Thursday, February 5, 2026

भारत में मिलावट का लोकतंत्र: शुद्धता अमीरों के लिए, ज़हर गरीबों के लिए



भारत में मिलावट का लोकतंत्र: शुद्धता अमीरों के लिए, ज़हर गरीबों के लिए

भारत में आज़ादी के 75 साल बाद अगर कोई चीज़ सबसे ज़्यादा “लोकतांत्रिक” हो चुकी है, तो वह है मिलावट।
दूध, दही, घी, मसाले, दवा, सब्ज़ी, मिठाई—कुछ भी शुद्ध नहीं, कुछ भी सुरक्षित नहीं। फर्क सिर्फ़ इतना है कि अमीर वर्ग शुद्धता खरीद सकता है, जबकि गरीब मजबूरी में मिलावटी खा-पीकर ज़िंदा रहता है।

अमेरिका या अन्य देशों से भारत में सामान आना अपने आप में बुरी बात नहीं है। समस्या यह नहीं है कि विदेशी सामान आ रहा है, समस्या यह है कि भारत में आने के बाद उसका हश्र क्या होगा। जिस देश में दूध में पानी नहीं, बल्कि केमिकल मिलते हों, वहाँ यह उम्मीद करना कि विदेशी सामान सुरक्षित रहेगा—अपने आप को धोखा देना है।

मिलावट मजबूरी नहीं, मुनाफ़े की रणनीति है

अक्सर तर्क दिया जाता है कि “जनसंख्या ज़्यादा है, मांग ज़्यादा है, इसलिए मिलावट होती है।”
यह तर्क पूरी तरह झूठा है।

मिलावट होती है क्योंकि:

सज़ा का डर नहीं

निगरानी नाम की चीज़ काग़ज़ों में है

ईमानदारी घाटे का सौदा है

और जल्दी अमीर बनने की मानसिकता ने मेहनत, गुणवत्ता और नैतिकता को कुचल दिया है


भारत में आज ईमानदार उत्पादन करने वाला मूर्ख और मिलावट करने वाला होशियार माना जाता है—यही सबसे बड़ा सामाजिक पतन है।

गरीब का पेट, सबसे सस्ता प्रयोगशाला

देश में शुद्ध चीज़ अब “लक्ज़री प्रोडक्ट” बन चुकी है।
ऑर्गेनिक स्टोर, टेस्टेड फूड, ब्रांडेड हेल्थ प्रोडक्ट—सब अमीरों के लिए।
गरीब को मिलता है:

नकली दूध

रंग लगे मसाले

मिलावटी तेल

और असरहीन या नकली दवाइयाँ


यानी गरीब सिर्फ़ आर्थिक नहीं, स्वास्थ्य के स्तर पर भी सज़ा भुगत रहा है।

कामचोरी नहीं, गुणवत्ता से नफ़रत

कहना कड़वा है, लेकिन सच है—भारत में बड़ी आबादी को काम की गुणवत्ता की समझ ही नहीं।
काम “चलाऊ” हो, दिखने में ठीक लगे, पैसा मिल जाए—बस।
यही सोच:

इमारतें गिराती है

सड़कें बहा ले जाती है

दवाइयों को ज़हर बनाती है

और खाने को बीमारी


यह आलस्य नहीं, यह गुणवत्ता के प्रति घोर उपेक्षा है।

विदेशी सामान भी नहीं बचेगा

अगर यही हाल रहा, तो यह तय है कि:

अमेरिका से आने वाला दूध पाउडर

विदेशी दवाइयाँ

आयातित खाद्य पदार्थ


सबमें “देसी मिलावट” शुरू होगी।
क्योंकि भारत में मिलावट कोई अपराध नहीं, एक स्किल बन चुकी है—जिस पर शर्म नहीं, गर्व किया जाता है।

सवाल सरकार से नहीं, सिस्टम से है

यह किसी एक सरकार या पार्टी का मुद्दा नहीं है।
यह उस सिस्टम का परिणाम है जहाँ:

