Thursday, October 29, 2026

भूगोल ने उत्तराखंड को संपदा दी, अर्थव्यवस्था ने अवसर तलाशे और राजनीति ने विकास की दिशा तय की

 

भूगोल ने उत्तराखंड को संपदा दी, अर्थव्यवस्था ने अवसर तलाशे और राजनीति ने विकास की दिशा तय की



प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध उत्तराखंड में पलायन, बेरोजगारी और क्षेत्रीय असमानता आखिर क्यों? सवाल संसाधनों की कमी का नहीं, उनके आर्थिक उपयोग और राजनीतिक प्राथमिकताओं का है।

किसी भी क्षेत्र का भूगोल केवल उसकी भौगोलिक पहचान नहीं होता, बल्कि उसकी अर्थव्यवस्था की बुनियाद भी होता है। पहाड़, नदियाँ, जंगल, जलवायु, खनिज, उपजाऊ भूमि और प्राकृतिक संपदा किसी क्षेत्र के आर्थिक विकास की संभावनाएँ निर्धारित करते हैं। लेकिन इन संभावनाओं का वास्तविक आर्थिक लाभ कितना मिलेगा, यह उस क्षेत्र की आर्थिक नीतियों और राजनीतिक इच्छाशक्ति पर निर्भर करता है।

इसे एक वाक्य में समझा जा सकता है— भूगोल अर्थव्यवस्था की संभावनाएँ पैदा करता है, अर्थव्यवस्था उन्हें संपदा में बदलती है और राजनीति तय करती है कि उस संपदा पर किसका अधिकार होगा तथा उसका लाभ किसे मिलेगा।

उत्तराखंड इस विचार का एक जीवंत उदाहरण है।

प्राकृतिक संसाधनों की दृष्टि से उत्तराखंड किसी परिचय का मोहताज नहीं है। हिमालय, गंगा और उसकी सहायक नदियाँ, विशाल वन क्षेत्र, जैव विविधता, औषधीय वनस्पतियाँ, पर्यटन स्थल और पारंपरिक कृषि इस प्रदेश को विशिष्ट आर्थिक पहचान दे सकते हैं। जलविद्युत, पर्यटन, आयुष, खाद्य प्रसंस्करण, फल उत्पादन, जैविक खेती और वन आधारित उद्योगों में अपार संभावनाएँ हैं।

इसके बावजूद राज्य के पर्वतीय क्षेत्रों की आर्थिक वास्तविकता एक अलग कहानी कहती है। गाँव खाली हो रहे हैं, युवा रोजगार के लिए मैदानी शहरों और दूसरे राज्यों की ओर जा रहे हैं। खेती का रकबा और पारंपरिक आजीविका सिकुड़ रही है। कई क्षेत्रों में स्कूल, स्वास्थ्य सेवाएँ और बाजार कमजोर पड़ रहे हैं।

यह विरोधाभास एक बुनियादी सवाल खड़ा करता है—जिस भूगोल ने उत्तराखंड को इतनी प्राकृतिक संपदा दी, वही भूगोल यहाँ के निवासियों के लिए आर्थिक अवसर क्यों नहीं बन पा रहा?

संसाधन हैं, लेकिन स्थानीय अर्थव्यवस्था कहाँ है?

नदियों से बिजली बनती है, जंगलों से राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर पर्यावरणीय सेवाएँ मिलती हैं, पहाड़ों पर पर्यटन का कारोबार चलता है और मैदानों में उद्योग स्थापित होते हैं। लेकिन इन गतिविधियों से स्थानीय लोगों को मिलने वाले रोजगार, आय और आर्थिक हिस्सेदारी का आकलन भी उतना ही जरूरी है।

केवल परियोजनाओं की संख्या, निवेश की घोषणाओं और निर्माण कार्यों को विकास का पैमाना नहीं माना जा सकता। वास्तविक विकास तब होगा जब स्थानीय युवाओं को रोजगार मिले, किसानों को अपने उत्पाद का उचित मूल्य मिले, महिला स्वयं सहायता समूह आर्थिक रूप से मजबूत हों और गाँवों में उद्यम स्थापित हों।

भूगोल को आर्थिक ताकत में बदलने के लिए राजनीति की भूमिका निर्णायक है।

यदि सरकारी नीतियाँ केवल बड़े शहरों, बड़े निवेश और बड़ी परियोजनाओं को प्राथमिकता देंगी तो पर्वतीय क्षेत्रों की छोटी अर्थव्यवस्था पीछे छूटती जाएगी। पहाड़ों की जरूरतों के अनुरूप अलग आर्थिक मॉडल तैयार करना होगा। हर क्षेत्र में एक जैसी विकास नीति लागू करना व्यावहारिक नहीं है।

कोटद्वार, पौड़ी, लैंसडौन और आसपास के पर्वतीय क्षेत्रों को ही देखें। यहाँ कृषि आधारित उद्योग, जड़ी-बूटी प्रसंस्करण, स्थानीय खाद्य उत्पाद, पर्यटन, ग्रामीण सेवा उद्योग और छोटे उद्यम रोजगार के बड़े माध्यम बन सकते हैं। लेकिन इसके लिए सड़क और भवन निर्माण से आगे बढ़कर बाजार, प्रशिक्षण, तकनीक, पूँजी, परिवहन और विपणन की व्यवस्था करनी होगी।

सिद्धांत स्पष्ट होना चाहिए—पहाड़ के संसाधनों का उपयोग पहाड़ की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए हो और स्थानीय समुदाय को उसका उचित लाभ मिले।

राजनीति केवल सत्ता का प्रबंधन नहीं, संसाधनों और अवसरों के वितरण की व्यवस्था भी है।

इसलिए उत्तराखंड के विकास का मूल्यांकन इस आधार पर होना चाहिए कि राज्य के प्राकृतिक संसाधनों से कितनी आर्थिक संपदा पैदा हुई, उसमें स्थानीय लोगों की कितनी हिस्सेदारी रही और कितने युवाओं को अपने गाँव तथा क्षेत्र में सम्मानजनक रोजगार मिला।

