उपग्रह चेतावनी दे रहे हैं, क्या हम सुन रहे हैं?
उत्तराखंड की हरियाली पर मंडराता जलवायु संकट
हिमालय चुप नहीं है—वह बदल रहा है। और यह बदलाव अब लोककथाओं, अनुभवों या अनुमान का विषय नहीं रहा। उपग्रहों की आँखें साफ़-साफ़ बता रही हैं कि उत्तराखंड की वनस्पति सिकुड़ रही है, मौसम का स्वाभाविक तालमेल टूट रहा है और पहाड़ी पारिस्थितिकी तंत्र एक असहज मोड़ पर खड़ा है। सवाल यह नहीं है कि संकट है या नहीं, सवाल यह है कि हम इसे कितनी गंभीरता से ले रहे हैं।
आर्यभट्ट अवलोकन विज्ञान अनुसंधान संस्थान (एआरआईईएस) के वैज्ञानिकों द्वारा गूगल अर्थ इंजन जैसे अत्याधुनिक प्लेटफॉर्म के ज़रिए 22 वर्षों (2001–2022) के उपग्रह आंकड़ों का विश्लेषण किसी चेतावनी सायरन से कम नहीं है। एनडीवीआई और ईवीआई जैसे वनस्पति सूचकांक यह दिखाते हैं कि मानसून के बाद की हरियाली भी अब स्थायी नहीं रही। जो कभी प्राकृतिक चक्र था, वह अब अस्थिर पैटर्न में बदल चुका है।
यह महज़ “हरियाली कम होने” की कहानी नहीं है। यह जल स्रोतों के सूखने, जैव विविधता के क्षरण, भूस्खलन और आपदाओं की बढ़ती आवृत्ति और अंततः मैदानों तक फैलने वाले संकट की भूमिका है। हिमालय अगर बीमार है, तो गंगा के मैदानी क्षेत्र भी सुरक्षित नहीं रह सकते।
सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि वनस्पति पर प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन का प्रभाव समान नहीं है। कुछ क्षेत्र अत्यधिक प्रभावित हो रहे हैं—यानी संकट केंद्रित है, पर नीति और कार्रवाई बिखरी हुई। जंगलों की कटाई, कृषि विस्तार के नाम पर पहाड़ियों का दोहन, अवैध कटान, और अनियंत्रित शहरीकरण—ये सब विकास नहीं, बल्कि धीमी आत्महत्या के औज़ार बन चुके हैं।
विडंबना यह है कि जब विज्ञान हमारे सामने स्पष्ट नक्शे, ग्राफ़ और रुझान रख रहा है, तब नीति-निर्माण अब भी काग़ज़ी योजनाओं और घोषणाओं तक सीमित है। उपग्रह डेटा आज प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली की तरह काम कर सकता है—यह बता सकता है कि कहां तुरंत हस्तक्षेप चाहिए, कहां पुनर्स्थापन संभव है और कहां देर हो चुकी है। लेकिन क्या सरकारें और प्रशासन इसे निर्णय का आधार बना रहे हैं?
उत्तराखंड जैसे संवेदनशील पर्वतीय राज्य में अब “बाद में देखेंगे” की गुंजाइश नहीं है। ज़रूरत है:
वन और भूमि उपयोग नीति की कठोर समीक्षा की
उपग्रह-आधारित निगरानी को शासन का नियमित हिस्सा बनाने की
विकास परियोजनाओं पर पारिस्थितिक जवाबदेही तय करने की
और स्थानीय समुदायों को संरक्षण का भागीदार बनाने की
हिमालय ने समय पर चेतावनी दे दी है। उपग्रहों ने सच सामने रख दिया है।
अब अगर हम फिर भी चुप रहे, तो आने वाली पीढ़ियाँ यह नहीं पूछेंगी कि आपको पता था या नहीं,
वे पूछेंगी—जब पता था, तब आपने किया क्या?