कानून है, लेकिन लागू नहीं

संस्थाएँ हैं, लेकिन निष्क्रिय

और जनता है, लेकिन मजबूर


जब तक मिलावट को राष्ट्रीय अपराध की तरह नहीं देखा जाएगा,
जब तक सज़ा त्वरित और सार्वजनिक नहीं होगी,
जब तक शुद्धता को अधिकार नहीं बनाया जाएगा—

तब तक भारत में विकास होगा, लेकिन स्वस्थ नागरिक नहीं।

और याद रखिए—
जो देश अपने गरीब को ज़हर खिलाकर विकास का जश्न मनाता है,
वह ज़्यादा दूर तक नहीं चल पाता।


जब धरोहर उजड़ी, तब पौड़ी भी खाली होने लगी

 

📰 संपादकीय | जब धरोहर उजड़ी, तब पौड़ी भी खाली होने लगी

पौड़ी गढ़वाल से पलायन को अक्सर रोज़गार, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी से जोड़ दिया जाता है। यह सच है, लेकिन अधूरा सच। असली सवाल यह है कि जब किसी क्षेत्र की आत्मा, पहचान और संस्कृति ही खत्म होने लगे, तो वहाँ लोग टिकेंगे कैसे?

पौड़ी का पलायन केवल लोगों का नहीं है —
यह धरोहरों, परंपराओं और इतिहास के टूटने का नतीजा है।

देवलगढ़ किला खंडहर में बदल रहा है।
प्राचीन नौले-धारे या तो सूख चुके हैं या पाट दिए गए हैं।
देवस्थल, मंदिर, पारंपरिक गाँव और लोक स्मृतियाँ प्रशासनिक उपेक्षा के कारण दम तोड़ रही हैं।

जब किसी गाँव का नौला सूखता है, तो सिर्फ़ पानी नहीं जाता —
गाँव का भविष्य सूखता है।

जब ऐतिहासिक धरोहरें टूटती हैं, तो सिर्फ़ पत्थर नहीं गिरते —
लोगों का जुड़ाव टूटता है।

यही कारण है कि पौड़ी के गाँव खाली होते गए।
घर बचे हैं, लेकिन आँगन नहीं।
मंदिर हैं, लेकिन उत्सव नहीं।
धरोहरें थीं, लेकिन अब स्मृति भी धुंधली पड़ती जा रही है।

विडंबना यह है कि सरकार पलायन रोकने की योजनाएँ बनाती है, लेकिन उस जड़ पर वार नहीं करती, जहाँ से पलायन जन्म लेता है। बिना संस्कृति, बिना पहचान और बिना सम्मान के कोई भी समाज टिक नहीं सकता।

अगर देवलगढ़ जैसे ऐतिहासिक स्थलों को संरक्षित किया जाता,
अगर नौले-धारों को पुनर्जीवित किया जाता,
अगर पारंपरिक गाँवों को सांस्कृतिक पर्यटन से जोड़ा जाता —
तो पौड़ी सिर्फ़ यादों का इलाका नहीं, रोज़गार और सम्मान का केंद्र बन सकता था।

आज ज़रूरत है कि सरकार और समाज दोनों यह समझें —
👉 धरोहर संरक्षण = पलायन रोकने की रणनीति
👉 संस्कृति बचाना = स्थानीय अर्थव्यवस्था बचाना
👉 इतिहास बचाना = भविष्य बचाना

अब भी समय है।
अगर पौड़ी की धरोहरें बचाई गईं, तो गाँव फिर बस सकते हैं।
अगर धरोहरें यूँ ही उजड़ती रहीं, तो आने वाली पीढ़ियाँ पौड़ी को सिर्फ़
“एक खाली जिला” के रूप में जानेंगी।

पलायन रोकना है, तो पहले पौड़ी की आत्मा बचानी होगी
धरोहरें बचेंगी — तभी पौड़ी लौटेगा।