प्राकृतिक संपदा किसी प्रदेश को संभावनाएँ देती है, लेकिन उन संभावनाओं को जनसमृद्धि में बदलना शासन की जिम्मेदारी है।

उत्तराखंड को अब केवल पर्यटन प्रदेश, ऊर्जा प्रदेश या देवभूमि कहने से आगे बढ़ना होगा। उसे ऐसी स्थानीय अर्थव्यवस्था बनानी होगी जिसमें पहाड़ का पानी, पहाड़ की जवानी और पहाड़ की संपदा का लाभ पहाड़ के लोगों तक पहुँचे।

क्योंकि भूगोल ने उत्तराखंड को समृद्ध होने का आधार दिया है, अब राजनीति को यह साबित करना है कि वह इस आधार पर स्थानीय लोगों का भविष्य भी बना सकती है।

छोटे अखबारों पर बड़ा संकट: क्या दम तोड़ देगी स्वतंत्र पत्रकारिता?

 

छोटे अखबारों पर बड़ा संकट: क्या दम तोड़ देगी स्वतंत्र पत्रकारिता?



देश में एक साल के भीतर 80 हजार से अधिक पत्र-पत्रिकाओं के पंजीकरण रद्द होने की खबर केवल सरकारी आंकड़ों में आई गिरावट नहीं है। यह देश में छोटे, स्वतंत्र और क्षेत्रीय प्रकाशनों के भविष्य पर गंभीर बहस का विषय है। सवाल यह नहीं कि निष्क्रिय और फर्जी प्रकाशनों पर कार्रवाई क्यों हुई, बल्कि सवाल यह है कि इस प्रक्रिया में वास्तविक रूप से प्रकाशित होने वाले छोटे समाचार पत्रों और पत्रिकाओं के हितों की कितनी चिंता की गई?

सरकार के अनुसार, प्रेस एवं आवधिक प्रकाशन अधिनियम, 2023 के तहत पंजीकरण व्यवस्था को डिजिटल और व्यवस्थित किया जा रहा है। वार्षिक विवरण, प्रकाशन संबंधी जानकारी और निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन जरूरी है। निश्चित रूप से फर्जी, निष्क्रिय और नियमों का उल्लंघन करने वाले प्रकाशनों पर कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन क्या हर छोटा प्रकाशक तकनीकी रूप से इतना सक्षम है कि वह डिजिटल पोर्टल की सभी प्रक्रियाओं को आसानी से पूरा कर सके? क्या दूरदराज के पहाड़ी क्षेत्रों में सीमित संसाधनों से समाचार पत्र निकालने वाले प्रकाशकों को पर्याप्त तकनीकी सहायता मिल रही है?

पत्रकारिता केवल बड़े मीडिया घरानों की संपत्ति नहीं है। देश में हजारों छोटे समाचार पत्र और मासिक पत्रिकाएं ऐसी हैं, जो सीमित आर्थिक संसाधनों के बावजूद स्थानीय समस्याओं को आवाज देती हैं। उत्तराखंड इसका उदाहरण है। यहां के छोटे प्रकाशन पलायन, बेरोजगारी, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, वन अधिकार, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और सरकारी योजनाओं की जमीनी हकीकत सामने लाते हैं। कई बार जिन गांवों की समस्याएं बड़े समाचार माध्यमों तक नहीं पहुंच पातीं, उन्हें स्थानीय समाचार पत्र ही सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बनाते हैं।

अब इन प्रकाशनों के सामने एक और चुनौती खड़ी हो रही है। डाक नियमों में बदलाव से मासिक और त्रैमासिक पत्रिकाओं की रियायती वितरण व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका है। छोटे प्रकाशनों के लिए डाक से प्रतियां भेजना केवल वितरण का माध्यम नहीं, बल्कि पाठकों तक पहुंचने का महत्वपूर्ण साधन है। यदि वितरण लागत बढ़ती है तो उसका सीधा असर सदस्यता, प्रसार और प्रकाशन की निरंतरता पर पड़ेगा।

विडंबना देखिए कि एक ओर सरकार डिजिटल इंडिया और सूचना के व्यापक प्रसार की बात करती है, दूसरी ओर छोटे प्रकाशनों के सामने बढ़ती अनुपालन प्रक्रिया, आर्थिक बोझ और वितरण संबंधी कठिनाइयों का सवाल खड़ा है। सरकारी विज्ञापन नीति भी यहां महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि विज्ञापनों का लाभ केवल बड़े और अधिक प्रसार वाले संस्थानों तक सीमित रहता है, तो छोटे प्रकाशनों के लिए आर्थिक रूप से टिके रहना और कठिन होगा।

यहां सरकार की जवाबदेही तय होनी चाहिए। फर्जी प्रकाशनों पर कार्रवाई का विरोध नहीं, लेकिन वास्तविक रूप से प्रकाशित होने वाले छोटे समाचार पत्रों को तकनीकी गलतियां सुधारने का पर्याप्त अवसर मिलना चाहिए। मासिक और त्रैमासिक पत्रिकाओं के लिए किफायती डाक व्यवस्था होनी चाहिए। सरकारी विज्ञापन नीति में पारदर्शिता के साथ लघु और क्षेत्रीय प्रकाशनों के लिए न्यायसंगत अवसर सुनिश्चित किए जाने चाहिए।

उत्तराखंड सरकार को भी इस विषय पर चुप नहीं रहना चाहिए। राज्य के 1,096 प्रकाशनों के पंजीकरण रद्द होने के आंकड़े की जिला और प्रकाशन श्रेणीवार समीक्षा होनी चाहिए। यह स्पष्ट होना चाहिए कि कितने प्रकाशन वास्तव में बंद थे, कितनों के दस्तावेज अधूरे थे और कितने तकनीकी या प्रक्रियागत कारणों से प्रभावित हुए।

