मुद्दों को उजागर करने का सशक्त माध्यम बनी हुई हैं, और उन्हें लोक-कलाओं और पारंपरिक धरोहर को संरक्षित रखने के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।

एपीई‍डीए ने पोलैंड को अंजीर के जूस की पहली खेप निर्यात की



कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीई‍डीए) ने जीआई-टैग वाले पुरंदर अंजीर से बने भारत के प्रथम पीने के लिए तैयार अंजीर के रस को पोलैंड को निर्यात के लिए सुगम बनाया। अंजीर के रस की यह खेप सभी हितधारकों की उपस्थिति में एपीई‍डीए के अध्यक्ष श्री अभिषेक देव द्वारा हरी झंडी दिखाकर 1 अगस्त, 2024 को जर्मनी के हैम्बर्ग बंदरगाह से होते हुए रवाना हुई। यह आयोजन वैश्विक मंच पर भारत के विशिष्ट कृषि उत्पादों को बढ़ावा देने में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।

इस अभिनव अंजीर के रस की यात्रा ग्रेटर नोएडा, नई दिल्ली में आयोजित एसआईएएल 2023 के दौरान कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण मंडप में शुरू हुई। यह आयोजित अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मेला ने प्रदर्शित उत्पादों को वैश्विक बाजार में पहचान के लिए एक मंच प्रदान किया। पुरंदर हाइलैंड्स फार्मर्स प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड द्वारा उत्पादित अंजीर के रस ने सभी का ध्यान आकर्षित किया और इस कार्यक्रम में एक पुरस्कार जीता, जिसने अंतर्राष्ट्रीय बाजार में इसकी क्षमता को विशिष्ट रूप से दर्शाया।

इस उत्पाद के विकास और निर्यात में कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण  के निरंतर समर्थन और सहायता ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वर्ष 2022 में हैम्बर्ग को ताज़े जीआई-टैग वाले पुरंदर अंजीर के पहले निर्यात के बाद से, एपीई‍डीए ने छोटे किसानों के साथ पूर्ण सहयोग से कार्य किया है। यह उत्पाद, जिसे एक अनंतिम पेटेंट दिया गया है, कृषि क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण नवाचार का प्रतिनिधित्व करता है।

एपीई‍डीए के समर्थन से इटली के रिमिनी में मैकफ्रूट वर्ष 2024 में अंजीर के रस का प्रदर्शन भी किया गया, जिससे इसकी वैश्विक पहुँच का और अधिक विस्तार हुआ। इस आयोजन में खरीदारों की ओर से सकारात्मक प्रतिक्रिया देखी गई, जिसमें पोलैंड के व्रोकला में एमजी सेल्स एसपी द्वारा की गई पूछताछ भी शामिल थी, जिसके फलस्‍वरूप यह ऐतिहासिक निर्यात प्रक्रिया संपन्‍न हुई।

यह उपलब्धि न केवल भारतीय कृषि उत्पादों की क्षमता को प्रदर्शित करती है, तथापि कृषि निर्यात के मूल्य को बढ़ाने में अनुसंधान और विकास के महत्व को भी रेखांकित करती है। यह उपलब्धि भारतीय कृषि उत्पादों की क्षमता के साथ किफायती कृषि प्रणालियों और निर्यात को बढ़ावा देने में एफपीसी की महत्वपूर्ण भूमिका को दर्शाती है। 

Saturday, August 3, 2024

रोहिणी के आशा किरण आश्रय गृह में कैदियों की मौत पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने दिल्ली सरकार को नोटिस जारी किया


एनएचआरसी ने मीडिया रिपोर्ट पर स्वत: संज्ञान लिया है कि दिल्ली सरकार द्वारा संचालित आश्रय गृह में 15 जुलाई से 31 जुलाई के बीच 12 कैदियों की मौत हो गई



आश्रय गृह की क्षमता 500 कैदियों की है, लेकिन अब कथित तौर पर इसमें 1,000 से अधिक कैदी रह रहे हैं, जिसके कारण इसमें भीड़भाड़ हो रही है। फोटो: ट्रिब्यून फाइल