Monday, February 2, 2026

जब मीडिया सत्ता की ढाल बने, तब जनता की पत्रकारिता ज़रूरी

जब मीडिया सत्ता की ढाल बने, तब जनता की पत्रकारिता ज़रूरी

लोकतंत्र के चार स्तंभों में मीडिया को इसलिए जगह दी गई थी ताकि वह सत्ता पर निगरानी रख सके, सवाल पूछ सके और आम नागरिक की आवाज़ बन सके। लेकिन जब मीडिया का एक बड़ा हिस्सा सत्ता की ढाल-कवच बन जाए, तब लोकतंत्र का संतुलन बिगड़ने लगता है।

आज हम ऐसे दौर में खड़े हैं जहाँ कई अख़बार और टीवी चैनल सरकार से सवाल पूछने के बजाय उसके फैसलों को正 ठहराने में लगे दिखते हैं। बहसें मुद्दों पर नहीं, नैरेटिव पर केंद्रित हैं। एंकर सवाल नहीं करते, आरोप तय करते हैं। सत्ता से जवाबदेही मांगने के बजाय आलोचकों को ही कटघरे में खड़ा किया जाता है।

इस माहौल में आम जनता की भूमिका बदल जाती है। नागरिक अब सिर्फ़ दर्शक नहीं रह जाता—उसे पत्रकार की भूमिका निभानी पड़ती है।

जनता की पत्रकारिता का अर्थ यह नहीं कि हर व्यक्ति कैमरा लेकर रिपोर्टर बन जाए, बल्कि इसका मतलब है:

सच को देखना और साझा करना

स्थानीय मुद्दों को उठाना, जिन्हें मुख्यधारा मीडिया नज़रअंदाज़ करता है

तथ्य, दस्तावेज़ और ज़मीनी हकीकत के साथ सवाल पूछना

डर और दबाव के बावजूद चुप न रहना


सोशल मीडिया, RTI, जनसुनवाई, और वैकल्पिक डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म—आज यही वे माध्यम हैं जहाँ से कई बार सच्ची खबरें सामने आती हैं। यह जन-पत्रकारिता सत्ता को असहज करती है, क्योंकि यह नियंत्रित नहीं होती।

बेशक, इसके खतरे भी हैं। अफ़वाह, अधूरी जानकारी और ट्रोल संस्कृति लोकतंत्र को नुकसान पहुँचा सकती है। इसलिए जन-पत्रकारिता की सबसे बड़ी शर्त है—जिम्मेदारी। बिना तथ्य, बिना संदर्भ और बिना विवेक की आवाज़ भी उतनी ही खतरनाक होती है जितनी गोदी मीडिया।

लेकिन एक बात साफ़ है—
जब मीडिया सत्ता के बहुत करीब हो जाए,
तो सत्य जनता से उम्मीद करता है।

पत्रकारिता भले ही पेशा हो,
लेकिन सवाल पूछना, सच कहना और जवाबदेही माँगना—
यह हर नागरिक का लोकतांत्रिक अधिकार और कर्तव्य है।

आज अगर जनता नहीं बोलेगी,
तो कल इतिहास सिर्फ़ सत्ता की कहानी लिखेगा—
सच की नहीं।

Saturday, January 31, 2026

हिमालय की थाली: जलवायु संकट के दौर में भारत का मौन संदेश



हिमालय की थाली: जलवायु संकट के दौर में भारत का मौन संदेश

27 जनवरी को राष्ट्रपति भवन में आयोजित राजकीय भोज को केवल कूटनीतिक औपचारिकता मानना एक बड़ी भूल होगी। यह दरअसल भारत की ओर से दुनिया को दिया गया एक पर्यावरणीय वक्तव्य था—बिना भाषण, बिना घोषणा, सिर्फ भोजन के ज़रिये।

जब पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता के क्षरण और खाद्य असुरक्षा की चुनौती से जूझ रही है, उस समय यूरोपीय संघ के नेताओं के सामने परोसी गई हिमालयी व्यंजनों की थाली यह बताने के लिए काफी थी कि टिकाऊ भविष्य के सूत्र आधुनिक प्रयोगशालाओं में नहीं, बल्कि सदियों पुराने स्थानीय ज्ञान में छिपे हैं।