लोकतंत्र में पत्रकारिता का महत्व केवल खबर प्रकाशित करने तक सीमित नहीं है। पत्रकारिता सत्ता से सवाल पूछती है, प्रशासन को जवाबदेह बनाती है और आम नागरिक को सूचना का अधिकार देती है। यदि छोटे समाचार पत्र आर्थिक और प्रशासनिक दबावों के कारण बंद होते हैं, तो इसका असर केवल प्रकाशकों और पत्रकारों पर नहीं, बल्कि उन पाठकों पर भी पड़ेगा जिनकी आवाज ये प्रकाशन बनते हैं।

सरकार को यह तय करना होगा कि उसकी प्राथमिकता केवल पंजीकरण का रिकॉर्ड दुरुस्त करना है या देश में वास्तविक और स्वतंत्र पत्रकारिता को जीवित रखने की व्यवस्था भी करना है।

क्योंकि फर्जी प्रकाशनों को रोकना प्रशासन की जिम्मेदारी है, लेकिन स्वतंत्र पत्रकारिता के लिए अनुकूल वातावरण बनाना भी लोकतांत्रिक शासन की उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी है।

ब्रह्मांड एक किताब है, और हम केवल एक पन्ने पर ठहरे हैं!

 

ब्रह्मांड एक किताब है, और हम केवल एक पन्ने पर ठहरे हैं!



क्या हमारा वर्तमान ही पूरी वास्तविकता है, या अस्तित्व की किताब में अनगिनत पन्ने हैं जिन्हें हम अभी पढ़ नहीं पाए हैं?

कल्पना कीजिए कि ब्रह्मांड एक विशाल किताब है। ऐसी किताब जिसका न कोई ज्ञात आरंभ है और न ही कोई निश्चित अंतिम पृष्ठ। उसके भीतर अनगिनत पन्ने हैं। हम फिलहाल उनमें से केवल एक पन्ने पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। हम इसी पन्ने को अपना वर्तमान, अपनी दुनिया और अपनी वास्तविकता मान बैठे हैं। लेकिन क्या यही पूरी किताब है?

यह विचार केवल कल्पना नहीं, बल्कि समय, अंतरिक्ष, चेतना और अस्तित्व को समझने का एक दार्शनिक रास्ता भी खोलता है।

विज्ञान में ब्लॉक यूनिवर्स (Block Universe) की अवधारणा इसी तरह के एक प्रश्न को सामने रखती है। आइंस्टीन के सापेक्षता सिद्धांत से जुड़ी इस व्याख्या में समय और अंतरिक्ष को अलग-अलग नहीं, बल्कि एक चार-आयामी स्पेस-टाइम संरचना के रूप में देखा जाता है। इस दृष्टिकोण में अतीत, वर्तमान और भविष्य को एक ही संरचना के अलग-अलग हिस्सों के रूप में समझा जा सकता है। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं कि भविष्य पहले से निश्चित है। इस पर वैज्ञानिक और दार्शनिक बहस जारी है।

अब सवाल उठता है कि यदि पूरी किताब मौजूद है, तो क्या हम केवल एक पन्ना पढ़ रहे हैं? क्या अतीत के पन्ने कहीं खो नहीं गए, बल्कि उसी किताब में मौजूद हैं? क्या भविष्य का पन्ना भी पहले से है, या हम अपने निर्णयों, घटनाओं और परिस्थितियों से उसे लिख रहे हैं?

यहीं से समानांतर ब्रह्मांड (Parallel Universes) और मल्टीवर्स (Multiverse) जैसी अवधारणाओं की चर्चा शुरू होती है। संभव है कि वास्तविकता हमारी कल्पना से कहीं अधिक व्यापक हो। लेकिन यह भी स्पष्ट रहना चाहिए कि समानांतर ब्रह्मांडों का अस्तित्व अभी प्रमाणित वैज्ञानिक तथ्य नहीं है।

ब्लैक होल इस कल्पना को और रोचक बनाते हैं। वे अंतरिक्ष-समय की प्रकृति को लेकर ऐसे प्रश्न खड़े करते हैं जिनके उत्तर आधुनिक विज्ञान अभी तलाश रहा है। कुछ सैद्धांतिक परिकल्पनाएँ यह भी विचार करती हैं कि क्या किसी ब्लैक होल के भीतर एक नए ब्रह्मांड का जन्म संभव है। लेकिन यह स्थापित वैज्ञानिक निष्कर्ष नहीं है।

इस पूरी चर्चा में सबसे दिलचस्प सवाल ब्रह्मांड से ज्यादा हमारी अपनी सीमाओं का है। हम जिस दुनिया को अंतिम सत्य समझते हैं, हो सकता है वह वास्तविकता का केवल एक सीमित हिस्सा हो। हमारी इंद्रियाँ, हमारी तकनीक और हमारी वैज्ञानिक समझ अभी उस किताब के सभी पन्ने पढ़ने में सक्षम नहीं हैं।

शायद सबसे बड़ी भूल यह है कि हम अपने वर्तमान पन्ने को ही पूरी किताब मान लेते हैं।

यह विचार हमें एक जरूरी विनम्रता सिखाता है। विज्ञान का काम हर प्रश्न का तत्काल उत्तर देना नहीं, बल्कि उन सवालों को जीवित रखना भी है जिनके उत्तर अभी हमारे पास नहीं हैं।

हो सकता है ब्रह्मांड की किताब में अनगिनत पन्ने हों। हो सकता है हम केवल एक पन्ने के पाठक हों। और यह भी संभव है कि जिसे हम अगला पन्ना समझ रहे हैं, वह किसी बिल्कुल अलग वास्तविकता का द्वार हो।

आखिर प्रश्न यह नहीं कि किताब कितनी बड़ी है, प्रश्न यह है कि क्या हम कभी अपने वर्तमान पन्ने से आगे देख पाएँगे?

