कोटद्वार की “मजदूर मंडी”: विकास के बीच रोज़गार की अनिश्चितता
गढ़वाल का प्रवेश द्वार कहलाने वाला कोटद्वार पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बदल रहा है। नई कॉलोनियां, बहुमंजिला मकान, छोटे-छोटे व्यावसायिक परिसर और बढ़ती आबादी शहर के विस्तार की कहानी बताते हैं। लेकिन इस विकास की तस्वीर का एक दूसरा पहलू भी है—शहर के कुछ चौराहों पर हर सुबह जुटने वाली मजदूरों की भीड़, जिसे अब स्थानीय लोग “मजदूर मंडी” के नाम से पहचानने लगे हैं।
पुराने पिक्चर हॉल चौराहे और उसके आसपास का क्षेत्र सुबह होते ही दिहाड़ी मजदूरों का अनौपचारिक श्रम बाजार बन जाता है। यहाँ राजमिस्त्री, पेंटर, बढ़ई, प्लंबर और सामान्य श्रमिक काम की उम्मीद में खड़े रहते हैं। ठेकेदार या मकान मालिक आते हैं और अपनी जरूरत के अनुसार मजदूर चुनकर ले जाते हैं।
यह पूरी प्रक्रिया किसी औपचारिक रोजगार प्रणाली का हिस्सा नहीं है, बल्कि एक ऐसे अनौपचारिक श्रम बाजार का उदाहरण है जहाँ काम की कोई गारंटी नहीं होती।
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पलायन और शहरी विस्तार की कहानी
कोटद्वार की मजदूर मंडी को समझने के लिए पहाड़ों से हो रहे पलायन को समझना जरूरी है। गढ़वाल के कई पर्वतीय गांवों में रोजगार के सीमित अवसर, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी तथा खेती की घटती उपयोगिता ने लोगों को मैदानों की ओर आने के लिए मजबूर किया है।
कोटद्वार, जो भौगोलिक रूप से पहाड़ और मैदान के बीच स्थित है, इस पलायन का प्रमुख केंद्र बन गया है। इसके अलावा उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों से भी बड़ी संख्या में श्रमिक यहाँ निर्माण कार्यों में काम करने के लिए आते हैं।
शहर में निर्माण गतिविधियों के बढ़ने से मजदूरों की मांग बढ़ी है, लेकिन यह रोजगार अधिकतर अस्थायी और अनौपचारिक है।
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रोज़गार की अनिश्चितता
सुबह सात से नौ बजे के बीच मजदूरों की सबसे अधिक भीड़ दिखाई देती है। कई बार मजदूरों को काम मिल जाता है, लेकिन कई बार पूरा दिन इंतजार के बाद भी उन्हें खाली हाथ लौटना पड़ता है।
एक स्थानीय मजदूर के अनुसार, “अगर ठेकेदार आ गया तो दिन अच्छा गुजर जाता है, नहीं तो घर वापस जाना पड़ता है।”
दिहाड़ी मजदूरी भी काम के प्रकार और मांग के अनुसार बदलती रहती है। राजमिस्त्री और कुशल मजदूरों को अपेक्षाकृत अधिक मजदूरी मिलती है, जबकि सामान्य श्रमिकों की आय कम होती है।
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सामाजिक सुरक्षा का अभाव
अनौपचारिक श्रम बाजार की सबसे बड़ी समस्या सामाजिक सुरक्षा की कमी है। इन श्रमिकों के पास अक्सर कोई औपचारिक पंजीकरण, बीमा या स्वास्थ्य सुरक्षा नहीं होती।
काम के दौरान चोट लगने या बीमारी की स्थिति में उनकी आय तुरंत प्रभावित हो जाती है। ऐसे में कई श्रमिक आर्थिक असुरक्षा की स्थिति में जीवन बिताने को मजबूर होते हैं।
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बदलती डेमोग्राफी और शहर की राजनीति
कोटद्वार की सामाजिक संरचना में भी बदलाव दिखाई दे रहा है। पहाड़ी क्षेत्रों से आकर बसे परिवार, सेवानिवृत्त सैनिक और सरकारी कर्मचारी, तथा बाहरी राज्यों से आए श्रमिक—इन सबने शहर की जनसंख्या संरचना को विविध बना दिया है।
इस तरह के जनसांख्यिकीय परिवर्तन स्थानीय राजनीति और चुनावी समीकरणों को भी प्रभावित करते हैं। कोटद्वार विधानसभा लंबे समय से उत्तराखंड की राजनीति में महत्वपूर्ण रही है और यहाँ से कई प्रमुख नेता जुड़े रहे हैं, जिनमें पूर्व मुख्यमंत्री
भुवन चंद्र खंडूरी
का नाम भी प्रमुख है।
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नीति और प्रशासन के सामने चुनौती
विशेषज्ञों का मानना है कि अनौपचारिक श्रम बाजार को व्यवस्थित करना समय की आवश्यकता है। इसके लिए कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाए जा सकते हैं—
श्रमिकों का पंजीकरण और पहचान कार्ड
कौशल प्रशिक्षण कार्यक्रम
न्यूनतम मजदूरी का प्रभावी क्रियान्वयन
श्रमिकों के लिए स्वास्थ्य और बीमा योजनाएँ
यदि इन कदमों को लागू किया जाए, तो यह श्रमिकों के जीवन में स्थिरता और सुरक्षा ला सकता है।
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निष्कर्ष
कोटद्वार की “मजदूर मंडी” केवल एक चौराहे पर खड़े मजदूरों की भीड़ नहीं है। यह उस सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन का प्रतीक है जो पहाड़ से मैदान की ओर बढ़ती आबादी और तेजी से विकसित होते शहरों के बीच दिखाई देता है।
शहर की बढ़ती इमारतों और विकास योजनाओं के बीच खड़े ये मजदूर हमें याद दिलाते हैं कि किसी भी विकास की असली नींव वही लोग रखते हैं जो रोज़गार की अनिश्चितता के बावजूद अपने श्रम से शहर को आकार देते हैं।