Thursday, February 26, 2026

लकड़ी पड़ाव: व्यापारिक विरासत और वर्तमान कानूनी प्रश्न

लकड़ी पड़ाव: व्यापारिक विरासत और वर्तमान कानूनी प्रश्न

कोटद्वार का लकड़ी पड़ाव क्षेत्र केवल एक बाजार नहीं, बल्कि दशकों तक सरकार, व्यापारियों और स्थानीय समाज की साझा आर्थिक गतिविधियों का केंद्र रहा है।

ऐतिहासिक व्यापारिक संरचना

ब्रिटिश काल से लेकर स्वतंत्रता के बाद तक शासन द्वारा लकड़ी के ठेकेदारों को निर्धारित स्थानों पर बैठाया गया। इन्हीं स्थानों—विशेषकर लकड़ी पड़ाव—से व्यवस्थित रूप से लकड़ी का भंडारण, नीलामी और परिवहन होता था।

बड़े-बड़े लकड़ी गोदाम बने।

आरा मशीनें स्थापित हुईं।

रेलवे और बाद में सड़क परिवहन के माध्यम से माल की ढुलाई होने लगी।

सरकार को राजस्व प्राप्त हुआ और ठेकेदारों व व्यापारियों को आय का स्थायी स्रोत मिला।


लकड़ी व्यापार के साथ-साथ ट्रांसपोर्ट (गाड़ी), मजदूरी, अनाज व्यापार और अन्य सहायक व्यवसाय भी विकसित हुए। यह क्षेत्र धीरे-धीरे कोटद्वार की आर्थिक धुरी बन गया।


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नजूल भूमि का प्रश्न

कोटद्वार का बड़ा हिस्सा ऐतिहासिक रूप से नजूल भूमि की श्रेणी में आता है—अर्थात वह भूमि जो मूलतः सरकार के स्वामित्व में होती है और पट्टे/लीज पर दी जाती है। लकड़ी पड़ाव सहित कई व्यावसायिक क्षेत्र भी इसी श्रेणी में आते हैं।

दशकों पहले शासन की अनुमति और व्यवस्थाओं के तहत यहाँ ठेकेदारों और व्यापारियों को बसाया गया। उन्होंने—

व्यवसाय स्थापित किए

आवास बनाए

स्थानीय अर्थव्यवस्था को गति दी

हजारों लोगों को रोजगार दिया


ऐसे में यह प्रश्न उठता है कि जिन लोगों ने शासन की नीतियों के तहत यहाँ निवेश और बसावट की, उनके और उनके आश्रितों के अधिकारों की कानूनी सुरक्षा सुनिश्चित होनी चाहिए।


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कानूनी और नीतिगत पहलू

वर्तमान समय में नजूल भूमि से जुड़े विवाद कई शहरों में सामने आते रहे हैं। समाधान के लिए सामान्यतः निम्न विकल्प अपनाए जाते हैं—

1. दीर्घकालिक लीज का नवीनीकरण


2. फ्रीहोल्ड (स्वामित्व) में परिवर्तन की नीति


3. नियमितीकरण (रेगुलराइजेशन) की प्रक्रिया


4. पुनर्वास या वैकल्पिक व्यवस्था



लकड़ी पड़ाव जैसे क्षेत्रों में, जहाँ दशकों से वैध व्यापार और कर अदा किया जाता रहा है, वहाँ नीति-निर्माताओं को संतुलित दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है—ताकि सरकार के राजस्व हित भी सुरक्षित रहें और व्यापारियों व उनके आश्रित परिवारों के अधिकार भी संरक्षित हों।


लकड़ी पड़ाव केवल व्यापारिक स्थल नहीं, बल्कि कोटद्वार की आर्थिक आत्मा का प्रतीक है। शासन द्वारा स्थापित इस व्यापारिक ढांचे ने वर्षों तक सरकार और स्थानीय समाज दोनों को समृद्ध किया।

