Friday, February 20, 2026

उत्तराखंड पर आर्थिक बोझ: बढ़ती अफसरशाही और घटती कार्यकुशलता की हकीकत

उत्तराखंड पर आर्थिक बोझ: बढ़ती अफसरशाही और घटती कार्यकुशलता की हकीकत

देवभूमि उत्तराखंड अपनी प्राकृतिक संपदा, पर्यटन और सैनिक परंपरा के लिए जानी जाती है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में राज्य की वित्तीय स्थिति को लेकर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। एक ओर विकास योजनाओं के बड़े दावे हैं, तो दूसरी ओर सरकारी खजाने पर बढ़ता वेतन–पेंशन बोझ और विभागों में अधिकारी–कर्मचारियों की बढ़ती संख्या चिंता का विषय बन चुकी है।

1. बढ़ता वेतन और पेंशन व्यय

राज्य के वार्षिक बजट का बड़ा हिस्सा वेतन, भत्तों और पेंशन में खर्च हो जाता है। विकास योजनाओं, आधारभूत संरचना और रोजगार सृजन के लिए अपेक्षित संसाधन सीमित रह जाते हैं। छोटे राज्य होने के बावजूद प्रशासनिक ढांचा अपेक्षाकृत बड़ा है, जिससे राजकोषीय संतुलन बिगड़ता है।

2. विभागों में बढ़ती “फौज”

कई विभागों में पदों का सृजन तो हुआ, पर कार्य–आवंटन और जवाबदेही की स्पष्ट व्यवस्था नहीं बन पाई। परिणामस्वरूप:

फाइलों का अंबार बढ़ता है

निर्णय लेने में देरी होती है

ज़मीनी स्तर पर काम की गति धीमी रहती है

समान कार्य के लिए कई स्तरों पर स्वीकृति की जरूरत पड़ती है


यह संरचना आम जनता को त्वरित सेवा देने के बजाय प्रक्रिया को जटिल बना देती है।

3. काम न करने की सच्चाई या सिस्टम की खामी?

यह कहना आसान है कि “अधिकारी काम नहीं करते”, पर समस्या अक्सर प्रणालीगत होती है:

बार–बार तबादले

स्पष्ट लक्ष्य और प्रदर्शन मानकों का अभाव

राजनीतिक हस्तक्षेप

तकनीकी दक्षता की कमी


जब जवाबदेही तय नहीं होती, तो कार्य संस्कृति भी कमजोर पड़ती है।

4. आर्थिक बोझ के परिणाम

राज्य का कर्ज बढ़ता है

नई भर्तियों पर रोक या देरी

विकास परियोजनाओं में कटौती

कर/शुल्क बढ़ाने का दबाव


इसका सीधा असर आम नागरिक पर पड़ता है—चाहे वह बिजली दर हो, पानी का बिल या अन्य सेवाएं।

5. समाधान क्या हो सकते हैं?

1. प्रदर्शन आधारित मूल्यांकन प्रणाली लागू की जाए।


2. ई-गवर्नेंस और डिजिटल फाइल सिस्टम को अनिवार्य बनाया जाए।


3. अनावश्यक पदों की समीक्षा और मानव संसाधन ऑडिट किया जाए।


4. विभागों के विलय/पुनर्गठन से प्रशासनिक खर्च कम किया जाए।


5. लोकसेवकों की जवाबदेही तय करने के लिए सख्त निगरानी तंत्र बने।



निष्कर्ष

उत्तराखंड जैसे छोटे और संसाधन–संवेदनशील राज्य के लिए वित्तीय अनुशासन और कार्यकुशल प्रशासन अनिवार्य है। केवल कर्मचारियों की संख्या बढ़ाने से विकास नहीं होता; आवश्यक है पारदर्शिता, जवाबदेही और परिणाम–केंद्रित शासन।

यदि राज्य को आत्मनिर्भर और सशक्त बनाना है, तो “संख्या” नहीं, “कुशलता” पर ध्यान देना होगा—तभी सरकारी तंत्र जनता के विश्वास पर खरा उतर सकेगा।

कोटद्वार: सियासत की नई चालें और पुराने समीकरण

कोटद्वार: सियासत की नई चालें और पुराने समीकरण

कोटद्वार।
गढ़वाल का प्रवेश द्वार माने जाने वाले कोटद्वार की राजनीति हमेशा से दिलचस्प रही है। मैदानी और पहाड़ी क्षेत्र के मिश्रित सामाजिक ढांचे के कारण यहां का चुनावी गणित भी जटिल माना जाता है। लेकिन हाल के समय में यहां के राजनीतिक समीकरणों में स्पष्ट बदलाव देखने को मिल रहा है।

