Monday, February 9, 2026

उपग्रह चेतावनी दे रहे हैं, क्या हम सुन रहे हैं?

 

उपग्रह चेतावनी दे रहे हैं, क्या हम सुन रहे हैं?

उत्तराखंड की हरियाली पर मंडराता जलवायु संकट

हिमालय चुप नहीं है—वह बदल रहा है। और यह बदलाव अब लोककथाओं, अनुभवों या अनुमान का विषय नहीं रहा। उपग्रहों की आँखें साफ़-साफ़ बता रही हैं कि उत्तराखंड की वनस्पति सिकुड़ रही है, मौसम का स्वाभाविक तालमेल टूट रहा है और पहाड़ी पारिस्थितिकी तंत्र एक असहज मोड़ पर खड़ा है। सवाल यह नहीं है कि संकट है या नहीं, सवाल यह है कि हम इसे कितनी गंभीरता से ले रहे हैं

आर्यभट्ट अवलोकन विज्ञान अनुसंधान संस्थान (एआरआईईएस) के वैज्ञानिकों द्वारा गूगल अर्थ इंजन जैसे अत्याधुनिक प्लेटफॉर्म के ज़रिए 22 वर्षों (2001–2022) के उपग्रह आंकड़ों का विश्लेषण किसी चेतावनी सायरन से कम नहीं है। एनडीवीआई और ईवीआई जैसे वनस्पति सूचकांक यह दिखाते हैं कि मानसून के बाद की हरियाली भी अब स्थायी नहीं रही। जो कभी प्राकृतिक चक्र था, वह अब अस्थिर पैटर्न में बदल चुका है।

यह महज़ “हरियाली कम होने” की कहानी नहीं है। यह जल स्रोतों के सूखने, जैव विविधता के क्षरण, भूस्खलन और आपदाओं की बढ़ती आवृत्ति और अंततः मैदानों तक फैलने वाले संकट की भूमिका है। हिमालय अगर बीमार है, तो गंगा के मैदानी क्षेत्र भी सुरक्षित नहीं रह सकते।

सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि वनस्पति पर प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन का प्रभाव समान नहीं है। कुछ क्षेत्र अत्यधिक प्रभावित हो रहे हैं—यानी संकट केंद्रित है, पर नीति और कार्रवाई बिखरी हुई। जंगलों की कटाई, कृषि विस्तार के नाम पर पहाड़ियों का दोहन, अवैध कटान, और अनियंत्रित शहरीकरण—ये सब विकास नहीं, बल्कि धीमी आत्महत्या के औज़ार बन चुके हैं।

विडंबना यह है कि जब विज्ञान हमारे सामने स्पष्ट नक्शे, ग्राफ़ और रुझान रख रहा है, तब नीति-निर्माण अब भी काग़ज़ी योजनाओं और घोषणाओं तक सीमित है। उपग्रह डेटा आज प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली की तरह काम कर सकता है—यह बता सकता है कि कहां तुरंत हस्तक्षेप चाहिए, कहां पुनर्स्थापन संभव है और कहां देर हो चुकी है। लेकिन क्या सरकारें और प्रशासन इसे निर्णय का आधार बना रहे हैं?

उत्तराखंड जैसे संवेदनशील पर्वतीय राज्य में अब “बाद में देखेंगे” की गुंजाइश नहीं है। ज़रूरत है:

  • वन और भूमि उपयोग नीति की कठोर समीक्षा की

  • उपग्रह-आधारित निगरानी को शासन का नियमित हिस्सा बनाने की

  • विकास परियोजनाओं पर पारिस्थितिक जवाबदेही तय करने की

  • और स्थानीय समुदायों को संरक्षण का भागीदार बनाने की

हिमालय ने समय पर चेतावनी दे दी है। उपग्रहों ने सच सामने रख दिया है।
अब अगर हम फिर भी चुप रहे, तो आने वाली पीढ़ियाँ यह नहीं पूछेंगी कि आपको पता था या नहीं,
वे पूछेंगी—जब पता था, तब आपने किया क्या?