Friday, October 23, 2026

स्व. सुधींद्र नेगी की छठवीं पुण्यतिथि पर ‘प्रयास’ पत्रिका के 17वें अंक का विमोचन, विभिन्न क्षेत्रों की प्रतिभाएं सम्मानित

 

स्व. सुधींद्र नेगी की छठवीं पुण्यतिथि पर ‘प्रयास’ पत्रिका के 17वें अंक का विमोचन, विभिन्न क्षेत्रों की प्रतिभाएं सम्मानित

कोटद्वार (भाबर), झंडीचौड़। स्वर्गीय सुधींद्र नेगी की छठवीं पुण्यतिथि के अवसर पर झंडीचौड़, कोटद्वार भाबर में श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस अवसर पर उनकी स्मृति को समर्पित तथा पर्यावरण संरक्षण के उद्देश्य से प्रकाशित होने वाली वार्षिक पत्रिका ‘प्रयास’ के 17वें अंक का विमोचन किया गया। कार्यक्रम में सामाजिक, पत्रकारिता, राजनीति, खेलकूद और शिक्षा सहित विभिन्न क्षेत्रों में योगदान देने वाले व्यक्तियों को सम्मानित कर उनके कार्यों को प्रोत्साहित किया गया।









कार्यक्रम में पूर्व कैबिनेट मंत्री सुरेंद्र सिंह नेगी मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। वहीं, गढ़वाल राइफल्स रेजिमेंट सेंटर से ब्रिगेडियर विनोद नेगी, सूबेदार मेजर शैलेंद्र सिंह बिष्ट तथा कांग्रेस की महानगर अध्यक्ष मीना बंचवान विशिष्ट अतिथि के रूप में शामिल हुए।

पत्रकारिता, समाजसेवा और शिक्षा के क्षेत्र में प्रतिभाओं का सम्मान

कार्यक्रम में विभिन्न क्षेत्रों में योगदान देने वाले लोगों को सम्मानित किया गया। पत्रकारिता के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए कोटद्वार प्रेस क्लब के सचिव दिनेश पाल गुसाईं को सम्मानित किया गया। सामाजिक क्षेत्र में योगदान के लिए मयंक कोठारी तथा शिक्षा के क्षेत्र में योगदान के लिए रिद्धि भट्ट को सम्मान प्रदान किया गया।



सम्मान समारोह का उद्देश्य समाज में सकारात्मक बदलाव के लिए कार्य करने वाले लोगों के योगदान को पहचान देना और अन्य लोगों को भी जनहित के कार्यों के लिए प्रेरित करना रहा।

पर्यावरण संरक्षण पर केंद्रित है ‘प्रयास’ पत्रिका

स्वर्गीय सुधींद्र नेगी की स्मृति में प्रकाशित वार्षिक पत्रिका ‘प्रयास’ पर्यावरण संरक्षण के प्रति जनजागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से समर्पित है। पत्रिका का 17वां अंक प्रकाशित होना इस पहल की निरंतरता को दर्शाता है। पर्यावरण संरक्षण आज के समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता है। ऐसे में पत्रिका के माध्यम से प्रकृति, पर्यावरण और सामाजिक उत्तरदायित्व के प्रति जागरूकता फैलाने का प्रयास महत्वपूर्ण है।

स्मृतियों के साथ सामाजिक सरोकारों को आगे बढ़ाने की पहल

पुण्यतिथि पर आयोजित यह कार्यक्रम स्वर्गीय सुधींद्र नेगी को याद करने के साथ-साथ समाज के विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय व्यक्तियों को प्रोत्साहित करने का अवसर भी बना। पर्यावरण संरक्षण को केंद्र में रखकर प्रकाशित पत्रिका और सम्मान समारोह के माध्यम से सामाजिक सहभागिता तथा जनहित के कार्यों को आगे बढ़ाने का संदेश दिया गया।

इस प्रकार, स्वर्गीय सुधींद्र नेगी की छठवीं पुण्यतिथि पर आयोजित कार्यक्रम में श्रद्धांजलि, पर्यावरण संरक्षण और प्रतिभा सम्मान के माध्यम से उनकी स्मृति को संजोने का प्रयास किया गया।

स्थान: झंडीचौड़, कोटद्वार भाबर, जनपद पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखंड।

रिपोर्ट: दिव्यांगवाणी समाचार डेस्क

एशियन पैरा गेम्स 2026: भारत का ऐतिहासिक प्रदर्शन, 114 पदकों के साथ अभियान समाप्त

 

एशियन पैरा गेम्स 2026: भारत का ऐतिहासिक प्रदर्शन, 114 पदकों के साथ अभियान समाप्त

Press Trust Of India

नई दिल्ली, 24 अक्टूबर 2026। भारतीय पैरा खिलाड़ियों ने एशियन पैरा गेम्स 2026 में शानदार प्रदर्शन करते हुए देश को अब तक का सर्वश्रेष्ठ पदक परिणाम दिलाया। भारत ने 30 स्वर्ण, 35 रजत और 49 कांस्य सहित कुल 114 पदक जीतकर अपना अभियान समाप्त किया। भारतीय दल पदक तालिका में चौथे स्थान पर रहा।


यह उपलब्धि इसलिए भी खास है, क्योंकि भारत ने पिछली प्रतियोगिता के अपने सर्वश्रेष्ठ आधिकारिक आंकड़े 108 पदकों को पीछे छोड़ दिया। इस बार भारतीय दल में 168 खिलाड़ी शामिल थे, जबकि 2023 के हांगझोउ संस्करण में भारत ने 309 खिलाड़ियों का दल भेजा था।