सत्ता की नजदीकी और प्रभाव

स्थानीय राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि जो नेता सत्ता और संगठन के करीब हैं, उनकी “राजनीतिक पकड़” मजबूत होती जा रही है। सरकारी कार्यक्रमों में उनकी उपस्थिति, प्रशासनिक बैठकों में सक्रियता और मीडिया में दृश्यता यह संकेत देती है कि प्रभाव का केंद्र बदल रहा है।

वहीं कुछ ऐसे पुराने चेहरे, जो कभी कोटद्वार की राजनीति में निर्णायक माने जाते थे, अब सीमित दायरे में सिमटते दिखाई दे रहे हैं।

गुटबाजी और संगठनात्मक खींचतान

कोटद्वार की राजनीति में गुटबाजी कोई नई बात नहीं है। लेकिन वर्तमान परिदृश्य में यह और स्पष्ट होकर सामने आ रही है। पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर मतभेद, टिकट की संभावनाएं और क्षेत्रीय संतुलन जैसे मुद्दे अंदरूनी तनाव को जन्म दे रहे हैं।

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यही गुटबाजी कई बार चुनावी रणनीति को प्रभावित करती है।

स्थानीय मुद्दे बनाम राजनीतिक बयान

कोटद्वार शहर और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी समस्याएं आज भी मौजूद हैं—

ट्रैफिक और शहरी अव्यवस्था

रोजगार के सीमित अवसर

पहाड़ी गांवों से लगातार पलायन

स्वास्थ्य और शिक्षा ढांचे की चुनौतियां


स्थानीय नागरिकों का कहना है कि राजनीतिक बयानबाजी से अधिक जरूरी है जमीनी स्तर पर ठोस काम।

नई पीढ़ी की दस्तक

कोटद्वार में युवा नेताओं की सक्रियता भी बढ़ी है। सोशल मीडिया और जनसंपर्क के माध्यम से वे अपनी पहचान बनाने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यहां अब भी व्यक्तिगत संपर्क और क्षेत्रीय नेटवर्क की अहम भूमिका है।

आगे की राह

कोटद्वार की राजनीति फिलहाल संक्रमण के दौर में है। सत्ता से निकटता रखने वाले नेता फिलहाल मजबूत स्थिति में नजर आते हैं, लेकिन अंतिम फैसला जनता ही करेगी।

अगर विकास और जनहित के मुद्दों पर ठोस पहल नहीं हुई, तो आने वाले समय में राजनीतिक तस्वीर फिर बदल सकती है।

क्या भारत में भी सांसदों की पेंशन समाप्त होनी चाहिए?

क्या भारत में भी सांसदों की पेंशन समाप्त होनी चाहिए?

दक्षिण एशिया के देश Sri Lanka ने हाल ही में सांसदों को सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाली पेंशन समाप्त कर एक बड़ा और प्रतीकात्मक निर्णय लिया है। 49 वर्ष पुराने कानून को भारी बहुमत से रद्द किया जाना केवल आर्थिक सुधार नहीं, बल्कि राजनीतिक जवाबदेही का संदेश भी है। ऐसे में स्वाभाविक प्रश्न उठता है—क्या India में भी ऐसा होना चाहिए?

भारत में सांसदों को पेंशन का प्रावधान सांसद वेतन, भत्ता और पेंशन अधिनियम, 1954 के तहत मिलता है। केवल एक कार्यकाल (पाँच वर्ष) पूरा करने पर आजीवन पेंशन का अधिकार बन जाता है, और अतिरिक्त कार्यकाल पर राशि बढ़ती जाती है। यह व्यवस्था उस समय बनी थी जब राजनीति में आर्थिक स्थिरता सीमित थी और जनप्रतिनिधियों के लिए सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करना आवश्यक समझा गया।

लेकिन आज परिस्थितियाँ बदल चुकी हैं। देश में करोड़ों कर्मचारी पुरानी पेंशन योजना से बाहर हो चुके हैं। सरकारी सेवाओं में अंशदायी पेंशन व्यवस्था लागू है। ऐसे में जनप्रतिनिधियों के लिए बिना अंशदान के आजीवन पेंशन का प्रावधान नैतिक बहस का विषय बनता है। क्या लोकतंत्र में कानून बनाने वाले स्वयं के लिए विशेषाधिकार सुरक्षित रखें, जबकि आम नागरिक कठोर नियमों का पालन करे?