हिमालयी भोजन परंपरा की आत्मा “कम से कम हस्तक्षेप” पर आधारित है। धीमी पकाने की तकनीक, मौसमी सामग्री, जंगली साग, मिलेट, कंद-मूल और स्थानीय बीज—ये सभी उस कृषि और जीवन पद्धति के प्रतीक हैं, जिसमें कार्बन फुटप्रिंट कम और प्रकृति के साथ टकराव न्यूनतम होता है। जखिया, थिचोनी, गुच्छी मशरूम या बिच्छू बूटी जैसे व्यंजन दरअसल जैव विविधता को सहेजने की सांस्कृतिक रणनीतियाँ हैं।

यह संयोग नहीं कि इस मेन्यू में किसी औद्योगिक फूड सिस्टम का दबदबा नहीं दिखता। न अत्यधिक प्रोसेसिंग, न लंबी सप्लाई चेन, न ही ऊर्जा-खपत वाली खेती। इसके उलट, यह थाली स्थानीय समुदायों की उस समझ को सामने लाती है जहाँ भोजन, जंगल और जल एक ही पारिस्थितिकी तंत्र के हिस्से हैं।

आज हिमालय खुद एक संकट क्षेत्र बन चुका है—ग्लेशियर पिघल रहे हैं, जल स्रोत सूख रहे हैं, और पारंपरिक खेती विस्थापित हो रही है। ऐसे में राष्ट्रपति भवन में हिमालयी भोजन का चयन एक प्रतीकात्मक स्वीकारोक्ति भी है कि पर्यावरण संरक्षण केवल भाषणों से नहीं, विकल्पों से होता है।

यह भोज यह भी याद दिलाता है कि यदि हम स्थानीय खाद्य प्रणालियों को बचाते हैं, तो हम केवल स्वाद नहीं बचाते—हम जलवायु संतुलन, ग्रामीण आजीविका और पीढ़ियों का ज्ञान बचाते हैं। यही कारण है कि यह आयोजन किसी फूड फेस्टिवल से आगे बढ़कर एक नीतिगत संकेत बन जाता है।

संभव है कि EU नेताओं ने उस शाम केवल एक अच्छा डिनर समझकर भोजन किया हो, लेकिन भारत ने उस थाली के माध्यम से यह साफ़ कर दिया कि उसका पर्यावरणीय दृष्टिकोण “ग्रीन स्लोगन” नहीं, बल्कि जीवन पद्धति है।

हिमालय की यह थाली दरअसल एक सवाल भी छोड़ जाती है—
क्या हम विकास की दौड़ में इस संतुलन को थाम पाएंगे,
या फिर इसे भी स्मृति में बदल देंगे?

क्योंकि अगर हिमालय सुरक्षित है,
तो मैदान भी सुरक्षित हैं।

थाली में हिमालय, स्वाद में कूटनीति



थाली में हिमालय, स्वाद में कूटनीति

जब वैश्विक कूटनीति व्यापार, शुल्क और समझौतों की भाषा बोलती है, तब कभी-कभी एक थाली भी वही बात उससे अधिक प्रभावशाली ढंग से कह देती है। 27 जनवरी को राष्ट्रपति भवन में यूरोपीय संघ (EU) के नेताओं के सम्मान में आयोजित राजकीय भोज ऐसा ही एक मौन लेकिन गहरा संवाद था—संस्कृति, प्रकृति और आत्मनिर्भर भारत का संवाद।

इस भोज की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि इसमें किसी आयातित लक्ज़री या पश्चिमी व्यंजनों का प्रदर्शन नहीं था, बल्कि भारतीय हिमालय की मिट्टी, मौसम और परंपरा से जन्मे स्वाद थे। कश्मीर से लेकर उत्तराखंड, हिमाचल और पूर्वोत्तर तक—पूरा हिमालय मानो एक थाली में सिमट आया हो।

यह मेन्यू केवल भोजन नहीं था, बल्कि एक स्पष्ट संदेश था—
👉 भारत अपनी पहचान को छुपाकर नहीं, बल्कि अपनी जड़ों के साथ वैश्विक मंच पर खड़ा है।

