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Wednesday, February 11, 2026
कोटद्वार: सियासत की नई चालें और पुराने समीकरण
Monday, February 9, 2026
उपग्रह चेतावनी दे रहे हैं, क्या हम सुन रहे हैं?
उपग्रह चेतावनी दे रहे हैं, क्या हम सुन रहे हैं?
उत्तराखंड की हरियाली पर मंडराता जलवायु संकट
हिमालय चुप नहीं है—वह बदल रहा है। और यह बदलाव अब लोककथाओं, अनुभवों या अनुमान का विषय नहीं रहा। उपग्रहों की आँखें साफ़-साफ़ बता रही हैं कि उत्तराखंड की वनस्पति सिकुड़ रही है, मौसम का स्वाभाविक तालमेल टूट रहा है और पहाड़ी पारिस्थितिकी तंत्र एक असहज मोड़ पर खड़ा है। सवाल यह नहीं है कि संकट है या नहीं, सवाल यह है कि हम इसे कितनी गंभीरता से ले रहे हैं।
आर्यभट्ट अवलोकन विज्ञान अनुसंधान संस्थान (एआरआईईएस) के वैज्ञानिकों द्वारा गूगल अर्थ इंजन जैसे अत्याधुनिक प्लेटफॉर्म के ज़रिए 22 वर्षों (2001–2022) के उपग्रह आंकड़ों का विश्लेषण किसी चेतावनी सायरन से कम नहीं है। एनडीवीआई और ईवीआई जैसे वनस्पति सूचकांक यह दिखाते हैं कि मानसून के बाद की हरियाली भी अब स्थायी नहीं रही। जो कभी प्राकृतिक चक्र था, वह अब अस्थिर पैटर्न में बदल चुका है।
यह महज़ “हरियाली कम होने” की कहानी नहीं है। यह जल स्रोतों के सूखने, जैव विविधता के क्षरण, भूस्खलन और आपदाओं की बढ़ती आवृत्ति और अंततः मैदानों तक फैलने वाले संकट की भूमिका है। हिमालय अगर बीमार है, तो गंगा के मैदानी क्षेत्र भी सुरक्षित नहीं रह सकते।
सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि वनस्पति पर प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन का प्रभाव समान नहीं है। कुछ क्षेत्र अत्यधिक प्रभावित हो रहे हैं—यानी संकट केंद्रित है, पर नीति और कार्रवाई बिखरी हुई। जंगलों की कटाई, कृषि विस्तार के नाम पर पहाड़ियों का दोहन, अवैध कटान, और अनियंत्रित शहरीकरण—ये सब विकास नहीं, बल्कि धीमी आत्महत्या के औज़ार बन चुके हैं।
विडंबना यह है कि जब विज्ञान हमारे सामने स्पष्ट नक्शे, ग्राफ़ और रुझान रख रहा है, तब नीति-निर्माण अब भी काग़ज़ी योजनाओं और घोषणाओं तक सीमित है। उपग्रह डेटा आज प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली की तरह काम कर सकता है—यह बता सकता है कि कहां तुरंत हस्तक्षेप चाहिए, कहां पुनर्स्थापन संभव है और कहां देर हो चुकी है। लेकिन क्या सरकारें और प्रशासन इसे निर्णय का आधार बना रहे हैं?
उत्तराखंड जैसे संवेदनशील पर्वतीय राज्य में अब “बाद में देखेंगे” की गुंजाइश नहीं है। ज़रूरत है:
वन और भूमि उपयोग नीति की कठोर समीक्षा की
उपग्रह-आधारित निगरानी को शासन का नियमित हिस्सा बनाने की
विकास परियोजनाओं पर पारिस्थितिक जवाबदेही तय करने की
और स्थानीय समुदायों को संरक्षण का भागीदार बनाने की
हिमालय ने समय पर चेतावनी दे दी है। उपग्रहों ने सच सामने रख दिया है।
अब अगर हम फिर भी चुप रहे, तो आने वाली पीढ़ियाँ यह नहीं पूछेंगी कि आपको पता था या नहीं,
वे पूछेंगी—जब पता था, तब आपने किया क्या?
Saturday, February 7, 2026
दीवारें जो स्कूल बन गईं
🎨 दीवारें जो स्कूल बन गईं
$1 मिलियन पुरस्कार जीतने वाली रूबल नागी की कहानी
भारत में जब शिक्षा की बात होती है, तो अक्सर इमारतों, बजट और नीतियों पर चर्चा होती है। लेकिन रूबल नागी ने यह साबित कर दिया कि शिक्षा के लिए न तो भव्य भवन ज़रूरी हैं और न ही भारी-भरकम संसाधन—अगर सोच रचनात्मक और संवेदनशील हो तो झुग्गी की दीवारें भी स्कूल बन सकती हैं।
रूबल नागी को मिला $1 मिलियन का ग्लोबल टीचर प्राइज केवल एक व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह उस भारत की जीत है जहाँ आज भी लाखों बच्चे गरीबी, बाल श्रम और सामाजिक उपेक्षा के कारण शिक्षा से वंचित हैं। एक कलाकार होते हुए उन्होंने कैनवास की सीमाओं को तोड़ा और समाज को अपनी कला का मंच बना दिया।
झुग्गी-बस्तियों की उजड़ी, गंदी और उपेक्षित दीवारों को उन्होंने “Living Walls of Learning” में बदल दिया। इन दीवारों पर उकेरे गए रंग सिर्फ सौंदर्य नहीं रचते, बल्कि अक्षर ज्ञान, गणित, विज्ञान, स्वच्छता और सामाजिक मूल्यों का पाठ पढ़ाते हैं। जिन बच्चों ने कभी स्कूल का दरवाज़ा नहीं देखा, वे खेल-खेल में सीखने लगे।
Rouble Nagi Art Foundation के माध्यम से देशभर में 800 से अधिक मुफ्त लर्निंग सेंटर्स स्थापित करना यह दर्शाता है कि जब सरकारें योजनाएँ बनाने में उलझी रहती हैं, तब समाज से निकली पहलें ज़मीनी बदलाव ला सकती हैं। यह प्रयोग शिक्षा को किताबों से बाहर निकालकर जीवन से जोड़ता है।
यह पुरस्कार सरकारों के लिए भी एक आईना है। क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था अब भी इमारतों और आंकड़ों तक सीमित रहेगी, या वह रचनात्मकता और समावेशन को अपनाएगी? क्या नीति-निर्माता कला, संस्कृति और स्थानीय संसाधनों को शिक्षा का हिस्सा बनाने का साहस दिखाएँगे?