पेंशन समाप्त करने के पक्ष में तर्क है कि राजनीति “सेवा” है, स्थायी रोजगार नहीं। जनप्रतिनिधि जनता के विश्वास से चुनकर आते हैं, न कि नौकरी के अनुबंध से। पाँच वर्ष के कार्यकाल के बाद आजीवन पेंशन का अधिकार आम नागरिक की दृष्टि में असमानता का प्रतीक बनता है। इसके अतिरिक्त, सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता और सादगी का संदेश भी आवश्यक है।

हालाँकि विरोध में यह तर्क भी कमज़ोर नहीं है कि राजनीति पूर्णकालिक दायित्व है। अनेक सांसद निजी व्यवसाय या पेशा छोड़कर सार्वजनिक जीवन में आते हैं। आर्थिक सुरक्षा का अभाव उन्हें बाहरी आर्थिक प्रभावों के प्रति संवेदनशील बना सकता है। लोकतंत्र की मजबूती के लिए जनप्रतिनिधियों की स्वतंत्रता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी समानता।

इस बहस का समाधान शायद पूर्ण समाप्ति या यथास्थिति में नहीं, बल्कि संतुलित सुधार में है। पेंशन को अंशदायी बनाया जा सकता है, आय या आर्थिक स्थिति से जोड़ा जा सकता है, या न्यूनतम कार्यकाल की सीमा बढ़ाई जा सकती है। “एक व्यक्ति, एक पेंशन” का सिद्धांत भी अपनाया जा सकता है।

अंततः यह प्रश्न केवल वित्तीय नहीं, बल्कि नैतिक और लोकतांत्रिक है। जनता आज अधिक जागरूक है और राजनीतिक वर्ग से जवाबदेही की अपेक्षा करती है। यदि जनप्रतिनिधि स्वयं को विशेषाधिकार से ऊपर रखकर समानता का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं, तो लोकतंत्र की विश्वसनीयता और मजबूत होगी।

भारत को निर्णय जल्दबाज़ी में नहीं, बल्कि व्यापक सार्वजनिक विमर्श के बाद लेना चाहिए। पर इतना निश्चित है कि समय बदल चुका है—और राजनीति को भी बदलते समय के अनुरूप स्वयं को पुनर्परिभाषित करना होगा।

Thursday, February 19, 2026

“अध्यक्ष या कार्यकर्ता? लोकतंत्र की मर्यादा का सवाल”

🗞️ संपादकीय

“अध्यक्ष या कार्यकर्ता? लोकतंत्र की मर्यादा का सवाल”

लोकतंत्र में पद की गरिमा व्यक्ति से बड़ी होती है। और जब बात विधानसभा अध्यक्ष की हो, तो यह गरिमा और भी ऊँची हो जाती है। अध्यक्ष केवल एक विधायक नहीं होते, वे सदन की आत्मा होते हैं—निष्पक्षता, संतुलन और संविधान के प्रहरी।

भारतीय संविधान ने विधानसभा अध्यक्ष को जो स्थान दिया है, वह दलगत सीमाओं से परे है। अनुच्छेद 178 से 187 तक अध्यक्ष की भूमिका स्पष्ट करती है कि यह पद सत्ता या विपक्ष का नहीं, बल्कि पूरे सदन का है। ऐसे में यदि कोई अध्यक्ष आम जनता के बीच अपनी ही पार्टी के पक्ष में नारे लगाते दिखाई दें, तो सवाल उठना स्वाभाविक है—क्या वे अब भी निष्पक्ष हैं?

सवाल केवल नैतिकता का नहीं, लोकतांत्रिक विश्वास का है।
Supreme Court of India ने दल-बदल कानून के संदर्भ में कई बार कहा है कि अध्यक्ष का पद “अर्ध-न्यायिक” (quasi-judicial) प्रकृति का है। जब वही व्यक्ति खुले मंच से दलगत नारों में शामिल हो, तो क्या उनके निर्णयों पर भरोसा वैसा ही रह पाएगा?

लोकतंत्र में निष्पक्षता दिखनी भी चाहिए और दिखनी ही चाहिए।
अध्यक्ष यदि पार्टी के कार्यकर्ता की भूमिका निभाएँगे, तो सदन में विपक्ष को न्याय मिलने की उम्मीद कैसे होगी? क्या उनके हर फैसले पर राजनीतिक चश्मा नहीं चढ़ जाएगा?