आज जब विकास को अक्सर प्रकृति के विरोध में खड़ा कर दिया जाता है, तब यह हिमालयी मेन्यू पहाड़ी समाज की उस समझ को सामने लाता है, जहाँ भोजन सिर्फ पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व का तरीका है। जखिया आलू, थिचोनी, गुच्छी मशरूम, जंगली साग, रागी और मिलेट—ये सब उस जीवन दर्शन के प्रतीक हैं जो कम संसाधनों में संतुलन सिखाता है।

महत्वपूर्ण यह भी है कि इस मेन्यू को युवा भारतीय शेफ्स ने रचा—जो परंपरा को “म्यूज़ियम की चीज़” नहीं, बल्कि जीवित और प्रासंगिक ज्ञान मानते हैं। उन्होंने भारतीय भोजन को बदले बिना, उसकी प्रस्तुति को वैश्विक भाषा दी। यह आत्मविश्वास का संकेत है, न कि अनुकरण का।

दरअसल, यह राजकीय भोज भारत की सॉफ्ट पावर डिप्लोमेसी का सटीक उदाहरण है। जिस समय FTA जैसे समझौतों में आर्थिक लाभ-हानि की गणनाएं चल रही थीं, उसी समय भारत ने यह भी दिखाया कि वह केवल बाज़ार नहीं, बल्कि सभ्यता भी है।

हिमालयी व्यंजनों की यह थाली यूरोपीय नेताओं के लिए सिर्फ स्वाद का अनुभव नहीं थी, बल्कि एक संकेत भी थी—
कि भारत के विकास मॉडल में प्रकृति, परंपरा और समुदाय हाशिये पर नहीं, केंद्र में हैं।

शायद यही असली आत्मनिर्भरता है—
जब आप दुनिया से संवाद करते हैं, लेकिन अपनी आवाज़ में।
और उस आवाज़ में, हिमालय की ख़ामोशी भी सुनाई देती है।

Monday, January 26, 2026

शव पानी में तैरता है, लेकिन जिंदा डूब जाता है: एक सामाजिक चेतावनी

शव पानी में तैरता है, लेकिन जिंदा डूब जाता है: एक सामाजिक चेतावनी

हम अक्सर समाचारों में पढ़ते हैं कि कोई व्यक्ति नदी, तालाब या पोखर में डूब गया, और कुछ दिनों बाद शव पानी में तैरता हुआ मिला। विज्ञान की दृष्टि से इसका सरल कारण है: जिंदा व्यक्ति का शरीर पानी से भारी होता है और डूब सकता है, जबकि मृत्यु के बाद शरीर में गैस बन जाती है और उसका घनत्व कम हो जाता है, इसलिए वह पानी में ऊपर तैरता है।

लेकिन इस साधारण भौतिक प्रक्रिया के पीछे छिपा है गंभीर संदेश—हमारी सुरक्षा, सतर्कता और समाज की जिम्मेदारी।

1. जीवन की अनमोलता और सुरक्षा

जिन लोगों को तैरना नहीं आता या जो पानी के किनारे अनजाने में समय बिताते हैं, उनका जोखिम सबसे अधिक होता है। जीवन का संरक्षण केवल व्यक्तिगत सावधानी नहीं है, बल्कि समाज और राज्य की जिम्मेदारी भी है। हर जलाशय, नदी और पोखर के पास सुरक्षा संकेत, बचाव उपकरण और निगरानी होना चाहिए।

2. सामाजिक चेतना और शिक्षा

स्कूलों और कॉलेजों में जल सुरक्षा का पाठ्यक्रम अनिवार्य होना चाहिए।

माता-पिता और समाज को बच्चों और युवाओं को तैराकी और पानी में सुरक्षा के नियम सिखाने चाहिए।