Saturday, February 7, 2026

दीवारें जो स्कूल बन गईं

🎨 दीवारें जो स्कूल बन गईं

$1 मिलियन पुरस्कार जीतने वाली रूबल नागी की कहानी

भारत में जब शिक्षा की बात होती है, तो अक्सर इमारतों, बजट और नीतियों पर चर्चा होती है। लेकिन रूबल नागी ने यह साबित कर दिया कि शिक्षा के लिए न तो भव्य भवन ज़रूरी हैं और न ही भारी-भरकम संसाधन—अगर सोच रचनात्मक और संवेदनशील हो तो झुग्गी की दीवारें भी स्कूल बन सकती हैं।

रूबल नागी को मिला $1 मिलियन का ग्लोबल टीचर प्राइज केवल एक व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह उस भारत की जीत है जहाँ आज भी लाखों बच्चे गरीबी, बाल श्रम और सामाजिक उपेक्षा के कारण शिक्षा से वंचित हैं। एक कलाकार होते हुए उन्होंने कैनवास की सीमाओं को तोड़ा और समाज को अपनी कला का मंच बना दिया।

झुग्गी-बस्तियों की उजड़ी, गंदी और उपेक्षित दीवारों को उन्होंने “Living Walls of Learning” में बदल दिया। इन दीवारों पर उकेरे गए रंग सिर्फ सौंदर्य नहीं रचते, बल्कि अक्षर ज्ञान, गणित, विज्ञान, स्वच्छता और सामाजिक मूल्यों का पाठ पढ़ाते हैं। जिन बच्चों ने कभी स्कूल का दरवाज़ा नहीं देखा, वे खेल-खेल में सीखने लगे।

Rouble Nagi Art Foundation के माध्यम से देशभर में 800 से अधिक मुफ्त लर्निंग सेंटर्स स्थापित करना यह दर्शाता है कि जब सरकारें योजनाएँ बनाने में उलझी रहती हैं, तब समाज से निकली पहलें ज़मीनी बदलाव ला सकती हैं। यह प्रयोग शिक्षा को किताबों से बाहर निकालकर जीवन से जोड़ता है।

यह पुरस्कार सरकारों के लिए भी एक आईना है। क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था अब भी इमारतों और आंकड़ों तक सीमित रहेगी, या वह रचनात्मकता और समावेशन को अपनाएगी? क्या नीति-निर्माता कला, संस्कृति और स्थानीय संसाधनों को शिक्षा का हिस्सा बनाने का साहस दिखाएँगे?

रूबल नागी की सफलता यह संदेश देती है कि शिक्षा मंत्रालयों की फाइलों से नहीं, बल्कि समाज की दीवारों से भी क्रांति शुरू हो सकती है। जरूरत है ऐसे प्रयासों को संस्थागत समर्थन देने की, ताकि यह प्रयोग अपवाद न रह जाए, बल्कि मॉडल बने।

आज जब दुनिया ने एक भारतीय कलाकार-शिक्षक को सम्मानित किया है, तब भारत के लिए यह आत्ममंथन का क्षण है—क्या हम अपनी दीवारों को यूँ ही खामोश रहने देंगे, या उन्हें भी बोलने और सिखाने देंगे?

Thursday, February 5, 2026

भारत में मिलावट का लोकतंत्र: शुद्धता अमीरों के लिए, ज़हर गरीबों के लिए



भारत में मिलावट का लोकतंत्र: शुद्धता अमीरों के लिए, ज़हर गरीबों के लिए

भारत में आज़ादी के 75 साल बाद अगर कोई चीज़ सबसे ज़्यादा “लोकतांत्रिक” हो चुकी है, तो वह है मिलावट।
दूध, दही, घी, मसाले, दवा, सब्ज़ी, मिठाई—कुछ भी शुद्ध नहीं, कुछ भी सुरक्षित नहीं। फर्क सिर्फ़ इतना है कि अमीर वर्ग शुद्धता खरीद सकता है, जबकि गरीब मजबूरी में मिलावटी खा-पीकर ज़िंदा रहता है।

अमेरिका या अन्य देशों से भारत में सामान आना अपने आप में बुरी बात नहीं है। समस्या यह नहीं है कि विदेशी सामान आ रहा है, समस्या यह है कि भारत में आने के बाद उसका हश्र क्या होगा। जिस देश में दूध में पानी नहीं, बल्कि केमिकल मिलते हों, वहाँ यह उम्मीद करना कि विदेशी सामान सुरक्षित रहेगा—अपने आप को धोखा देना है।

