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जब धरोहर उजड़ी, तब पौड़ी भी खाली होने लगी
📰 संपादकीय | जब धरोहर उजड़ी, तब पौड़ी भी खाली होने लगी
पौड़ी गढ़वाल से पलायन को अक्सर रोज़गार, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी से जोड़ दिया जाता है। यह सच है, लेकिन अधूरा सच। असली सवाल यह है कि जब किसी क्षेत्र की आत्मा, पहचान और संस्कृति ही खत्म होने लगे, तो वहाँ लोग टिकेंगे कैसे?
पौड़ी का पलायन केवल लोगों का नहीं है —
यह धरोहरों, परंपराओं और इतिहास के टूटने का नतीजा है।
देवलगढ़ किला खंडहर में बदल रहा है।
प्राचीन नौले-धारे या तो सूख चुके हैं या पाट दिए गए हैं।
देवस्थल, मंदिर, पारंपरिक गाँव और लोक स्मृतियाँ प्रशासनिक उपेक्षा के कारण दम तोड़ रही हैं।
जब किसी गाँव का नौला सूखता है, तो सिर्फ़ पानी नहीं जाता —
गाँव का भविष्य सूखता है।
जब ऐतिहासिक धरोहरें टूटती हैं, तो सिर्फ़ पत्थर नहीं गिरते —
लोगों का जुड़ाव टूटता है।
यही कारण है कि पौड़ी के गाँव खाली होते गए।
घर बचे हैं, लेकिन आँगन नहीं।
मंदिर हैं, लेकिन उत्सव नहीं।
धरोहरें थीं, लेकिन अब स्मृति भी धुंधली पड़ती जा रही है।
विडंबना यह है कि सरकार पलायन रोकने की योजनाएँ बनाती है, लेकिन उस जड़ पर वार नहीं करती, जहाँ से पलायन जन्म लेता है। बिना संस्कृति, बिना पहचान और बिना सम्मान के कोई भी समाज टिक नहीं सकता।
अगर देवलगढ़ जैसे ऐतिहासिक स्थलों को संरक्षित किया जाता,
अगर नौले-धारों को पुनर्जीवित किया जाता,
अगर पारंपरिक गाँवों को सांस्कृतिक पर्यटन से जोड़ा जाता —
तो पौड़ी सिर्फ़ यादों का इलाका नहीं, रोज़गार और सम्मान का केंद्र बन सकता था।
आज ज़रूरत है कि सरकार और समाज दोनों यह समझें —
👉 धरोहर संरक्षण = पलायन रोकने की रणनीति
👉 संस्कृति बचाना = स्थानीय अर्थव्यवस्था बचाना
👉 इतिहास बचाना = भविष्य बचाना
अब भी समय है।
अगर पौड़ी की धरोहरें बचाई गईं, तो गाँव फिर बस सकते हैं।
अगर धरोहरें यूँ ही उजड़ती रहीं, तो आने वाली पीढ़ियाँ पौड़ी को सिर्फ़
“एक खाली जिला” के रूप में जानेंगी।
पलायन रोकना है, तो पहले पौड़ी की आत्मा बचानी होगी।
धरोहरें बचेंगी — तभी पौड़ी लौटेगा।
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