केवल डराने से काम नहीं चलेगा; विज्ञान और समझ को जीवन का हिस्सा बनाना होगा।


3. विज्ञान और मानव जिम्मेदारी

शव के तैरने और जिंदा डूबने की घटना हमें याद दिलाती है कि जीवन असुरक्षित है, पर ज्ञान और तैयारी सुरक्षा प्रदान कर सकती है।

चेतना और तैयारी ही है जो जिंदगियों को बचा सकती है।

यह सिर्फ एक वैज्ञानिक तथ्य नहीं, बल्कि सामाजिक संदेश भी है: सावधानी, सुरक्षा और जिम्मेदारी अपनाएँ।


निष्कर्ष

जैसे शव पानी में तैरता है क्योंकि उसका घनत्व कम हो गया है, वैसे ही समाज में सुरक्षा और जागरूकता का अभाव जीवन को डुबो सकता है। हमें चाहिए कि हम व्यक्तिगत और सामूहिक जिम्मेदारी से काम करें, ताकि कोई अनजानी त्रासदी जीवन को निगल न पाए।

मनुष्य के दिमाग में दौड़ते दो घोड़े

मनुष्य के दिमाग में दौड़ते दो घोड़े

मनुष्य का मस्तिष्क एक रणभूमि है, जहाँ हर क्षण दो घोड़े दौड़ते रहते हैं—
एक सकारात्मक सोच का, दूसरा नकारात्मक सोच का।
जीत उसी की होती है जिसे हम अधिक खुराक देते हैं।

यह खुराक कोई भोजन नहीं, बल्कि हमारे विचार, शब्द, आदतें और दृष्टिकोण हैं।
हम दिन भर क्या सोचते हैं, किस बात पर ध्यान देते हैं, किस तरह की भाषा बोलते हैं—यही तय करता है कि कौन-सा घोड़ा ताकतवर बनेगा।

नकारात्मक घोड़ा डर से पलता है।
वह असफलताओं की यादों, अपमान के अनुभवों, “लोग क्या कहेंगे” की चिंता और “मुझसे नहीं होगा” जैसी सोच से मजबूत होता है।
यह घोड़ा तेज़ दिखता है, पर अंततः मनुष्य को थका देता है।

दूसरी ओर, सकारात्मक घोड़ा विश्वास से जीवित रहता है।
वह आशा, धैर्य, आत्मसम्मान, सीखने की इच्छा और समाधान खोजने की आदत से ऊर्जा पाता है।
यह घोड़ा धीरे चलता है, पर मंज़िल तक पहुँचाता है।

आधुनिक न्यूरोसाइंस भी यही कहता है कि जिस विचार को हम बार-बार दोहराते हैं, मस्तिष्क उसी के लिए रास्ता बना लेता है।
यानी हमारा दिमाग वही बन जाता है, जिसे हम रोज़ अभ्यास कराते हैं।

यहीं से जीवन की दिशा तय होती है—
सोच बदलेगी तो भावना बदलेगी,
भावना बदलेगी तो कर्म बदलेगा,
और कर्म बदलेगा तो परिणाम अपने-आप बदल जाएंगे।

इसलिए प्रश्न यह नहीं है कि हमारे मन में नकारात्मक विचार आते हैं या नहीं—वे तो आते ही हैं।
असल प्रश्न यह है कि हम उन्हें खुराक देते हैं या नहीं।

हर सुबह, हर निर्णय, हर प्रतिक्रिया में हम अपने घोड़े को चुनते हैं।
जो समाज, परिवार और व्यक्ति सकारात्मक घोड़े को पालते हैं, वही कठिन समय में भी खड़े रहते हैं।

अंततः जीवन की दौड़ में जीत उसी की होती है
जो अपने दिमाग में सही घोड़े को रोज़ खिला रहा होता है।

न्यूज़ विचार और व्यव्हार

भारत में मिलावट का लोकतंत्र: शुद्धता अमीरों के लिए, ज़हर गरीबों के लिए

भारत में मिलावट का लोकतंत्र: शुद्धता अमीरों के लिए, ज़हर गरीबों के लिए भारत में आज़ादी के 75 साल बाद अगर कोई चीज़ सबसे ज़्यादा “लोकतांत्रिक”...