मिलावट मजबूरी नहीं, मुनाफ़े की रणनीति है

अक्सर तर्क दिया जाता है कि “जनसंख्या ज़्यादा है, मांग ज़्यादा है, इसलिए मिलावट होती है।”
यह तर्क पूरी तरह झूठा है।

मिलावट होती है क्योंकि:

सज़ा का डर नहीं

निगरानी नाम की चीज़ काग़ज़ों में है

ईमानदारी घाटे का सौदा है

और जल्दी अमीर बनने की मानसिकता ने मेहनत, गुणवत्ता और नैतिकता को कुचल दिया है


भारत में आज ईमानदार उत्पादन करने वाला मूर्ख और मिलावट करने वाला होशियार माना जाता है—यही सबसे बड़ा सामाजिक पतन है।

गरीब का पेट, सबसे सस्ता प्रयोगशाला

देश में शुद्ध चीज़ अब “लक्ज़री प्रोडक्ट” बन चुकी है।
ऑर्गेनिक स्टोर, टेस्टेड फूड, ब्रांडेड हेल्थ प्रोडक्ट—सब अमीरों के लिए।
गरीब को मिलता है:

नकली दूध

रंग लगे मसाले

मिलावटी तेल

और असरहीन या नकली दवाइयाँ


यानी गरीब सिर्फ़ आर्थिक नहीं, स्वास्थ्य के स्तर पर भी सज़ा भुगत रहा है।

कामचोरी नहीं, गुणवत्ता से नफ़रत

कहना कड़वा है, लेकिन सच है—भारत में बड़ी आबादी को काम की गुणवत्ता की समझ ही नहीं।
काम “चलाऊ” हो, दिखने में ठीक लगे, पैसा मिल जाए—बस।
यही सोच:

इमारतें गिराती है

सड़कें बहा ले जाती है

दवाइयों को ज़हर बनाती है

और खाने को बीमारी


यह आलस्य नहीं, यह गुणवत्ता के प्रति घोर उपेक्षा है।

विदेशी सामान भी नहीं बचेगा

अगर यही हाल रहा, तो यह तय है कि:

अमेरिका से आने वाला दूध पाउडर

विदेशी दवाइयाँ

आयातित खाद्य पदार्थ


सबमें “देसी मिलावट” शुरू होगी।
क्योंकि भारत में मिलावट कोई अपराध नहीं, एक स्किल बन चुकी है—जिस पर शर्म नहीं, गर्व किया जाता है।

सवाल सरकार से नहीं, सिस्टम से है

यह किसी एक सरकार या पार्टी का मुद्दा नहीं है।
यह उस सिस्टम का परिणाम है जहाँ:

कानून है, लेकिन लागू नहीं

संस्थाएँ हैं, लेकिन निष्क्रिय

और जनता है, लेकिन मजबूर


जब तक मिलावट को राष्ट्रीय अपराध की तरह नहीं देखा जाएगा,
जब तक सज़ा त्वरित और सार्वजनिक नहीं होगी,
जब तक शुद्धता को अधिकार नहीं बनाया जाएगा—

तब तक भारत में विकास होगा, लेकिन स्वस्थ नागरिक नहीं।

और याद रखिए—
जो देश अपने गरीब को ज़हर खिलाकर विकास का जश्न मनाता है,
वह ज़्यादा दूर तक नहीं चल पाता।


जब धरोहर उजड़ी, तब पौड़ी भी खाली होने लगी

 

📰 संपादकीय | जब धरोहर उजड़ी, तब पौड़ी भी खाली होने लगी

पौड़ी गढ़वाल से पलायन को अक्सर रोज़गार, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी से जोड़ दिया जाता है। यह सच है, लेकिन अधूरा सच। असली सवाल यह है कि जब किसी क्षेत्र की आत्मा, पहचान और संस्कृति ही खत्म होने लगे, तो वहाँ लोग टिकेंगे कैसे?

