भूगोल ने उत्तराखंड को संपदा दी, अर्थव्यवस्था ने अवसर तलाशे और राजनीति ने विकास की दिशा तय की
प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध उत्तराखंड में पलायन, बेरोजगारी और क्षेत्रीय असमानता आखिर क्यों? सवाल संसाधनों की कमी का नहीं, उनके आर्थिक उपयोग और राजनीतिक प्राथमिकताओं का है।
किसी भी क्षेत्र का भूगोल केवल उसकी भौगोलिक पहचान नहीं होता, बल्कि उसकी अर्थव्यवस्था की बुनियाद भी होता है। पहाड़, नदियाँ, जंगल, जलवायु, खनिज, उपजाऊ भूमि और प्राकृतिक संपदा किसी क्षेत्र के आर्थिक विकास की संभावनाएँ निर्धारित करते हैं। लेकिन इन संभावनाओं का वास्तविक आर्थिक लाभ कितना मिलेगा, यह उस क्षेत्र की आर्थिक नीतियों और राजनीतिक इच्छाशक्ति पर निर्भर करता है।
इसे एक वाक्य में समझा जा सकता है— भूगोल अर्थव्यवस्था की संभावनाएँ पैदा करता है, अर्थव्यवस्था उन्हें संपदा में बदलती है और राजनीति तय करती है कि उस संपदा पर किसका अधिकार होगा तथा उसका लाभ किसे मिलेगा।
उत्तराखंड इस विचार का एक जीवंत उदाहरण है।
प्राकृतिक संसाधनों की दृष्टि से उत्तराखंड किसी परिचय का मोहताज नहीं है। हिमालय, गंगा और उसकी सहायक नदियाँ, विशाल वन क्षेत्र, जैव विविधता, औषधीय वनस्पतियाँ, पर्यटन स्थल और पारंपरिक कृषि इस प्रदेश को विशिष्ट आर्थिक पहचान दे सकते हैं। जलविद्युत, पर्यटन, आयुष, खाद्य प्रसंस्करण, फल उत्पादन, जैविक खेती और वन आधारित उद्योगों में अपार संभावनाएँ हैं।
इसके बावजूद राज्य के पर्वतीय क्षेत्रों की आर्थिक वास्तविकता एक अलग कहानी कहती है। गाँव खाली हो रहे हैं, युवा रोजगार के लिए मैदानी शहरों और दूसरे राज्यों की ओर जा रहे हैं। खेती का रकबा और पारंपरिक आजीविका सिकुड़ रही है। कई क्षेत्रों में स्कूल, स्वास्थ्य सेवाएँ और बाजार कमजोर पड़ रहे हैं।
यह विरोधाभास एक बुनियादी सवाल खड़ा करता है—जिस भूगोल ने उत्तराखंड को इतनी प्राकृतिक संपदा दी, वही भूगोल यहाँ के निवासियों के लिए आर्थिक अवसर क्यों नहीं बन पा रहा?
संसाधन हैं, लेकिन स्थानीय अर्थव्यवस्था कहाँ है?
नदियों से बिजली बनती है, जंगलों से राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर पर्यावरणीय सेवाएँ मिलती हैं, पहाड़ों पर पर्यटन का कारोबार चलता है और मैदानों में उद्योग स्थापित होते हैं। लेकिन इन गतिविधियों से स्थानीय लोगों को मिलने वाले रोजगार, आय और आर्थिक हिस्सेदारी का आकलन भी उतना ही जरूरी है।
केवल परियोजनाओं की संख्या, निवेश की घोषणाओं और निर्माण कार्यों को विकास का पैमाना नहीं माना जा सकता। वास्तविक विकास तब होगा जब स्थानीय युवाओं को रोजगार मिले, किसानों को अपने उत्पाद का उचित मूल्य मिले, महिला स्वयं सहायता समूह आर्थिक रूप से मजबूत हों और गाँवों में उद्यम स्थापित हों।
भूगोल को आर्थिक ताकत में बदलने के लिए राजनीति की भूमिका निर्णायक है।
यदि सरकारी नीतियाँ केवल बड़े शहरों, बड़े निवेश और बड़ी परियोजनाओं को प्राथमिकता देंगी तो पर्वतीय क्षेत्रों की छोटी अर्थव्यवस्था पीछे छूटती जाएगी। पहाड़ों की जरूरतों के अनुरूप अलग आर्थिक मॉडल तैयार करना होगा। हर क्षेत्र में एक जैसी विकास नीति लागू करना व्यावहारिक नहीं है।
कोटद्वार, पौड़ी, लैंसडौन और आसपास के पर्वतीय क्षेत्रों को ही देखें। यहाँ कृषि आधारित उद्योग, जड़ी-बूटी प्रसंस्करण, स्थानीय खाद्य उत्पाद, पर्यटन, ग्रामीण सेवा उद्योग और छोटे उद्यम रोजगार के बड़े माध्यम बन सकते हैं। लेकिन इसके लिए सड़क और भवन निर्माण से आगे बढ़कर बाजार, प्रशिक्षण, तकनीक, पूँजी, परिवहन और विपणन की व्यवस्था करनी होगी।
सिद्धांत स्पष्ट होना चाहिए—पहाड़ के संसाधनों का उपयोग पहाड़ की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए हो और स्थानीय समुदाय को उसका उचित लाभ मिले।
राजनीति केवल सत्ता का प्रबंधन नहीं, संसाधनों और अवसरों के वितरण की व्यवस्था भी है।
इसलिए उत्तराखंड के विकास का मूल्यांकन इस आधार पर होना चाहिए कि राज्य के प्राकृतिक संसाधनों से कितनी आर्थिक संपदा पैदा हुई, उसमें स्थानीय लोगों की कितनी हिस्सेदारी रही और कितने युवाओं को अपने गाँव तथा क्षेत्र में सम्मानजनक रोजगार मिला।
प्राकृतिक संपदा किसी प्रदेश को संभावनाएँ देती है, लेकिन उन संभावनाओं को जनसमृद्धि में बदलना शासन की जिम्मेदारी है।
उत्तराखंड को अब केवल पर्यटन प्रदेश, ऊर्जा प्रदेश या देवभूमि कहने से आगे बढ़ना होगा। उसे ऐसी स्थानीय अर्थव्यवस्था बनानी होगी जिसमें पहाड़ का पानी, पहाड़ की जवानी और पहाड़ की संपदा का लाभ पहाड़ के लोगों तक पहुँचे।
क्योंकि भूगोल ने उत्तराखंड को समृद्ध होने का आधार दिया है, अब राजनीति को यह साबित करना है कि वह इस आधार पर स्थानीय लोगों का भविष्य भी बना सकती है।