आज आवश्यकता है कि ऐतिहासिक योगदान और वर्तमान वास्तविकताओं को ध्यान में रखते हुए ऐसे क्षेत्रों के निवासियों और व्यवसायियों के हितों की कानूनी रूप से स्पष्ट और न्यायपूर्ण सुरक्षा सुनिश्चित की जाए—ताकि विकास, रोजगार और राजस्व की यह परंपरा आगे भी निरंतर बनी रहे।

कोटद्वार: गढ़वाल का प्रवेशद्वार और इतिहास की जीवंत धरोहर

कोटद्वार: गढ़वाल का प्रवेशद्वार और इतिहास की जीवंत धरोहर

को गढ़वाल का “द्वार” कहा जाता है। शिवालिक की पहाड़ियों की तलहटी में बसा यह नगर सदियों से व्यापार, सैन्य गतिविधियों, आध्यात्मिक यात्राओं और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का प्रमुख केंद्र रहा है। नाम के अनुसार—‘कोट’ (किला) और ‘द्वार’ (प्रवेश)—यह स्थान कभी गढ़वाल राज्य में प्रवेश का महत्वपूर्ण मार्ग था।


प्राचीन और मध्यकालीन पृष्ठभूमि

  • प्राचीन काल में यह क्षेत्र खोह घाटी के नाम से जाना जाता था।
  • कत्यूरी और बाद में पंवार (परमार) शासकों के समय यह इलाका गढ़वाल राज्य के अधीन रहा।
  • हिमालयी व्यापार मार्गों से जुड़ा होने के कारण यहाँ मैदान और पहाड़ के बीच वस्तुओं का आदान-प्रदान होता था।

गोरखा और ब्रिटिश काल

  • 1803 में गोरखाओं ने गढ़वाल पर कब्जा किया और कोटद्वार भी उनके अधीन आ गया।
  • 1815 में अंग्रेजों ने गोरखाओं को हराकर गढ़वाल का बड़ा भाग अपने नियंत्रण में लिया।

ब्रिटिश शासन के दौरान कोटद्वार का महत्व तेजी से बढ़ा—

  • 19वीं सदी के उत्तरार्ध में यहाँ रेलवे लाइन बिछाई गई, जिससे यह पहाड़ों के लिए मुख्य रेल संपर्क बना।
  • 1890 के आसपास कोटद्वार रेलवे स्टेशन अस्तित्व में आया और यह गढ़वाल का प्रमुख टर्मिनल बना।
  • लकड़ी, अनाज और अन्य वन उत्पादों का बड़ा व्यापार यहाँ से होता था।

स्वतंत्रता संग्राम और वीरता की भूमि

कोटद्वार स्वतंत्रता आंदोलन में भी सक्रिय रहा। यह भूमि वीर सैनिकों और राष्ट्रभक्तों की रही है।

  • भारत के प्रथम चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ का संबंध इसी क्षेत्र से रहा।
  • गढ़वाल राइफल्स की सैन्य परंपरा ने इस क्षेत्र को राष्ट्रीय पहचान दिलाई।

धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व

  • कोटद्वार के समीप स्थित आस्था का प्रमुख केंद्र है, जहाँ दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं।
  • यहाँ से कुछ दूरी पर विश्वप्रसिद्ध स्थित है, जो ब्रिटिश काल में सैन्य छावनी के रूप में विकसित हुआ।
  • यह क्षेत्र के निकट होने के कारण वन्यजीव और पर्यटन की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।

आधुनिक विकास

  • स्वतंत्रता के बाद कोटद्वार व्यापारिक नगर के रूप में विकसित हुआ।
  • 2017 में इसे नगर निगम का दर्जा मिला।
  • शिक्षा, पर्यटन और परिवहन के क्षेत्र में निरंतर विस्तार हो रहा है।