पौड़ी का पलायन केवल लोगों का नहीं है —
यह धरोहरों, परंपराओं और इतिहास के टूटने का नतीजा है।

देवलगढ़ किला खंडहर में बदल रहा है।
प्राचीन नौले-धारे या तो सूख चुके हैं या पाट दिए गए हैं।
देवस्थल, मंदिर, पारंपरिक गाँव और लोक स्मृतियाँ प्रशासनिक उपेक्षा के कारण दम तोड़ रही हैं।

जब किसी गाँव का नौला सूखता है, तो सिर्फ़ पानी नहीं जाता —
गाँव का भविष्य सूखता है।

जब ऐतिहासिक धरोहरें टूटती हैं, तो सिर्फ़ पत्थर नहीं गिरते —
लोगों का जुड़ाव टूटता है।

यही कारण है कि पौड़ी के गाँव खाली होते गए।
घर बचे हैं, लेकिन आँगन नहीं।
मंदिर हैं, लेकिन उत्सव नहीं।
धरोहरें थीं, लेकिन अब स्मृति भी धुंधली पड़ती जा रही है।

विडंबना यह है कि सरकार पलायन रोकने की योजनाएँ बनाती है, लेकिन उस जड़ पर वार नहीं करती, जहाँ से पलायन जन्म लेता है। बिना संस्कृति, बिना पहचान और बिना सम्मान के कोई भी समाज टिक नहीं सकता।

अगर देवलगढ़ जैसे ऐतिहासिक स्थलों को संरक्षित किया जाता,
अगर नौले-धारों को पुनर्जीवित किया जाता,
अगर पारंपरिक गाँवों को सांस्कृतिक पर्यटन से जोड़ा जाता —
तो पौड़ी सिर्फ़ यादों का इलाका नहीं, रोज़गार और सम्मान का केंद्र बन सकता था।

आज ज़रूरत है कि सरकार और समाज दोनों यह समझें —
👉 धरोहर संरक्षण = पलायन रोकने की रणनीति
👉 संस्कृति बचाना = स्थानीय अर्थव्यवस्था बचाना
👉 इतिहास बचाना = भविष्य बचाना

अब भी समय है।
अगर पौड़ी की धरोहरें बचाई गईं, तो गाँव फिर बस सकते हैं।
अगर धरोहरें यूँ ही उजड़ती रहीं, तो आने वाली पीढ़ियाँ पौड़ी को सिर्फ़
“एक खाली जिला” के रूप में जानेंगी।

पलायन रोकना है, तो पहले पौड़ी की आत्मा बचानी होगी
धरोहरें बचेंगी — तभी पौड़ी लौटेगा।

Monday, February 2, 2026

जब मीडिया सत्ता की ढाल बने, तब जनता की पत्रकारिता ज़रूरी

जब मीडिया सत्ता की ढाल बने, तब जनता की पत्रकारिता ज़रूरी

लोकतंत्र के चार स्तंभों में मीडिया को इसलिए जगह दी गई थी ताकि वह सत्ता पर निगरानी रख सके, सवाल पूछ सके और आम नागरिक की आवाज़ बन सके। लेकिन जब मीडिया का एक बड़ा हिस्सा सत्ता की ढाल-कवच बन जाए, तब लोकतंत्र का संतुलन बिगड़ने लगता है।

आज हम ऐसे दौर में खड़े हैं जहाँ कई अख़बार और टीवी चैनल सरकार से सवाल पूछने के बजाय उसके फैसलों को正 ठहराने में लगे दिखते हैं। बहसें मुद्दों पर नहीं, नैरेटिव पर केंद्रित हैं। एंकर सवाल नहीं करते, आरोप तय करते हैं। सत्ता से जवाबदेही मांगने के बजाय आलोचकों को ही कटघरे में खड़ा किया जाता है।

इस माहौल में आम जनता की भूमिका बदल जाती है। नागरिक अब सिर्फ़ दर्शक नहीं रह जाता—उसे पत्रकार की भूमिका निभानी पड़ती है।

जनता की पत्रकारिता का अर्थ यह नहीं कि हर व्यक्ति कैमरा लेकर रिपोर्टर बन जाए, बल्कि इसका मतलब है:

सच को देखना और साझा करना

स्थानीय मुद्दों को उठाना, जिन्हें मुख्यधारा मीडिया नज़रअंदाज़ करता है

तथ्य, दस्तावेज़ और ज़मीनी हकीकत के साथ सवाल पूछना

डर और दबाव के बावजूद चुप न रहना


सोशल मीडिया, RTI, जनसुनवाई, और वैकल्पिक डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म—आज यही वे माध्यम हैं जहाँ से कई बार सच्ची खबरें सामने आती हैं। यह जन-पत्रकारिता सत्ता को असहज करती है, क्योंकि यह नियंत्रित नहीं होती।