यह तर्क दिया जा सकता है कि अध्यक्ष अपनी पार्टी के सदस्य बने रहते हैं, इसलिए उन्हें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है। परंतु क्या संवैधानिक पद की शपथ केवल औपचारिकता है? क्या पद की गरिमा व्यक्तिगत राजनीतिक उत्साह से छोटी हो गई है?

ब्रिटेन सहित कई संसदीय लोकतंत्रों में स्पीकर चुने जाने के बाद दलगत राजनीति से स्वयं को अलग कर लेते हैं। भारत में भले ही ऐसा औपचारिक प्रावधान न हो, परंतु परंपरा और मर्यादा यही अपेक्षा करती है।

आज आवश्यकता है कि हम पद और व्यक्ति के बीच स्पष्ट रेखा खींचें।
अध्यक्ष यदि पार्टी के मंच पर खड़े होकर नारे लगाएँगे, तो लोकतंत्र का संतुलन डगमगाएगा।

लोकतंत्र केवल संख्या का खेल नहीं, विश्वास का तंत्र है।
और विश्वास की पहली शर्त है—निष्पक्षता।

अंततः प्रश्न यही है:
क्या विधानसभा अध्यक्ष दल के सिपाही बनेंगे या संविधान के प्रहरी बने रहेंगे?

Monday, February 9, 2026

उपग्रह चेतावनी दे रहे हैं, क्या हम सुन रहे हैं?

 

उपग्रह चेतावनी दे रहे हैं, क्या हम सुन रहे हैं?

उत्तराखंड की हरियाली पर मंडराता जलवायु संकट

हिमालय चुप नहीं है—वह बदल रहा है। और यह बदलाव अब लोककथाओं, अनुभवों या अनुमान का विषय नहीं रहा। उपग्रहों की आँखें साफ़-साफ़ बता रही हैं कि उत्तराखंड की वनस्पति सिकुड़ रही है, मौसम का स्वाभाविक तालमेल टूट रहा है और पहाड़ी पारिस्थितिकी तंत्र एक असहज मोड़ पर खड़ा है। सवाल यह नहीं है कि संकट है या नहीं, सवाल यह है कि हम इसे कितनी गंभीरता से ले रहे हैं

आर्यभट्ट अवलोकन विज्ञान अनुसंधान संस्थान (एआरआईईएस) के वैज्ञानिकों द्वारा गूगल अर्थ इंजन जैसे अत्याधुनिक प्लेटफॉर्म के ज़रिए 22 वर्षों (2001–2022) के उपग्रह आंकड़ों का विश्लेषण किसी चेतावनी सायरन से कम नहीं है। एनडीवीआई और ईवीआई जैसे वनस्पति सूचकांक यह दिखाते हैं कि मानसून के बाद की हरियाली भी अब स्थायी नहीं रही। जो कभी प्राकृतिक चक्र था, वह अब अस्थिर पैटर्न में बदल चुका है।

यह महज़ “हरियाली कम होने” की कहानी नहीं है। यह जल स्रोतों के सूखने, जैव विविधता के क्षरण, भूस्खलन और आपदाओं की बढ़ती आवृत्ति और अंततः मैदानों तक फैलने वाले संकट की भूमिका है। हिमालय अगर बीमार है, तो गंगा के मैदानी क्षेत्र भी सुरक्षित नहीं रह सकते।

सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि वनस्पति पर प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन का प्रभाव समान नहीं है। कुछ क्षेत्र अत्यधिक प्रभावित हो रहे हैं—यानी संकट केंद्रित है, पर नीति और कार्रवाई बिखरी हुई। जंगलों की कटाई, कृषि विस्तार के नाम पर पहाड़ियों का दोहन, अवैध कटान, और अनियंत्रित शहरीकरण—ये सब विकास नहीं, बल्कि धीमी आत्महत्या के औज़ार बन चुके हैं।

विडंबना यह है कि जब विज्ञान हमारे सामने स्पष्ट नक्शे, ग्राफ़ और रुझान रख रहा है, तब नीति-निर्माण अब भी काग़ज़ी योजनाओं और घोषणाओं तक सीमित है। उपग्रह डेटा आज प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली की तरह काम कर सकता है—यह बता सकता है कि कहां तुरंत हस्तक्षेप चाहिए, कहां पुनर्स्थापन संभव है और कहां देर हो चुकी है। लेकिन क्या सरकारें और प्रशासन इसे निर्णय का आधार बना रहे हैं?