निष्कर्ष

कोटद्वार केवल एक शहर नहीं, बल्कि गढ़वाल की आत्मा का प्रवेशद्वार है। यहाँ इतिहास की गूंज, सैनिक परंपरा का गौरव, आस्था की शक्ति और प्राकृतिक सौंदर्य का संगम दिखाई देता है।

गढ़वाल में प्रवेश करने वाला हर यात्री कोटद्वार की धरती पर कदम रखते ही उस ऐतिहासिक धारा का हिस्सा बन जाता है, जिसने सदियों से पहाड़ और मैदान को जोड़े रखा है।

देहरादून: इतिहास की परतों में बसा दून का दिल

देहरादून: इतिहास की परतों में बसा दून का दिल

उत्तराखंड की राजधानी केवल प्राकृतिक सौंदर्य और शिक्षा संस्थानों के लिए ही नहीं, बल्कि अपने समृद्ध और रोचक इतिहास के लिए भी जानी जाती है। दून घाटी का यह शहर समय-समय पर विभिन्न शासकों, संस्कृतियों और प्रशासनिक बदलावों का साक्षी रहा है। प्रस्तुत है देहरादून के इतिहास की कुछ महत्वपूर्ण और दिलचस्प झलकियाँ—एक क्रमबद्ध आलेख के रूप में।

प्रारंभिक दौर: पृथ्वीपुर से देहरादून तक

1674 ई. से पहले देहरादून को पृथ्वीपुर के नाम से जाना जाता था। 1676 ई. में मुगल सम्राट ने यह क्षेत्र गुरु राम राय को दे दिया। गुरु राम राय ने यहाँ अपना “डेरा” स्थापित किया, जिससे आगे चलकर यह स्थान “देहरा-दून” कहलाया।

संघर्ष और सत्ता परिवर्तन

18वीं और 19वीं शताब्दी में देहरादून कई राजनीतिक उठापटक का केंद्र रहा—

  • 1757 में नजीबुद्दौला ने टिहरी नरेश को हराकर इस क्षेत्र पर अधिकार किया।
  • 1803 में गोरखाओं ने देहरादून पर कब्जा कर लिया।
  • 14 मई 1803 को खुड़बुड़ा (वर्तमान देहरादून) में गोरखाओं से युद्ध करते हुए गढ़वाल नरेश प्रद्युम्न शाह वीरगति को प्राप्त हुए।
  • 1815 में अंग्रेजों ने गोरखाओं को पराजित कर देहरादून अपने अधीन कर लिया।

ब्रिटिश शासन के साथ यहाँ प्रशासनिक और आधारभूत संरचनाओं का विकास प्रारंभ हुआ।

ब्रिटिश काल: विकास की नींव

अंग्रेजी शासन में देहरादून का योजनाबद्ध विकास हुआ—

  • 1823 में पलटन बाजार की स्थापना हुई, जहाँ दोनों ओर सैनिक पलटनें रहती थीं।
  • 1840 में यहाँ चीन से लाया गया लीची का पौधा लगाया गया—जो आज दून की पहचान बन चुका है।
  • 1842 में डाक सेवा आरंभ हुई।
  • 1854 में मिशन स्कूल की स्थापना हुई।
  • 1867 में नगर पालिका का गठन हुआ।
  • 1871 में देहरादून को जिला घोषित किया गया।
  • 1889 में नालापानी से जलापूर्ति शुरू हुई।

1901 में दून में रेल सेवा शुरू हुई, जिसने इसे देश के अन्य भागों से जोड़ा।

शिक्षा और सांस्कृतिक उन्नति

20वीं सदी की शुरुआत में देहरादून शिक्षा और संस्कृति का केंद्र बनने लगा—

  • 1902 में महादेवी कन्या पाठशाला और 1904 में डीएवी कॉलेज की स्थापना हुई।
  • 1916 में विद्युत आपूर्ति प्रारंभ हुई।
  • 1918 में ओलम्पिया और ओरिएंट सिनेमा घर खुले।
  • 1920 में यहाँ पहली बार कार देखी गई—और 1939 तक पूरे दून में केवल दो कारें थीं।