रूबल नागी की सफलता यह संदेश देती है कि शिक्षा मंत्रालयों की फाइलों से नहीं, बल्कि समाज की दीवारों से भी क्रांति शुरू हो सकती है। जरूरत है ऐसे प्रयासों को संस्थागत समर्थन देने की, ताकि यह प्रयोग अपवाद न रह जाए, बल्कि मॉडल बने।
आज जब दुनिया ने एक भारतीय कलाकार-शिक्षक को सम्मानित किया है, तब भारत के लिए यह आत्ममंथन का क्षण है—क्या हम अपनी दीवारों को यूँ ही खामोश रहने देंगे, या उन्हें भी बोलने और सिखाने देंगे?
Thursday, February 5, 2026
भारत में मिलावट का लोकतंत्र: शुद्धता अमीरों के लिए, ज़हर गरीबों के लिए
जब धरोहर उजड़ी, तब पौड़ी भी खाली होने लगी
📰 संपादकीय | जब धरोहर उजड़ी, तब पौड़ी भी खाली होने लगी
पौड़ी गढ़वाल से पलायन को अक्सर रोज़गार, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी से जोड़ दिया जाता है। यह सच है, लेकिन अधूरा सच। असली सवाल यह है कि जब किसी क्षेत्र की आत्मा, पहचान और संस्कृति ही खत्म होने लगे, तो वहाँ लोग टिकेंगे कैसे?
पौड़ी का पलायन केवल लोगों का नहीं है —
यह धरोहरों, परंपराओं और इतिहास के टूटने का नतीजा है।
देवलगढ़ किला खंडहर में बदल रहा है।
प्राचीन नौले-धारे या तो सूख चुके हैं या पाट दिए गए हैं।
देवस्थल, मंदिर, पारंपरिक गाँव और लोक स्मृतियाँ प्रशासनिक उपेक्षा के कारण दम तोड़ रही हैं।
जब किसी गाँव का नौला सूखता है, तो सिर्फ़ पानी नहीं जाता —
गाँव का भविष्य सूखता है।
जब ऐतिहासिक धरोहरें टूटती हैं, तो सिर्फ़ पत्थर नहीं गिरते —
लोगों का जुड़ाव टूटता है।
यही कारण है कि पौड़ी के गाँव खाली होते गए।
घर बचे हैं, लेकिन आँगन नहीं।
मंदिर हैं, लेकिन उत्सव नहीं।
धरोहरें थीं, लेकिन अब स्मृति भी धुंधली पड़ती जा रही है।
विडंबना यह है कि सरकार पलायन रोकने की योजनाएँ बनाती है, लेकिन उस जड़ पर वार नहीं करती, जहाँ से पलायन जन्म लेता है। बिना संस्कृति, बिना पहचान और बिना सम्मान के कोई भी समाज टिक नहीं सकता।
अगर देवलगढ़ जैसे ऐतिहासिक स्थलों को संरक्षित किया जाता,
अगर नौले-धारों को पुनर्जीवित किया जाता,
अगर पारंपरिक गाँवों को सांस्कृतिक पर्यटन से जोड़ा जाता —
तो पौड़ी सिर्फ़ यादों का इलाका नहीं, रोज़गार और सम्मान का केंद्र बन सकता था।
आज ज़रूरत है कि सरकार और समाज दोनों यह समझें —
👉 धरोहर संरक्षण = पलायन रोकने की रणनीति
👉 संस्कृति बचाना = स्थानीय अर्थव्यवस्था बचाना
👉 इतिहास बचाना = भविष्य बचाना
अब भी समय है।
अगर पौड़ी की धरोहरें बचाई गईं, तो गाँव फिर बस सकते हैं।
अगर धरोहरें यूँ ही उजड़ती रहीं, तो आने वाली पीढ़ियाँ पौड़ी को सिर्फ़
“एक खाली जिला” के रूप में जानेंगी।
पलायन रोकना है, तो पहले पौड़ी की आत्मा बचानी होगी।
धरोहरें बचेंगी — तभी पौड़ी लौटेगा।
Monday, February 2, 2026
जब मीडिया सत्ता की ढाल बने, तब जनता की पत्रकारिता ज़रूरी
Saturday, January 31, 2026
हिमालय की थाली: जलवायु संकट के दौर में भारत का मौन संदेश
न्यूज़ विचार और व्यव्हार
कोटद्वार: सियासत की नई चालें और पुराने समीकरण
कोटद्वार: सियासत की नई चालें और पुराने समीकरण कोटद्वार। गढ़वाल का प्रवेश द्वार माने जाने वाले कोटद्वार की राजनीति हमेशा से दिलचस्प रही है। म...
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कृषि व्यवसाय और ग्रामीण उद्यमिता विकास कई विकासशील देश और अर्थव्यवस्थाएं संक्रमण में , विशेष रूप से बड़े ग्रामीण समुदायों के साथ , भोजन...