भारत की पदक तालिका

30

स्वर्ण पदक

35

रजत पदक

49

कांस्य पदक

114

कुल पदक

एथलेटिक्स बना भारत की सबसे बड़ी ताकत

भारत की पदक सफलता में पैरा एथलेटिक्स का सबसे बड़ा योगदान रहा। खिलाड़ियों ने इस स्पर्धा में 65 पदक जीते, जिनमें 22 स्वर्ण, 19 रजत और 24 कांस्य शामिल हैं। पैरा बैडमिंटन में 16 और पैरा तैराकी में 11 पदक मिले। पैरा तीरंदाजी में छह तथा पैरा निशानेबाजी में पांच पदक भारत के खाते में आए।


प्रमुख खेलों में भारत का प्रदर्शन

खेल

कुल पदक

पैरा एथलेटिक्स

65

पैरा बैडमिंटन

16

पैरा तैराकी

11

पैरा टेबल टेनिस

7

पैरा तीरंदाजी

6

पैरा निशानेबाजी

5

पैरा जूडो

2

पैरा पावरलिफ्टिंग

2

स्रोत: प्रकाशित खेलवार पदक आंकड़े।


कई खिलाड़ियों ने रचे नए कीर्तिमान

भारत के खिलाड़ियों ने एथलेटिक्स, बैडमिंटन, तीरंदाजी और निशानेबाजी में यादगार प्रदर्शन किया। संदीप ने पुरुषों की 400 मीटर टी64 स्पर्धा में विश्व रिकॉर्ड के साथ स्वर्ण जीता। हनेई ने भाला फेंक में विश्व रिकॉर्ड बनाया, जबकि सुमित अंतिल ने भाला फेंक में स्वर्ण पदक जीतकर अपनी श्रेष्ठता कायम रखी। निशानेबाज मोना अग्रवाल ने भी विश्व रिकॉर्ड प्रदर्शन के साथ स्वर्ण पदक हासिल किया।


दिव्यांग खिलाड़ियों की प्रतिभा और संकल्प को सलाम

एशियन पैरा गेम्स में भारत की सफलता केवल पदकों की संख्या नहीं है। यह उन खिलाड़ियों के संघर्ष, प्रशिक्षण, अनुशासन और आत्मविश्वास की उपलब्धि भी है, जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय मंच पर देश का गौरव बढ़ाया।

इस प्रदर्शन से यह संदेश भी मिलता है कि दिव्यांगजनों को उचित प्रशिक्षण, सुलभ खेल सुविधाएं, आर्थिक सहायता और समान अवसर उपलब्ध कराए जाएं तो वे विश्वस्तरीय उपलब्धियां हासिल कर सकते हैं। अब चुनौती इस प्रदर्शन को आगे बढ़ाने और देश के प्रत्येक क्षेत्र में पैरा खिलाड़ियों के लिए बेहतर अवसर तैयार करने की है।

संपादकीय संदेश: 114 पदकों की यह उपलब्धि उत्सव के साथ जिम्मेदारी का भी अवसर है। देश को अपने पैरा खिलाड़ियों को केवल जीत के बाद सम्मानित नहीं करना चाहिए, बल्कि उनके प्रशिक्षण, रोजगार, शिक्षा और भविष्य की सुरक्षा के लिए निरंतर व्यवस्था भी सुनिश्चित करनी चाहिए।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस, डीडी इंडिया और इंडिया टुडे की प्रकाशित रिपोर्टें।


Tuesday, September 1, 2026

दो पन्नों की विदाई और पत्रकारिता के एक पूरे युग की कहानी

 


दो पन्नों की विदाई और पत्रकारिता के एक पूरे युग की कहानी


सुंदर चंद ठाकुर को मिला सम्मान सिर्फ एक संपादक की विदाई नहीं, बल्कि उस पत्रकारिता का सम्मान है जिसमें अनुभव, जोखिम, साहित्य, अनुशासन और जनसरोकार साथ चलते हैं

किसी संपादक की विदाई पर अखबार का दो विशेष पन्ने प्रकाशित करना सामान्य घटना नहीं है। अखबार रोज निकलता है, हजारों खबरें आती हैं और अगले दिन पुरानी हो जाती हैं। लेकिन कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जिनकी विदाई को भी अखबार अपने इतिहास का हिस्सा बनाना चाहता है।

कैप्टन सुंदर चंद ठाकुर की विदाई इसी श्रेणी की घटना है।

31 अगस्त 2026 को नवभारत टाइम्स, मुंबई के रेजिडेंट एडिटर पद से उनकी सेवानिवृत्ति हुई। लगभग 16 वर्षों तक मुंबई संस्करण की संपादकीय जिम्मेदारी संभालने वाले ठाकुर की विदाई पर प्रकाशित विशेष पन्ने केवल एक व्यक्ति के सम्मान का दस्तावेज नहीं हैं; वे यह सवाल भी खड़ा करते हैं कि आखिर एक संपादक को महान क्या बनाता है—पद, लोकप्रियता, संस्थान या उसके पीछे छोड़ी हुई पेशेवर विरासत?

सुंदर चंद ठाकुर की कहानी इसलिए अलग है क्योंकि उनका पत्रकारिता में प्रवेश किसी पारंपरिक रास्ते से नहीं हुआ।

वे भारतीय सेना में अधिकारी रहे। 1997 में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर टाइम्स ऑफ इंडिया समूह में सिक्योरिटी ऑफिसर बने। फिर उसी संस्थान के हिंदी अखबार नवभारत टाइम्स के संपादकीय विभाग में पहुंचे। यह परिवर्तन अपने आप में जोखिम लेने की क्षमता का उदाहरण है।

और शायद पत्रकारिता में सबसे जरूरी चीज यही है—जोखिम लेने का साहस।

सुरक्षित रास्ते पर चलते हुए कोई व्यक्ति अच्छा कर्मचारी बन सकता है, लेकिन पत्रकार बनने के लिए कई बार अपने भीतर के प्रश्नों का पीछा करना पड़ता है।