आधुनिक देहरादून की ओर

  • 1930 में मसूरी मोटर मार्ग बना, जिससे पर्यटन को बढ़ावा मिला।
  • 1944 में लाला मनशाराम ने 58 बीघा भूमि पर कनॉट प्लेस का निर्माण कराया।
  • 1948 में प्रेमनगर और क्लेमनटाउन के लिए सिटी बस सेवा शुरू हुई।
  • 1948 से 1953 के बीच घण्टाघर का निर्माण हुआ, जो आज दून की पहचान है।
  • 1978 में वायु सेवा प्रारंभ हुई, जिससे देहरादून राष्ट्रीय स्तर पर और सुलभ हो गया।

निष्कर्ष

देहरादून का इतिहास केवल तिथियों और घटनाओं का संग्रह नहीं, बल्कि संघर्ष, विकास, शिक्षा और सांस्कृतिक चेतना की यात्रा है। पृथ्वीपुर से राजधानी तक का यह सफर कई शासकों, युद्धों, सामाजिक परिवर्तनों और आधुनिक विकास की कहानी कहता है।

आज का देहरादून जहाँ एक ओर प्राकृतिक सौंदर्य और शैक्षणिक संस्थानों के लिए प्रसिद्ध है, वहीं दूसरी ओर यह अपने गौरवशाली अतीत की जीवित विरासत भी संजोए हुए है। दून की हर सड़क, हर बाजार और हर ऐतिहासिक इमारत अपने भीतर एक कहानी समेटे हुए है—जिसे जानना और सहेजना हमारी जिम्मेदारी है।

धार्मिक राष्ट्रवाद और उसके प्रभाव: विमर्श, विवेक और वास्तविकता

धार्मिक राष्ट्रवाद और उसके प्रभाव: विमर्श, विवेक और वास्तविकता

आज की वैश्विक राजनीति में धार्मिक पहचान आधारित राष्ट्रवाद एक शक्तिशाली विमर्श के रूप में उभरा है। पश्चिम एशिया में Zionism ने यहूदियों के ऐतिहासिक मातृभूमि के विचार को राजनीतिक रूप दिया और 1948 में Israel के गठन का मार्ग प्रशस्त किया। भारत में इसी प्रकार सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की अवधारणा को अक्सर Hindutva के संदर्भ में देखा जाता है।

परंतु प्रश्न यह है कि जब राष्ट्र की आत्मा को धर्म या सांस्कृतिक पहचान से जोड़ा जाता है, तो उसके दीर्घकालिक प्रभाव क्या होते हैं?

पहचान की राजनीति: शक्ति या चुनौती?

धार्मिक राष्ट्रवाद समर्थकों के लिए आत्मगौरव और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का माध्यम है। सदियों के ऐतिहासिक संघर्ष, उपनिवेशवाद और विभाजन के अनुभवों के बाद अपनी सांस्कृतिक जड़ों की ओर लौटना कई समाजों को स्वाभिमान का आधार देता है।

किन्तु दूसरी ओर, बहुधर्मी और बहुजातीय समाजों में यही आग्रह सामाजिक ध्रुवीकरण का कारण भी बन सकता है। यदि राष्ट्र की परिभाषा किसी एक पहचान से अत्यधिक जुड़ जाए, तो अन्य समुदायों में उपेक्षा या असुरक्षा की भावना उत्पन्न हो सकती है। लोकतंत्र की मजबूती विविधता के सम्मान में निहित है, न कि एकरूपता के आग्रह में।

लोकतांत्रिक मूल्यों की कसौटी

धर्म आधारित राष्ट्रवाद का सबसे बड़ा परीक्षण संविधान और संस्थाओं की स्वतंत्रता है। क्या राज्य सभी नागरिकों को समान दृष्टि से देख पा रहा है? क्या असहमति को स्थान मिल रहा है? यदि राष्ट्रवाद आलोचना को “राष्ट्रविरोध” में बदल देता है, तो लोकतांत्रिक संवाद कमजोर पड़ सकता है।

अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य

इज़राइल का उदाहरण बताता है कि धार्मिक-राष्ट्रीय पहचान सुरक्षा, विदेश नीति और पड़ोसी देशों के साथ संबंधों को गहराई से प्रभावित करती है। भारत जैसे विशाल और विविध देश के लिए यह संतुलन और भी संवेदनशील है। वैश्विक मंच पर छवि, निवेश, कूटनीति—ये सभी कारक आंतरिक सामाजिक सामंजस्य से जुड़े होते हैं।

संतुलन ही समाधान

यह मानना गलत होगा कि धार्मिक या सांस्कृतिक चेतना अपने आप में नकारात्मक है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब वह समावेशिता की जगह वर्चस्व का रूप ले लेती है। भारत की ऐतिहासिक शक्ति उसकी विविधता और सहअस्तित्व की परंपरा में रही है।

आज आवश्यकता है कि सांस्कृतिक स्वाभिमान और संवैधानिक मूल्यों के बीच संतुलन स्थापित किया जाए। राष्ट्र का निर्माण किसी एक पहचान से नहीं, बल्कि साझा नागरिकता और समान अधिकारों से होता है।

धार्मिक राष्ट्रवाद का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि वह बहुलता को अपनाता है या सीमित करता है। विवेकपूर्ण राजनीति वही है जो पहचान की ऊर्जा को सामाजिक समरसता में बदल सके—न कि विभाजन में।

Wednesday, February 25, 2026

दिव्यांगजन के लिए सरकारी योजनाओं का विश्लेषण



📰 1️⃣ दिव्यांगजन के लिए सरकारी योजनाओं का विश्लेषण

भारत में दिव्यांगजनों के अधिकारों और कल्याण के लिए कई महत्वपूर्ण योजनाएँ संचालित हैं। कानूनी आधार के रूप में Rights of Persons with Disabilities Act, 2016 ने दिव्यांगता को अधिकार-आधारित दृष्टिकोण से परिभाषित किया है। इस कानून ने शिक्षा, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा में आरक्षण व सुविधाओं को सुनिश्चित किया।

प्रमुख योजनाएँ

1. ADIP योजना

Department of Empowerment of Persons with Disabilities द्वारा संचालित Assistance to Disabled Persons for Purchase/Fitting of Aids and Appliances (ADIP) योजना के अंतर्गत कृत्रिम अंग, व्हीलचेयर, श्रवण यंत्र आदि उपलब्ध कराए जाते हैं।

विश्लेषण:
योजना उपयोगी है, परंतु ग्रामीण क्षेत्रों में वितरण और जागरूकता की कमी स्पष्ट दिखाई देती है।


2. दीनदयाल दिव्यांग पुनर्वास योजना (DDRS)

यह योजना गैर-सरकारी संगठनों के माध्यम से पुनर्वास सेवाओं को समर्थन देती है।

विश्लेषण:
एनजीओ की गुणवत्ता और निगरानी व्यवस्था को और मजबूत करने की आवश्यकता है।


3. सुगम्य भारत अभियान

Accessible India Campaign (Sugamya Bharat Abhiyan) का उद्देश्य सार्वजनिक भवनों, परिवहन और वेबसाइटों को दिव्यांग-अनुकूल बनाना है।

विश्लेषण:
शहरी क्षेत्रों में कुछ प्रगति हुई है, परंतु छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में सुगमता अभी भी अधूरी है।


4. शिक्षा एवं रोजगार आरक्षण

सरकारी नौकरियों में 4% आरक्षण का प्रावधान है। समावेशी शिक्षा को बढ़ावा दिया गया है।

चुनौती:
व्यवहारिक स्तर पर भर्ती प्रक्रिया और कार्यस्थल अनुकूलन में कमी।


सरकार की नीतियाँ सैद्धांतिक रूप से सशक्त हैं, परंतु क्रियान्वयन की गति धीमी है। आवश्यकता है:

  • प्रभावी निगरानी

  • स्थानीय स्तर पर जागरूकता अभियान

  • डिजिटल पहुंच में सुधार

  • निजी क्षेत्र की भागीदारी


 उत्तराखंड में दिव्यांगजन: चुनौतियाँ और संभावनाएँ

उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में दिव्यांगजनों की स्थिति विशेष ध्यान की मांग करती है। भौगोलिक दुर्गमता, सीमित स्वास्थ्य सुविधाएँ और रोजगार के कम अवसर उनकी चुनौतियों को और बढ़ा देते हैं।

राज्य सरकार द्वारा विभिन्न पेंशन योजनाएँ, छात्रवृत्ति और उपकरण वितरण कार्यक्रम संचालित किए जा रहे हैं। परंतु पर्वतीय क्षेत्रों में परिवहन और सुगमता की समस्या गंभीर है।

मुख्य चुनौतियाँ

  1. पहाड़ी क्षेत्रों में अस्पतालों की दूरी

  2. विशेष शिक्षकों की कमी

  3. कौशल विकास केंद्रों का अभाव

  4. सरकारी भवनों में रैंप और लिफ्ट की कमी

  5. सामाजिक जागरूकता का अभाव


संभावनाएँ

  • धार्मिक और पर्यटन क्षेत्र में दिव्यांग-अनुकूल अवसंरचना विकसित की जा सकती है।

  • कौशल विकास कार्यक्रमों को स्थानीय हस्तशिल्प और डिजिटल सेवाओं से जोड़ा जा सकता है।

  • पंचायत स्तर पर दिव्यांग रजिस्ट्रेशन और सहायता शिविर आयोजित किए जा सकते हैं।


सामाजिक कार्य की भूमिका

उत्तराखंड में सामाजिक कार्यकर्ताओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। वे:

  • सरकारी योजनाओं तक पहुँच सुनिश्चित कर सकते हैं

  • परिवारों को परामर्श दे सकते हैं

  • सामुदायिक जागरूकता बढ़ा सकते हैं

  • अधिकार आधारित दृष्टिकोण को मजबूत कर सकते हैं


समापन

दिव्यांगजन किसी राज्य की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि उसकी शक्ति हैं। यदि उत्तराखंड वास्तव में समावेशी विकास की ओर बढ़ना चाहता है, तो पहाड़ों की भौगोलिक चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए विशेष नीति निर्माण और सशक्त क्रियान्वयन आवश्यक है।



दिव्यांगजन: सहानुभूति नहीं, अधिकार आधारित दृष्टिकोण की आवश्यकता

 

📰 संपादकीय

दिव्यांगजन: सहानुभूति नहीं, अधिकार आधारित दृष्टिकोण की आवश्यकता

किसी भी सभ्य समाज की पहचान इस बात से होती है कि वह अपने सबसे कमजोर वर्ग के साथ कैसा व्यवहार करता है। भारत में दिव्यांगजन लंबे समय तक दया और सहानुभूति की दृष्टि से देखे जाते रहे हैं, जबकि आज आवश्यकता है उन्हें अधिकार, सम्मान और समान अवसर की दृष्टि से देखने की। दिव्यांगता कोई कमी नहीं, बल्कि विविधता का एक रूप है। समस्या व्यक्ति में नहीं, बल्कि समाज की संरचनाओं और मानसिकता में है।

भारत में दिव्यांगजनों के अधिकारों को मजबूत करने के लिए Rights of Persons with Disabilities Act, 2016 लागू किया गया, जिसने शिक्षा, रोजगार, राजनीतिक भागीदारी और सामाजिक सुरक्षा में उनके अधिकारों को कानूनी मान्यता दी। इस कानून ने दिव्यांगता की श्रेणियों का विस्तार किया और आरक्षण को बढ़ाया। इसके साथ ही भारत ने United Nations के UN Convention on the Rights of Persons with Disabilities को भी स्वीकार किया, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि दिव्यांगता एक मानवाधिकार का विषय है, न कि कल्याण मात्र का।