बेशक, इसके खतरे भी हैं। अफ़वाह, अधूरी जानकारी और ट्रोल संस्कृति लोकतंत्र को नुकसान पहुँचा सकती है। इसलिए जन-पत्रकारिता की सबसे बड़ी शर्त है—जिम्मेदारी। बिना तथ्य, बिना संदर्भ और बिना विवेक की आवाज़ भी उतनी ही खतरनाक होती है जितनी गोदी मीडिया।

लेकिन एक बात साफ़ है—
जब मीडिया सत्ता के बहुत करीब हो जाए,
तो सत्य जनता से उम्मीद करता है।

पत्रकारिता भले ही पेशा हो,
लेकिन सवाल पूछना, सच कहना और जवाबदेही माँगना—
यह हर नागरिक का लोकतांत्रिक अधिकार और कर्तव्य है।

आज अगर जनता नहीं बोलेगी,
तो कल इतिहास सिर्फ़ सत्ता की कहानी लिखेगा—
सच की नहीं।

Saturday, January 31, 2026

हिमालय की थाली: जलवायु संकट के दौर में भारत का मौन संदेश



हिमालय की थाली: जलवायु संकट के दौर में भारत का मौन संदेश

27 जनवरी को राष्ट्रपति भवन में आयोजित राजकीय भोज को केवल कूटनीतिक औपचारिकता मानना एक बड़ी भूल होगी। यह दरअसल भारत की ओर से दुनिया को दिया गया एक पर्यावरणीय वक्तव्य था—बिना भाषण, बिना घोषणा, सिर्फ भोजन के ज़रिये।

जब पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता के क्षरण और खाद्य असुरक्षा की चुनौती से जूझ रही है, उस समय यूरोपीय संघ के नेताओं के सामने परोसी गई हिमालयी व्यंजनों की थाली यह बताने के लिए काफी थी कि टिकाऊ भविष्य के सूत्र आधुनिक प्रयोगशालाओं में नहीं, बल्कि सदियों पुराने स्थानीय ज्ञान में छिपे हैं।

हिमालयी भोजन परंपरा की आत्मा “कम से कम हस्तक्षेप” पर आधारित है। धीमी पकाने की तकनीक, मौसमी सामग्री, जंगली साग, मिलेट, कंद-मूल और स्थानीय बीज—ये सभी उस कृषि और जीवन पद्धति के प्रतीक हैं, जिसमें कार्बन फुटप्रिंट कम और प्रकृति के साथ टकराव न्यूनतम होता है। जखिया, थिचोनी, गुच्छी मशरूम या बिच्छू बूटी जैसे व्यंजन दरअसल जैव विविधता को सहेजने की सांस्कृतिक रणनीतियाँ हैं।

यह संयोग नहीं कि इस मेन्यू में किसी औद्योगिक फूड सिस्टम का दबदबा नहीं दिखता। न अत्यधिक प्रोसेसिंग, न लंबी सप्लाई चेन, न ही ऊर्जा-खपत वाली खेती। इसके उलट, यह थाली स्थानीय समुदायों की उस समझ को सामने लाती है जहाँ भोजन, जंगल और जल एक ही पारिस्थितिकी तंत्र के हिस्से हैं।

आज हिमालय खुद एक संकट क्षेत्र बन चुका है—ग्लेशियर पिघल रहे हैं, जल स्रोत सूख रहे हैं, और पारंपरिक खेती विस्थापित हो रही है। ऐसे में राष्ट्रपति भवन में हिमालयी भोजन का चयन एक प्रतीकात्मक स्वीकारोक्ति भी है कि पर्यावरण संरक्षण केवल भाषणों से नहीं, विकल्पों से होता है।

यह भोज यह भी याद दिलाता है कि यदि हम स्थानीय खाद्य प्रणालियों को बचाते हैं, तो हम केवल स्वाद नहीं बचाते—हम जलवायु संतुलन, ग्रामीण आजीविका और पीढ़ियों का ज्ञान बचाते हैं। यही कारण है कि यह आयोजन किसी फूड फेस्टिवल से आगे बढ़कर एक नीतिगत संकेत बन जाता है।

संभव है कि EU नेताओं ने उस शाम केवल एक अच्छा डिनर समझकर भोजन किया हो, लेकिन भारत ने उस थाली के माध्यम से यह साफ़ कर दिया कि उसका पर्यावरणीय दृष्टिकोण “ग्रीन स्लोगन” नहीं, बल्कि जीवन पद्धति है।

हिमालय की यह थाली दरअसल एक सवाल भी छोड़ जाती है—
क्या हम विकास की दौड़ में इस संतुलन को थाम पाएंगे,
या फिर इसे भी स्मृति में बदल देंगे?