नई दिल्ली, 3 अगस्त

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने शनिवार को कहा कि उसने रोहिणी के आश्रय गृह में एक महीने के भीतर 12 कैदियों की मौत के आरोप वाली रिपोर्ट पर दिल्ली सरकार और शहर के पुलिस प्रमुख को नोटिस जारी किया है।


एनएचआरसी ने एक बयान में कहा कि इतने कम समय में इतनी बड़ी संख्या में कैदियों की मौत "अधिकारियों की ओर से लापरवाही" को दर्शाती है।


एनएचआरसी ने मीडिया रिपोर्ट पर स्वतः संज्ञान लिया है कि मानसिक रूप से कमज़ोर लोगों के लिए दिल्ली सरकार द्वारा संचालित आश्रय गृह - आशा किरण - में 15 जुलाई से 31 जुलाई के बीच 12 कैदियों की मौत हो गई। कथित तौर पर, उनमें 10 महिलाएं और दो पुरुष शामिल थे। उनके लक्षण समान थे यानी दस्त और उल्टी। आयोग ने कहा कि कई अन्य कैदियों का कथित तौर पर एक अस्पताल में इलाज चल रहा है। आश्रय गृह की चिकित्सा देखभाल इकाई के आंकड़ों के अनुसार, जुलाई में 54 कैदियों को इलाज के लिए सुविधा से बाहर भेजा गया था। इसने आश्रय गृह में "चिंता पैदा की है और उपेक्षा और खराब रहने की स्थिति के आरोपों को फिर से जन्म दिया है"। आयोग ने पाया है कि समाचार रिपोर्ट की सामग्री, यदि सत्य है, तो कथित रूप से भीड़भाड़ वाले आश्रय गृह में कैदियों के मानवाधिकारों के उल्लंघन का गंभीर मुद्दा उठाती है। बयान में कहा गया है कि तदनुसार, एनएचआरसी ने दिल्ली सरकार के मुख्य सचिव और पुलिस आयुक्त को नोटिस जारी कर चार सप्ताह में विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। इसमें मामले में एफआईआर की स्थिति, जिम्मेदार अधिकारियों या अधिकारियों के खिलाफ की गई कार्रवाई और ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो, यह सुनिश्चित करने के लिए अधिकारियों द्वारा उठाए गए या प्रस्तावित कदमों के बारे में जानकारी शामिल होने की उम्मीद है। 2 अगस्त को प्रकाशित मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, आशा किरण "विवादों के लिए नया नहीं है"। आश्रय गृह की क्षमता 500 लोगों की है, लेकिन अब कथित तौर पर इसमें 1,000 से अधिक लोग रह रहे हैं, जिसके कारण इसमें भीड़भाड़ हो रही है। कथित तौर पर, नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (CAG) ने अपनी 2015 की रिपोर्ट में इस आश्रय गृह के कामकाज पर लाल झंडी दिखाई थी। यह देखा गया कि सुविधा अत्यधिक बोझिल थी, चिकित्सा आपात स्थितियों के लिए अपर्याप्त थी और कर्मचारियों की कमी थी। रिपोर्ट में बताया गया कि 2009-14 के दौरान कुल 148 मौतें हुईं। इसने आशा किरण परिसर में भीड़भाड़ कम करने के लिए विभाग की ओर से "ढिलाई" भी पाई। बयान में कहा गया है कि 2017 में दिल्ली महिला आयोग ने भी एक रिपोर्ट पेश की थी जिसमें कहा गया था कि यह सुविधा “खराब स्थिति” में है।

उत्तराखंड का क्षेत्रीय सिनेमा धीरे-धीरे लोकप्रियता हासिल कर रहा है और यहाँ के लोगों का इस पर रुझान भी बढ़ रहा है। स्थानीय संस्कृति, भाषा, और परंपराओं को सिनेमा के माध्यम से प्रदर्शित करने का प्रयास किया जा रहा है। यहाँ कुछ प्रमुख पहलू दिए जा रहे हैं:

 उत्तराखंड का क्षेत्रीय सिनेमा धीरे-धीरे लोकप्रियता हासिल कर रहा है और यहाँ के लोगों का इस पर रुझान भी बढ़ रहा है। स्थानीय संस्कृति, भाषा, और परंपराओं को सिनेमा के माध्यम से प्रदर्शित करने का प्रयास किया जा रहा है। यहाँ कुछ प्रमुख पहलू दिए जा रहे हैं:


### क्षेत्रीय सिनेमा की स्थिति


1. **भाषा और संस्कृति**: उत्तराखंड के क्षेत्रीय सिनेमा में मुख्य रूप से गढ़वाली और कुमाऊँनी भाषाओं का प्रयोग होता है। ये फिल्में स्थानीय कहानियों, संस्कृति, और परंपराओं पर आधारित होती हैं, जिससे लोग आसानी से जुड़ पाते हैं।


2. **प्रमुख फिल्में**: उत्तराखंड में बनी कुछ प्रमुख क्षेत्रीय फिल्में जैसे कुमाउनी "मेघा आ",  और गढ़वाली "जगवाल" ने दर्शकों के बीच अच्छी पहचान बनाई है। इन फिल्मों ने न केवल स्थानीय दर्शकों को बल्कि बाहरी दर्शकों को भी आकर्षित किया है।


3. **फिल्म फेस्टिवल और पुरस्कार**: उत्तराखंड फिल्म फेस्टिवल और अन्य स्थानीय फिल्म समारोहों का आयोजन होता है, जहाँ क्षेत्रीय फिल्मों को प्रदर्शित किया जाता है और उन्हें पुरस्कृत किया जाता है। यह फिल्म निर्माताओं को प्रोत्साहित करता है और नए प्रतिभाओं को उभरने का मौका मिलता है।


4. **सरकारी समर्थन**: राज्य सरकार क्षेत्रीय सिनेमा को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न योजनाएँ और अनुदान प्रदान कर रही है। फिल्म निर्माण के लिए वित्तीय सहायता, शूटिंग के लिए स्थान, और तकनीकी सहायता जैसी सुविधाएँ दी जा रही हैं।


### लोगों का रुझान


1. **सामाजिक मीडिया और इंटरनेट**: सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और ओटीटी (ओवर-द-टॉप) सेवाओं के माध्यम से क्षेत्रीय फिल्में अब अधिक व्यापक दर्शकों तक पहुँच रही हैं। यूट्यूब, अमेजन प्राइम, और नेटफ्लिक्स जैसे प्लेटफॉर्म पर स्थानीय फिल्मों की उपलब्धता से लोगों का रुझान बढ़ा है।


2. **सांस्कृतिक जुड़ाव**: क्षेत्रीय सिनेमा लोगों को अपनी जड़ों से जोड़ने का काम करता है। स्थानीय भाषा और संस्कृति में बनी फिल्मों को देखने से लोग अपनी परंपराओं और रीति-रिवाजों के प्रति गर्व महसूस करते हैं।


3. **नई पीढ़ी का योगदान**: युवा फिल्म निर्माता और अभिनेता उत्तराखंड के क्षेत्रीय सिनेमा में नई ऊर्जा और क्रिएटिविटी ला रहे हैं। उनके नए और अनोखे दृष्टिकोण से सिनेमा का स्तर ऊँचा हो रहा है।


4. **सामाजिक मुद्दे**: क्षेत्रीय सिनेमा में सामाजिक मुद्दों को उठाया जा रहा है, जिससे लोग अधिक जागरूक हो रहे हैं। पर्यावरण, शिक्षा, और सामाजिक समानता जैसे विषयों पर आधारित फिल्में लोगों के बीच चर्चा का विषय बन रही हैं।


उत्तराखंड का क्षेत्रीय सिनेमा अपनी पहचान बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है और लोगों का रुझान इसमें बढ़ रहा है। सरकारी समर्थन और नई पीढ़ी के योगदान से क्षेत्रीय सिनेमा को और मजबूती मिलेगी और यह राज्य की संस्कृति और परंपराओं को संरक्षित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

उत्तराखंड एक पहाड़ी राज्य है, जो हिमालय पर्वत श्रृंखला में स्थित है। इस राज्य की भूगोलिक परिस्थितियाँ इसे प्राकृतिक आपदाओं के प्रति अत्यधिक संवेदनशील बनाती हैं। उत्तराखंड में प्रमुख आपदाएँ निम्नलिखित हैं:

 उत्तराखंड एक पहाड़ी राज्य है, जो हिमालय पर्वत श्रृंखला में स्थित है। इस राज्य की भूगोलिक परिस्थितियाँ इसे प्राकृतिक आपदाओं के प्रति अत्यधिक संवेदनशील बनाती हैं। उत्तराखंड में प्रमुख आपदाएँ निम्नलिखित हैं:


1. **बाढ़**: मानसून के दौरान भारी वर्षा के कारण नदियों में जलस्तर बढ़ जाता है, जिससे बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होती है। 2013 की केदारनाथ आपदा एक प्रमुख उदाहरण है जब अचानक बाढ़ ने भारी तबाही मचाई थी।


2. **भूस्खलन**: पहाड़ी इलाकों में भारी बारिश और बर्फ पिघलने के कारण भूस्खलन की घटनाएँ सामान्य हैं। भूस्खलन से सड़कें अवरुद्ध हो जाती हैं और गाँवों का संपर्क टूट जाता है।


3. **बर्फीले तूफान**: उच्च हिमालयी क्षेत्रों में बर्फीले तूफान आम हैं। ये तूफान जान-माल को नुकसान पहुँचाते हैं और यात्रा को बाधित करते हैं।


4. **भूकंप**: उत्तराखंड एक भूकंप प्रवण क्षेत्र में स्थित है। राज्य में समय-समय पर छोटे और मध्यम आकार के भूकंप आते रहते हैं।


5. **वनाग्नि (जंगल की आग)**: गर्मियों के दौरान जंगल में आग लगने की घटनाएँ सामान्य हैं। ये आग पर्यावरण को नुकसान पहुँचाती हैं और जीव-जंतुओं के लिए खतरा होती हैं।


### भूगोलिक विशेषताएँ


1. **पहाड़ी इलाका**: उत्तराखंड का अधिकांश हिस्सा पहाड़ी है, जहाँ की ऊँचाई समुद्र तल से 300 मीटर से लेकर 7,800 मीटर तक है। हिमालय की ऊँची चोटियाँ और गहरे घाटियाँ यहाँ की विशेषता हैं।


2. **नदी तंत्र**: गंगा, यमुना, अलकनंदा, और भागीरथी जैसी प्रमुख नदियाँ यहाँ से बहती हैं। ये नदियाँ राज्य की जल आपूर्ति का प्रमुख स्रोत हैं, लेकिन साथ ही बाढ़ का खतरा भी उत्पन्न करती हैं।


3. **जलवायु**: यहाँ की जलवायु विविध है। निचले क्षेत्रों में उप-उष्णकटिबंधीय जलवायु, जबकि ऊँचे क्षेत्रों में अल्पाइन जलवायु पाई जाती है। मानसून के दौरान यहाँ भारी वर्षा होती है, जो बाढ़ और भूस्खलन का कारण बनती है।


4. **ग्लेशियर**: उत्तराखंड में कई प्रमुख ग्लेशियर हैं जैसे गंगोत्री और पिंडारी ग्लेशियर। ये ग्लेशियर गर्मियों में पिघलकर नदियों को पानी प्रदान करते हैं, लेकिन जलवायु परिवर्तन के कारण इनका पिघलना अनियमित हो गया है।


इन भूगोलिक परिस्थितियों के कारण उत्तराखंड में आपदाओं का खतरा हमेशा बना रहता है। सरकार और स्थानीय प्रशासन आपदाओं के प्रबंधन और राहत कार्यों में सक्रिय रहते हैं, लेकिन चुनौतियाँ हमेशा बनी रहती हैं।

@udaen

न्यूज़ विचार और व्यव्हार

जब मीडिया सत्ता की ढाल बने, तब जनता की पत्रकारिता ज़रूरी

जब मीडिया सत्ता की ढाल बने, तब जनता की पत्रकारिता ज़रूरी लोकतंत्र के चार स्तंभों में मीडिया को इसलिए जगह दी गई थी ताकि वह सत्ता पर निगरानी र...