चुनौती केवल कानून नहीं, क्रियान्वयन है

हालांकि कानूनी ढांचा सशक्त है, परंतु ज़मीनी स्तर पर अनेक चुनौतियाँ मौजूद हैं। सरकारी भवनों में सुगम्यता की कमी, स्कूलों में विशेष शिक्षकों का अभाव, रोजगार के अवसरों में भेदभाव, और सामाजिक पूर्वाग्रह आज भी दिव्यांगजनों को पीछे धकेलते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति और भी चिंताजनक है, जहाँ जागरूकता और संसाधनों की भारी कमी है।

शिक्षा और रोजगार: आत्मनिर्भरता की कुंजी

समावेशी शिक्षा (Inclusive Education) दिव्यांगजनों को मुख्यधारा से जोड़ने का सबसे प्रभावी माध्यम है। यदि विद्यालयों में रैंप, ब्रेल पुस्तकें, सांकेतिक भाषा के प्रशिक्षित शिक्षक और सहायक उपकरण उपलब्ध हों, तो लाखों बच्चे आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ सकते हैं। रोजगार के क्षेत्र में आरक्षण के साथ-साथ कौशल विकास और डिजिटल प्रशिक्षण आवश्यक है।

सामाजिक दृष्टिकोण में परिवर्तन आवश्यक

समस्या केवल व्यवस्थागत नहीं, मानसिकता की भी है। दिव्यांगजन को “बेचारा” या “असमर्थ” मानने की सोच बदलनी होगी। अनेक दिव्यांग व्यक्तियों ने खेल, शिक्षा, प्रशासन और कला के क्षेत्र में उत्कृष्ट प्रदर्शन कर यह सिद्ध किया है कि अवसर मिलने पर वे किसी से कम नहीं।

सामाजिक कार्य की भूमिका

सामाजिक कार्यकर्ता इस परिवर्तन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। वे जागरूकता अभियान चला सकते हैं, सरकारी योजनाओं तक पहुँच सुनिश्चित कर सकते हैं, परिवारों को परामर्श दे सकते हैं और समुदाय को संवेदनशील बना सकते हैं। अधिकार आधारित दृष्टिकोण को मजबूत करने में सामाजिक कार्य एक सशक्त माध्यम है।

निष्कर्ष

दिव्यांगजन समाज पर बोझ नहीं, बल्कि उसकी शक्ति हैं। आवश्यकता है कि हम सहानुभूति से आगे बढ़कर समानता और अधिकार की बात करें। जब तक सार्वजनिक स्थान, शिक्षा प्रणाली, रोजगार बाजार और सामाजिक व्यवहार पूरी तरह समावेशी नहीं होंगे, तब तक वास्तविक विकास अधूरा रहेगा।

एक समावेशी भारत का निर्माण तभी संभव है जब हर नागरिक — चाहे वह किसी भी शारीरिक या मानसिक स्थिति में हो — गरिमा और अवसर के साथ जीवन जी सके।



सामाजिक कार्य : न्यायपूर्ण समाज की मौन आधारशिला

 

📰 संपादकीय

सामाजिक कार्य : न्यायपूर्ण समाज की मौन आधारशिला

तेजी से बदलते दौर में जब विकास को केवल आर्थिक आंकड़ों, ऊँची इमारतों और डिजिटल प्रगति से मापा जा रहा है, तब एक ऐसा क्षेत्र है जो चुपचाप समाज की जड़ों को मजबूत कर रहा है — सामाजिक कार्य। यह केवल सहायता प्रदान करने का कार्य नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, मानवाधिकार और मानवीय गरिमा की रक्षा का संगठित प्रयास है।