ठाकुर ने यही किया।

उन्होंने सेना के अनुशासन को पीछे नहीं छोड़ा, बल्कि उसे पत्रकारिता की कार्यशैली में साथ लेकर आए। साहित्य से अपने रिश्ते को भी कायम रखा। वे कवि और लेखक रहे। फिटनेस उनकी जीवनशैली का हिस्सा रही और वे लंबे समय से मैराथन दौड़ते रहे हैं।

यानी एक व्यक्ति के भीतर सैनिक, पत्रकार, संपादक, लेखक और फिटनेस साधक—कई व्यक्तित्व साथ-साथ चलते रहे।

यही पत्रकारिता की असली खूबसूरती है।

इस पेशे की दुनिया इतनी बड़ी है कि एक उम्र भी प्रयोग करने के लिए छोटी पड़ सकती है।

लेकिन आज पत्रकारिता के सामने एक बड़ा संकट भी है।

सूचना बहुत है, सत्यापन कम।

आवाजें बहुत हैं, सुनने की क्षमता कम।

कंटेंट बहुत है, संदर्भ कम।

और पत्रकारिता के नाम पर ऐसा बहुत कुछ भी प्रसारित हो रहा है जिसे पत्रकारिता कहना स्वयं पत्रकारिता के साथ अन्याय होगा।

सोशल मीडिया और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने इस संकट को और जटिल बना दिया है। अब खबर लिखने के लिए केवल शब्दों की जरूरत नहीं; खबर की विश्वसनीयता साबित करने के लिए जांच, स्रोत, दस्तावेज और जमीन से जुड़ा अनुभव चाहिए।

ऐसे समय में सुंदर चंद ठाकुर की पेशेवर यात्रा एक महत्वपूर्ण संदेश देती है—

पत्रकारिता केवल सूचना का कारोबार नहीं है। यह दृष्टि का निर्माण है।

एक अच्छा संपादक केवल कॉपी पर लाल निशान नहीं लगाता। वह अपने पत्रकारों को सवाल करना सिखाता है।

वह उन्हें यह समझाता है कि सरकार का बयान खबर हो सकता है, लेकिन उसके दावे की जांच पत्रकारिता है।

वायरल वीडियो खबर हो सकता है, लेकिन उसकी सत्यता जांचना पत्रकारिता है।

किसी गरीब की समस्या खबर हो सकती है, लेकिन उस समस्या के पीछे मौजूद व्यवस्था को समझना पत्रकारिता है।

और सत्ता से सवाल पूछना केवल साहस नहीं—लोकतंत्र के प्रति जिम्मेदारी है।

सुंदर चंद ठाकुर की विदाई इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि उन्होंने अपने पीछे केवल पद नहीं छोड़ा, बल्कि एक ऐसी पेशेवर यात्रा छोड़ी है जिसमें लगातार सीखने और खुद को बदलने की क्षमता दिखाई देती है।

उनकी अपनी विदाई संबंधी टिप्पणियों में भी निष्पक्ष, विश्वसनीय और जनसरोकार वाली पत्रकारिता को प्राथमिकता देने की बात सामने आती है।

यही वह बिंदु है जहां आज की पत्रकारिता को अपने आप से सवाल करना चाहिए।

क्या हम पत्रकारिता को पेशा मान रहे हैं या जिम्मेदारी?

अगर पत्रकारिता केवल नौकरी है तो रिटायरमेंट के साथ कहानी खत्म हो जाती है।

लेकिन अगर पत्रकारिता सामाजिक जिम्मेदारी है तो पद खत्म होने के बाद भी पत्रकार की भूमिका खत्म नहीं होती।

शायद इसी कारण ठाकुर अपनी अगली पारी को भी समाज से जोड़ना चाहते हैं। रिपोर्टों के अनुसार वे मानसिक फिटनेस, नेतृत्व विकास, मीडिया, डिजिटल कंटेंट, फिटनेस और आध्यात्मिक विकास के क्षेत्रों में काम करने की योजना बना रहे हैं तथा उत्तराखंड में मैराथन और युवा कार्यक्रमों पर भी काम करना चाहते हैं।

यह उस व्यक्ति की कहानी है जो रिटायरमेंट को अंत नहीं मानता।

एक पारी समाप्त होती है, दूसरी शुरू हो जाती है।

और शायद यही जीवन का सबसे बड़ा सबक है।

पत्रकारिता में आज हमें ऐसे ही उदाहरणों की जरूरत है। ऐसे लोग जो नई पीढ़ी को यह बता सकें कि पत्रकार बनने के लिए केवल कैमरा, मोबाइल या सोशल मीडिया अकाउंट पर्याप्त नहीं है।

पढ़ना पड़ेगा।
जमीन पर जाना पड़ेगा।
सवाल पूछने पड़ेंगे।
स्रोतों की जांच करनी पड़ेगी।
और सबसे कठिन—अपने भीतर के पूर्वाग्रहों पर भी सवाल करना पड़ेगा।

सुंदर चंद ठाकुर को नवभारत टाइम्स मुंबई द्वारा दिए गए दो विशेष पन्नों का महत्व इसी संदर्भ में समझना चाहिए।

यह केवल विदाई नहीं है।

यह उस पेशेवर संस्कृति की स्वीकारोक्ति है जिसमें किसी व्यक्ति का मूल्य उसकी कुर्सी से बड़ा हो जाता है।

कुर्सी किसी को संपादक बना सकती है, लेकिन सम्मान अर्जित करने के लिए पूरी जिंदगी लगती है।

और शायद यही इस विदाई की सबसे बड़ी सीख है।

अखबार के दो पन्ने सुंदर चंद ठाकुर के लिए थे, लेकिन सवाल पूरी पत्रकारिता के लिए है—हम अपने पीछे कितने पन्ने छोड़ेंगे?

Friday, August 21, 2026

रिश्ते का फैसला व्यक्ति का या समाज का?

रिश्ते का फैसला व्यक्ति का या समाज का?