उत्तराखंड जैसे संवेदनशील पर्वतीय राज्य में अब “बाद में देखेंगे” की गुंजाइश नहीं है। ज़रूरत है:

  • वन और भूमि उपयोग नीति की कठोर समीक्षा की

  • उपग्रह-आधारित निगरानी को शासन का नियमित हिस्सा बनाने की

  • विकास परियोजनाओं पर पारिस्थितिक जवाबदेही तय करने की

  • और स्थानीय समुदायों को संरक्षण का भागीदार बनाने की

हिमालय ने समय पर चेतावनी दे दी है। उपग्रहों ने सच सामने रख दिया है।
अब अगर हम फिर भी चुप रहे, तो आने वाली पीढ़ियाँ यह नहीं पूछेंगी कि आपको पता था या नहीं,
वे पूछेंगी—जब पता था, तब आपने किया क्या?

Saturday, February 7, 2026

दीवारें जो स्कूल बन गईं

🎨 दीवारें जो स्कूल बन गईं

$1 मिलियन पुरस्कार जीतने वाली रूबल नागी की कहानी

भारत में जब शिक्षा की बात होती है, तो अक्सर इमारतों, बजट और नीतियों पर चर्चा होती है। लेकिन रूबल नागी ने यह साबित कर दिया कि शिक्षा के लिए न तो भव्य भवन ज़रूरी हैं और न ही भारी-भरकम संसाधन—अगर सोच रचनात्मक और संवेदनशील हो तो झुग्गी की दीवारें भी स्कूल बन सकती हैं।

रूबल नागी को मिला $1 मिलियन का ग्लोबल टीचर प्राइज केवल एक व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह उस भारत की जीत है जहाँ आज भी लाखों बच्चे गरीबी, बाल श्रम और सामाजिक उपेक्षा के कारण शिक्षा से वंचित हैं। एक कलाकार होते हुए उन्होंने कैनवास की सीमाओं को तोड़ा और समाज को अपनी कला का मंच बना दिया।

झुग्गी-बस्तियों की उजड़ी, गंदी और उपेक्षित दीवारों को उन्होंने “Living Walls of Learning” में बदल दिया। इन दीवारों पर उकेरे गए रंग सिर्फ सौंदर्य नहीं रचते, बल्कि अक्षर ज्ञान, गणित, विज्ञान, स्वच्छता और सामाजिक मूल्यों का पाठ पढ़ाते हैं। जिन बच्चों ने कभी स्कूल का दरवाज़ा नहीं देखा, वे खेल-खेल में सीखने लगे।

Rouble Nagi Art Foundation के माध्यम से देशभर में 800 से अधिक मुफ्त लर्निंग सेंटर्स स्थापित करना यह दर्शाता है कि जब सरकारें योजनाएँ बनाने में उलझी रहती हैं, तब समाज से निकली पहलें ज़मीनी बदलाव ला सकती हैं। यह प्रयोग शिक्षा को किताबों से बाहर निकालकर जीवन से जोड़ता है।

यह पुरस्कार सरकारों के लिए भी एक आईना है। क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था अब भी इमारतों और आंकड़ों तक सीमित रहेगी, या वह रचनात्मकता और समावेशन को अपनाएगी? क्या नीति-निर्माता कला, संस्कृति और स्थानीय संसाधनों को शिक्षा का हिस्सा बनाने का साहस दिखाएँगे?

रूबल नागी की सफलता यह संदेश देती है कि शिक्षा मंत्रालयों की फाइलों से नहीं, बल्कि समाज की दीवारों से भी क्रांति शुरू हो सकती है। जरूरत है ऐसे प्रयासों को संस्थागत समर्थन देने की, ताकि यह प्रयोग अपवाद न रह जाए, बल्कि मॉडल बने।

आज जब दुनिया ने एक भारतीय कलाकार-शिक्षक को सम्मानित किया है, तब भारत के लिए यह आत्ममंथन का क्षण है—क्या हम अपनी दीवारों को यूँ ही खामोश रहने देंगे, या उन्हें भी बोलने और सिखाने देंगे?