सामाजिक कार्य उस खाई को पाटता है जो नीति निर्माण और ज़मीनी हकीकत के बीच मौजूद होती है। राजधानी में बनी योजनाएँ तभी सार्थक होती हैं जब उनका लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे। इस प्रक्रिया में सामाजिक कार्यकर्ता ही वह कड़ी होता है जो व्यवस्था और वंचित वर्गों के बीच सेतु का काम करता है।

बढ़ती चुनौतियाँ और सामाजिक कार्य की आवश्यकता

आज समाज अनेक जटिल समस्याओं से जूझ रहा है—गरीबी, बेरोजगारी, घरेलू हिंसा, बाल श्रम, नशाखोरी, मानसिक स्वास्थ्य संकट और लैंगिक असमानता। ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में सामाजिक असंतुलन स्पष्ट दिखाई देता है। कोविड-19 महामारी ने यह भी सिद्ध कर दिया कि संकट की घड़ी में सबसे पहले जो वर्ग आगे आता है, वह सामाजिक कार्यकर्ताओं का ही होता है। उन्होंने राहत सामग्री पहुँचाई, परामर्श सेवाएँ दीं और सामुदायिक सहयोग को संगठित किया।

फिर भी विडंबना यह है कि सामाजिक कार्यकर्ताओं को अपेक्षित मान्यता और संसाधन नहीं मिल पाते। सीमित वेतन, भावनात्मक दबाव और प्रशासनिक जटिलताओं के बीच वे अपने दायित्वों का निर्वहन करते हैं।

सहायता से आगे—सशक्तिकरण की ओर

आधुनिक सामाजिक कार्य केवल दान या राहत तक सीमित नहीं है। इसका लक्ष्य है—सशक्तिकरण। किसी पीड़ित महिला को आश्रय देना महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे भी अधिक आवश्यक है उसे कानूनी जानकारी, परामर्श और आर्थिक आत्मनिर्भरता उपलब्ध कराना। बाल संरक्षण का अर्थ केवल बचाव नहीं, बल्कि शिक्षा, मनो-सामाजिक सहयोग और दीर्घकालिक पुनर्वास भी है।

नैतिकता और उत्तरदायित्व

सामाजिक कार्य का मूल आधार उसकी नैतिकता है। गोपनीयता, निष्पक्षता, सांस्कृतिक संवेदनशीलता और जवाबदेही इसके प्रमुख स्तंभ हैं। भावनात्मक प्रतिक्रियाओं से परे, सामाजिक कार्य वैज्ञानिक अध्ययन, शोध और कानूनी ढाँचे पर आधारित हस्तक्षेप को महत्व देता है।

आगे की दिशा

यदि सामाजिक न्याय संविधान की भावना है, तो सामाजिक कार्य उसका व्यावहारिक स्वरूप है। सरकारों को चाहिए कि वे सामाजिक कार्य के क्षेत्र में प्रशिक्षण, उचित वेतन और संस्थागत समर्थन को प्राथमिकता दें। विश्वविद्यालयों में व्यावहारिक प्रशिक्षण को मजबूत किया जाए और समाज को यह समझना होगा कि टिकाऊ विकास केवल आर्थिक प्रगति से संभव नहीं, बल्कि सामाजिक संतुलन से भी जुड़ा है।

किसी भी राष्ट्र की वास्तविक पहचान इस बात से होती है कि वह अपने सबसे कमजोर नागरिकों के साथ कैसा व्यवहार करता है। सामाजिक कार्य हमें यह स्मरण कराता है कि विकास तभी सार्थक है, जब उसमें संवेदना और समानता का समावेश हो।



न्यूज़ विचार और व्यव्हार

लकड़ी पड़ाव: व्यापारिक विरासत और वर्तमान कानूनी प्रश्न

लकड़ी पड़ाव: व्यापारिक विरासत और वर्तमान कानूनी प्रश्न कोटद्वार का लकड़ी पड़ाव क्षेत्र केवल एक बाजार नहीं, बल्कि दशकों तक सरकार, व्यापारियों...