“तुम ही कातिल, तुम ही मुद्दई, तुम ही मुंसिफ” — न्याय का यह कैसा ढांचा?
यह पंक्ति केवल एक भावनात्मक शिकायत नहीं, बल्कि व्यवस्था पर गंभीर आरोप है। जब सत्ता, प्रशासन और न्याय—तीनों की सीमाएँ धुंधली होने लगती हैं, तब नागरिक के सामने सबसे बड़ा संकट यही खड़ा होता है कि वह अपनी शिकायत लेकर जाए तो जाए कहाँ।
आज कई शहरों में यही स्थिति उभरती दिख रही है। कानून लागू करने वाली एजेंसियाँ ही कई बार आरोपों के घेरे में होती हैं, जांच की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं, और न्यायिक प्रक्रिया तक पहुँच आम नागरिक के लिए जटिल, महंगी और समय-साध्य बन जाती है। ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है—अगर शिकायतकर्ता, आरोपी और निर्णायक—तीनों भूमिकाएँ एक ही ढांचे में सिमट जाएँ, तो न्याय का अर्थ क्या रह जाता है?
यह स्थिति केवल कानून-व्यवस्था की विफलता नहीं, बल्कि संवैधानिक संतुलन के कमजोर पड़ने का संकेत है। लोकतंत्र का मूल सिद्धांत “checks and balances” इसी लिए बनाया गया था कि कोई एक संस्था इतनी शक्तिशाली न हो जाए कि जवाबदेही से मुक्त हो जाए। लेकिन जब संस्थाएँ पारदर्शिता खोने लगती हैं, तो नागरिक का भरोसा सबसे पहले टूटता है।
शहर में जीने का संकट केवल आर्थिक या भौतिक नहीं है—यह विश्वास का संकट है।
क्या पुलिस निष्पक्ष है?
क्या प्रशासन जवाबदेह है?
क्या न्यायपालिका तक पहुंच समान रूप से संभव है?
अगर इन सवालों के जवाब धुंधले हैं, तो नागरिक असुरक्षा में जीता है, चाहे अपराध हो या न हो।
इस परिदृश्य में समाधान केवल कानून कड़ा करने से नहीं आएगा। आवश्यक है:
संस्थागत जवाबदेही की मजबूती
स्वतंत्र जांच तंत्र
न्यायिक प्रक्रियाओं का सरलीकरण
और सबसे महत्वपूर्ण—नागरिक अधिकारों की वास्तविक सुरक्षा
जब तक “तुम ही कातिल, तुम ही मुद्दई, तुम ही मुंसिफ” जैसी स्थितियाँ बनी रहेंगी, तब तक शहर केवल भौगोलिक इकाई रहेगा, नागरिकता का अनुभव नहीं बन पाएगा।
अंततः प्रश्न वही है—
यदि व्यवस्था ही प्रश्न बन जाए, तो उत्तर कौन देगा?