Thursday, February 5, 2026

भारत में मिलावट का लोकतंत्र: शुद्धता अमीरों के लिए, ज़हर गरीबों के लिए



भारत में मिलावट का लोकतंत्र: शुद्धता अमीरों के लिए, ज़हर गरीबों के लिए

भारत में आज़ादी के 75 साल बाद अगर कोई चीज़ सबसे ज़्यादा “लोकतांत्रिक” हो चुकी है, तो वह है मिलावट।
दूध, दही, घी, मसाले, दवा, सब्ज़ी, मिठाई—कुछ भी शुद्ध नहीं, कुछ भी सुरक्षित नहीं। फर्क सिर्फ़ इतना है कि अमीर वर्ग शुद्धता खरीद सकता है, जबकि गरीब मजबूरी में मिलावटी खा-पीकर ज़िंदा रहता है।

अमेरिका या अन्य देशों से भारत में सामान आना अपने आप में बुरी बात नहीं है। समस्या यह नहीं है कि विदेशी सामान आ रहा है, समस्या यह है कि भारत में आने के बाद उसका हश्र क्या होगा। जिस देश में दूध में पानी नहीं, बल्कि केमिकल मिलते हों, वहाँ यह उम्मीद करना कि विदेशी सामान सुरक्षित रहेगा—अपने आप को धोखा देना है।

मिलावट मजबूरी नहीं, मुनाफ़े की रणनीति है

अक्सर तर्क दिया जाता है कि “जनसंख्या ज़्यादा है, मांग ज़्यादा है, इसलिए मिलावट होती है।”
यह तर्क पूरी तरह झूठा है।

मिलावट होती है क्योंकि:

सज़ा का डर नहीं

निगरानी नाम की चीज़ काग़ज़ों में है

ईमानदारी घाटे का सौदा है

और जल्दी अमीर बनने की मानसिकता ने मेहनत, गुणवत्ता और नैतिकता को कुचल दिया है


भारत में आज ईमानदार उत्पादन करने वाला मूर्ख और मिलावट करने वाला होशियार माना जाता है—यही सबसे बड़ा सामाजिक पतन है।

गरीब का पेट, सबसे सस्ता प्रयोगशाला

देश में शुद्ध चीज़ अब “लक्ज़री प्रोडक्ट” बन चुकी है।
ऑर्गेनिक स्टोर, टेस्टेड फूड, ब्रांडेड हेल्थ प्रोडक्ट—सब अमीरों के लिए।
गरीब को मिलता है:

नकली दूध

रंग लगे मसाले

मिलावटी तेल

और असरहीन या नकली दवाइयाँ


यानी गरीब सिर्फ़ आर्थिक नहीं, स्वास्थ्य के स्तर पर भी सज़ा भुगत रहा है।

कामचोरी नहीं, गुणवत्ता से नफ़रत

कहना कड़वा है, लेकिन सच है—भारत में बड़ी आबादी को काम की गुणवत्ता की समझ ही नहीं।
काम “चलाऊ” हो, दिखने में ठीक लगे, पैसा मिल जाए—बस।
यही सोच:

इमारतें गिराती है

सड़कें बहा ले जाती है

दवाइयों को ज़हर बनाती है

और खाने को बीमारी


यह आलस्य नहीं, यह गुणवत्ता के प्रति घोर उपेक्षा है।

विदेशी सामान भी नहीं बचेगा

अगर यही हाल रहा, तो यह तय है कि:

अमेरिका से आने वाला दूध पाउडर

विदेशी दवाइयाँ

आयातित खाद्य पदार्थ


सबमें “देसी मिलावट” शुरू होगी।
क्योंकि भारत में मिलावट कोई अपराध नहीं, एक स्किल बन चुकी है—जिस पर शर्म नहीं, गर्व किया जाता है।

सवाल सरकार से नहीं, सिस्टम से है

यह किसी एक सरकार या पार्टी का मुद्दा नहीं है।
यह उस सिस्टम का परिणाम है जहाँ:

कानून है, लेकिन लागू नहीं

संस्थाएँ हैं, लेकिन निष्क्रिय

और जनता है, लेकिन मजबूर


जब तक मिलावट को राष्ट्रीय अपराध की तरह नहीं देखा जाएगा,
जब तक सज़ा त्वरित और सार्वजनिक नहीं होगी,
जब तक शुद्धता को अधिकार नहीं बनाया जाएगा—

तब तक भारत में विकास होगा, लेकिन स्वस्थ नागरिक नहीं।

और याद रखिए—
जो देश अपने गरीब को ज़हर खिलाकर विकास का जश्न मनाता है,
वह ज़्यादा दूर तक नहीं चल पाता।


न्यूज़ विचार और व्यव्हार

उत्तराखंड पर आर्थिक बोझ: बढ़ती अफसरशाही और घटती कार्यकुशलता की हकीकत

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