व्यक्तिगत स्वतंत्रता बनाम सामाजिक हस्तक्षेप पर दिल्ली हाई कोर्ट की टिप्पणी एक व्यापक संवैधानिक बहस को सामने लाती है

भारतीय समाज में विवाह केवल दो व्यक्तियों का संबंध नहीं माना जाता। इसके साथ परिवार, परंपरा, जाति, सामाजिक प्रतिष्ठा, धार्मिक मान्यताएं और सामुदायिक अपेक्षाएं भी जुड़ी होती हैं। यही कारण है कि जब कोई बालिग व्यक्ति अपनी पसंद से जीवनसाथी चुनता है या विवाह के बजाय सहमति से Live-in relationship में रहने का निर्णय लेता है, तो उसका निजी फैसला अक्सर सामाजिक बहस का विषय बन जाता है।

दिल्ली हाई कोर्ट की Uma Bharti & Anr. v. Government of NCT of Delhi & Ors. मामले में की गई टिप्पणी इसी मूल प्रश्न को सामने लाती है—क्या किसी बालिग व्यक्ति को अपने जीवन और अपने संबंध के बारे में निर्णय लेने के लिए परिवार या समाज की अनुमति आवश्यक होनी चाहिए?

इस प्रश्न का उत्तर केवल सामाजिक परंपराओं में नहीं, बल्कि संविधान में भी तलाशना होगा।

व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अर्थ क्या है?

भारतीय संविधान व्यक्ति को केवल मतदान या अभिव्यक्ति का अधिकार नहीं देता। संविधान की मूल भावना व्यक्ति की गरिमा, स्वतंत्रता और समानता की रक्षा भी करती है।

अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा भारतीय संवैधानिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार है। सर्वोच्च न्यायालय के अनेक निर्णयों ने समय के साथ यह स्पष्ट किया है कि गरिमापूर्ण जीवन का अर्थ केवल शारीरिक अस्तित्व नहीं है। इसमें व्यक्ति की निजता, स्वायत्तता और जीवन के महत्वपूर्ण व्यक्तिगत निर्णयों का अधिकार भी शामिल है।

किसी व्यक्ति का जीवन किसके साथ बिताना है, यह उसके जीवन का अत्यंत निजी निर्णय है।

इसका अर्थ यह नहीं कि हर व्यक्तिगत निर्णय कानून से ऊपर हो जाता है। यदि किसी संबंध में अपराध, धोखा, हिंसा, जबरदस्ती या किसी अन्य व्यक्ति के अधिकारों का उल्लंघन है, तो कानून हस्तक्षेप कर सकता है। लेकिन सिर्फ इसलिए कि परिवार या समाज उस रिश्ते से असहमत है, किसी बालिग की स्वतंत्रता समाप्त नहीं हो जाती।

यही अंतर समझना आवश्यक है।

परिवार की भूमिका बनाम व्यक्ति की स्वतंत्रता

भारतीय परिवार व्यवस्था की अपनी ताकत है। परिवार आर्थिक, भावनात्मक और सामाजिक सुरक्षा का महत्वपूर्ण माध्यम है। माता-पिता और वरिष्ठ सदस्य अपने अनुभव के आधार पर बच्चों को सलाह देते हैं। यह भूमिका महत्वपूर्ण है और इसे समाप्त करने की आवश्यकता नहीं है।

लेकिन सलाह और नियंत्रण में अंतर है।

परिवार किसी बालिग को समझा सकता है, अपने विचार रख सकता है, संभावित जोखिमों के बारे में बता सकता है। लेकिन क्या वह उसकी इच्छा के विरुद्ध उसे किसी संबंध से अलग कर सकता है?

यहीं से संवैधानिक अधिकार और सामाजिक परंपरा के बीच टकराव शुरू होता है।

लोकतांत्रिक व्यवस्था में परिवार का सम्मान महत्वपूर्ण है, लेकिन व्यक्ति की स्वतंत्रता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। यदि कोई व्यक्ति बालिग है, निर्णय लेने में सक्षम है और अपनी इच्छा से किसी संबंध में है, तो केवल सामाजिक प्रतिष्ठा या पारिवारिक दबाव उसके निर्णय को अमान्य नहीं कर सकता।

Live-in relationship को विवाह समझना गलत होगा

यहां एक कानूनी भ्रम दूर करना भी जरूरी है।

अदालत की ऐसी टिप्पणियों का अर्थ यह नहीं है कि Live-in relationship को विवाह के समान कानूनी दर्जा मिल गया है।

विवाह और Live-in relationship अलग कानूनी स्थितियां हैं।

विवाह से जुड़े अधिकार और दायित्व अलग कानूनों के अंतर्गत निर्धारित होते हैं। वहीं Live-in relationship में रहने वाले व्यक्तियों के अधिकार परिस्थितियों, लागू कानूनों और न्यायिक व्याख्याओं पर निर्भर करते हैं।

इसलिए व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा को विवाह की कानूनी मान्यता के बराबर नहीं समझना चाहिए।

मुद्दा यह है कि दो बालिग अपनी सहमति से किस तरह का निजी संबंध बनाएंगे, उसमें राज्य या समाज का हस्तक्षेप किस सीमा तक उचित है।

खतरे की स्थिति में राज्य की जिम्मेदारी

यदि किसी बालिग व्यक्ति ने अपनी इच्छा से संबंध बनाया है और इसके कारण उसे परिवार, समुदाय या किसी अन्य व्यक्ति से वास्तविक खतरा है, तो स्थिति और गंभीर हो जाती है।

राज्य की जिम्मेदारी केवल कानून बनाने तक सीमित नहीं है। पुलिस और प्रशासन का दायित्व नागरिकों के जीवन और स्वतंत्रता की रक्षा करना भी है।

यहां एक महत्वपूर्ण सिद्धांत सामने आता है—

व्यक्ति के निर्णय से असहमति और व्यक्ति के जीवन को खतरा पहुंचाना दो बिल्कुल अलग बातें हैं।

परिवार किसी रिश्ते को पसंद नहीं करता—यह एक सामाजिक स्थिति हो सकती है।

लेकिन उसी असहमति के कारण धमकी, हिंसा, जबरन कैद, पीछा करना या हमला किया जाता है—तो यह कानून-व्यवस्था का प्रश्न बन जाता है।

किसी भी परिस्थिति में तथाकथित 'परिवार की प्रतिष्ठा' कानून से ऊपर नहीं हो सकती।

क्या समाज की कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए?

