लोकतंत्र के चार स्तंभों में मीडिया को इसलिए जगह दी गई थी ताकि वह सत्ता पर निगरानी रख सके, सवाल पूछ सके और आम नागरिक की आवाज़ बन सके। लेकिन जब मीडिया का एक बड़ा हिस्सा सत्ता की ढाल-कवच बन जाए, तब लोकतंत्र का संतुलन बिगड़ने लगता है।
आज हम ऐसे दौर में खड़े हैं जहाँ कई अख़बार और टीवी चैनल सरकार से सवाल पूछने के बजाय उसके फैसलों को正 ठहराने में लगे दिखते हैं। बहसें मुद्दों पर नहीं, नैरेटिव पर केंद्रित हैं। एंकर सवाल नहीं करते, आरोप तय करते हैं। सत्ता से जवाबदेही मांगने के बजाय आलोचकों को ही कटघरे में खड़ा किया जाता है।
इस माहौल में आम जनता की भूमिका बदल जाती है। नागरिक अब सिर्फ़ दर्शक नहीं रह जाता—उसे पत्रकार की भूमिका निभानी पड़ती है।
जनता की पत्रकारिता का अर्थ यह नहीं कि हर व्यक्ति कैमरा लेकर रिपोर्टर बन जाए, बल्कि इसका मतलब है:
सच को देखना और साझा करना
स्थानीय मुद्दों को उठाना, जिन्हें मुख्यधारा मीडिया नज़रअंदाज़ करता है
तथ्य, दस्तावेज़ और ज़मीनी हकीकत के साथ सवाल पूछना
डर और दबाव के बावजूद चुप न रहना
सोशल मीडिया, RTI, जनसुनवाई, और वैकल्पिक डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म—आज यही वे माध्यम हैं जहाँ से कई बार सच्ची खबरें सामने आती हैं। यह जन-पत्रकारिता सत्ता को असहज करती है, क्योंकि यह नियंत्रित नहीं होती।
बेशक, इसके खतरे भी हैं। अफ़वाह, अधूरी जानकारी और ट्रोल संस्कृति लोकतंत्र को नुकसान पहुँचा सकती है। इसलिए जन-पत्रकारिता की सबसे बड़ी शर्त है—जिम्मेदारी। बिना तथ्य, बिना संदर्भ और बिना विवेक की आवाज़ भी उतनी ही खतरनाक होती है जितनी गोदी मीडिया।
लेकिन एक बात साफ़ है—
जब मीडिया सत्ता के बहुत करीब हो जाए,
तो सत्य जनता से उम्मीद करता है।
पत्रकारिता भले ही पेशा हो,
लेकिन सवाल पूछना, सच कहना और जवाबदेही माँगना—
यह हर नागरिक का लोकतांत्रिक अधिकार और कर्तव्य है।
आज अगर जनता नहीं बोलेगी,
तो कल इतिहास सिर्फ़ सत्ता की कहानी लिखेगा—
सच की नहीं।