क्योंकि अगर हिमालय सुरक्षित है,
तो मैदान भी सुरक्षित हैं।

थाली में हिमालय, स्वाद में कूटनीति



थाली में हिमालय, स्वाद में कूटनीति

जब वैश्विक कूटनीति व्यापार, शुल्क और समझौतों की भाषा बोलती है, तब कभी-कभी एक थाली भी वही बात उससे अधिक प्रभावशाली ढंग से कह देती है। 27 जनवरी को राष्ट्रपति भवन में यूरोपीय संघ (EU) के नेताओं के सम्मान में आयोजित राजकीय भोज ऐसा ही एक मौन लेकिन गहरा संवाद था—संस्कृति, प्रकृति और आत्मनिर्भर भारत का संवाद।

इस भोज की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि इसमें किसी आयातित लक्ज़री या पश्चिमी व्यंजनों का प्रदर्शन नहीं था, बल्कि भारतीय हिमालय की मिट्टी, मौसम और परंपरा से जन्मे स्वाद थे। कश्मीर से लेकर उत्तराखंड, हिमाचल और पूर्वोत्तर तक—पूरा हिमालय मानो एक थाली में सिमट आया हो।

यह मेन्यू केवल भोजन नहीं था, बल्कि एक स्पष्ट संदेश था—
👉 भारत अपनी पहचान को छुपाकर नहीं, बल्कि अपनी जड़ों के साथ वैश्विक मंच पर खड़ा है।

आज जब विकास को अक्सर प्रकृति के विरोध में खड़ा कर दिया जाता है, तब यह हिमालयी मेन्यू पहाड़ी समाज की उस समझ को सामने लाता है, जहाँ भोजन सिर्फ पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व का तरीका है। जखिया आलू, थिचोनी, गुच्छी मशरूम, जंगली साग, रागी और मिलेट—ये सब उस जीवन दर्शन के प्रतीक हैं जो कम संसाधनों में संतुलन सिखाता है।

महत्वपूर्ण यह भी है कि इस मेन्यू को युवा भारतीय शेफ्स ने रचा—जो परंपरा को “म्यूज़ियम की चीज़” नहीं, बल्कि जीवित और प्रासंगिक ज्ञान मानते हैं। उन्होंने भारतीय भोजन को बदले बिना, उसकी प्रस्तुति को वैश्विक भाषा दी। यह आत्मविश्वास का संकेत है, न कि अनुकरण का।

दरअसल, यह राजकीय भोज भारत की सॉफ्ट पावर डिप्लोमेसी का सटीक उदाहरण है। जिस समय FTA जैसे समझौतों में आर्थिक लाभ-हानि की गणनाएं चल रही थीं, उसी समय भारत ने यह भी दिखाया कि वह केवल बाज़ार नहीं, बल्कि सभ्यता भी है।

हिमालयी व्यंजनों की यह थाली यूरोपीय नेताओं के लिए सिर्फ स्वाद का अनुभव नहीं थी, बल्कि एक संकेत भी थी—
कि भारत के विकास मॉडल में प्रकृति, परंपरा और समुदाय हाशिये पर नहीं, केंद्र में हैं।

शायद यही असली आत्मनिर्भरता है—
जब आप दुनिया से संवाद करते हैं, लेकिन अपनी आवाज़ में।
और उस आवाज़ में, हिमालय की ख़ामोशी भी सुनाई देती है।

न्यूज़ विचार और व्यव्हार

उपग्रह चेतावनी दे रहे हैं, क्या हम सुन रहे हैं?

  उपग्रह चेतावनी दे रहे हैं, क्या हम सुन रहे हैं? उत्तराखंड की हरियाली पर मंडराता जलवायु संकट हिमालय चुप नहीं है—वह बदल रहा है। और यह बदलाव ...