यह भी कहना सही नहीं होगा कि व्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर समाज या परिवार की कोई भूमिका नहीं है।

समाज को अपने नैतिक और सांस्कृतिक मूल्यों पर बहस करने का अधिकार है। परिवार को अपने बच्चों के फैसलों पर चिंता व्यक्त करने का अधिकार है। लेकिन लोकतंत्र में विचार व्यक्त करने और किसी की स्वतंत्रता छीनने के बीच स्पष्ट सीमा होनी चाहिए।

यदि हम हर व्यक्तिगत निर्णय को सामाजिक स्वीकृति से जोड़ देंगे, तो स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ कमजोर पड़ जाएगा।

आज सवाल Live-in relationship का है। कल यही सवाल अंतरजातीय विवाह, अंतरधार्मिक विवाह, विवाह से बाहर स्वतंत्र जीवन, साथी चुनने की स्वतंत्रता और अन्य निजी फैसलों पर भी उठ सकता है।

इसलिए बहस किसी एक रिश्ते तक सीमित नहीं है।

यह वास्तव में व्यक्ति बनाम सामाजिक नियंत्रण की बहस है।

संविधान हमें क्या सिखाता है?

भारतीय संविधान की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक यह है कि वह व्यक्ति को भीड़ की इच्छा के सामने असहाय नहीं छोड़ता।

लोकतंत्र केवल बहुमत का शासन नहीं है। लोकतंत्र का वास्तविक परीक्षण यह है कि वह अल्पमत और व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा कितनी मजबूती से करता है।

यदि किसी बालिग व्यक्ति का निर्णय समाज के बहुमत को पसंद नहीं है, तब भी कानून को यह देखना होगा कि उस व्यक्ति के मूल अधिकार सुरक्षित हैं या नहीं।

यही संवैधानिक लोकतंत्र और सामाजिक बहुमतवाद के बीच अंतर है।

लेकिन स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी भी जरूरी है

व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अर्थ मनमानी नहीं है।

यदि दो लोग सहमति से संबंध में हैं तो दोनों की स्वतंत्र इच्छा, सुरक्षा और अधिकार महत्वपूर्ण हैं। किसी भी संबंध में हिंसा, जबरदस्ती, आर्थिक शोषण, धोखाधड़ी या दूसरे व्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन स्वीकार्य नहीं हो सकता।

विशेष रूप से यह समझना जरूरी है कि सहमति स्वतंत्र और वास्तविक होनी चाहिए।

बालिग होना अपने आप में हर व्यवहार को कानूनी नहीं बना देता। कानून की सीमाएं हर व्यक्ति पर समान रूप से लागू होती हैं।

इसलिए सही संवैधानिक दृष्टिकोण यह है—

व्यक्ति को निर्णय लेने की स्वतंत्रता मिले, लेकिन उस स्वतंत्रता के साथ कानून और दूसरे व्यक्ति के अधिकारों का सम्मान भी बना रहे।

असली चुनौती मानसिकता की है

भारत में कानून तेजी से आधुनिक संवैधानिक मूल्यों की ओर बढ़ा है, लेकिन सामाजिक मानसिकता में बदलाव अपेक्षाकृत धीमा है।

हम अक्सर युवा व्यक्ति को आर्थिक रूप से स्वतंत्र मान लेते हैं, लेकिन उसके निजी फैसलों को स्वतंत्र मानने के लिए तैयार नहीं होते।

यह विरोधाभास समाप्त करना होगा।

यदि कोई व्यक्ति बालिग है, तो उसके जीवन के फैसलों में उसकी इच्छा को महत्व देना लोकतांत्रिक समाज की स्वाभाविक आवश्यकता है।

माता-पिता का अनुभव महत्वपूर्ण है, लेकिन बच्चे का जीवन भी उसका अपना है।

समाज की परंपराएं महत्वपूर्ण हैं, लेकिन संविधान की स्वतंत्रता भी महत्वपूर्ण है।

और सबसे बढ़कर—सम्मान और असहमति साथ-साथ रह सकते हैं। हिंसा और नियंत्रण नहीं।

निष्कर्ष

दिल्ली हाई कोर्ट की टिप्पणी को केवल Live-in relationship के संदर्भ में देखना इस बहस को सीमित कर देगा। इसके पीछे भारतीय लोकतंत्र का एक बुनियादी प्रश्न छिपा है—

क्या हम नागरिक को एक स्वतंत्र व्यक्ति के रूप में स्वीकार करते हैं या उसकी जिंदगी के फैसले समाज की स्वीकृति पर छोड़ना चाहते हैं?

परिवार की भूमिका खत्म नहीं होनी चाहिए। सामाजिक संवाद भी खत्म नहीं होना चाहिए। लेकिन किसी बालिग व्यक्ति की स्वतंत्रता पर केवल सामाजिक असहमति के आधार पर अंकुश लगाना लोकतांत्रिक और संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप नहीं हो सकता।

भारत को ऐसी सामाजिक व्यवस्था की जरूरत है जहां माता-पिता अपने बच्चों को सलाह दे सकें, समाज अपने मूल्य रख सके और व्यक्ति अपने जीवन का निर्णय कर सके—बिना डर, हिंसा और जबरदस्ती के।

अंततः लोकतंत्र की पहचान केवल यह नहीं है कि बहुमत क्या चाहता है।

लोकतंत्र की असली पहचान यह है कि वह एक स्वतंत्र नागरिक को उसकी असहमति के बावजूद कितनी स्वतंत्रता देता है। 

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