Monday, March 16, 2026

“Gross Environment Product (GEP) और डिजिटल पर्यावरण शासन : हरित विकास का नया मॉडल या नीति-विवाद की शुरुआत?”

 


“Gross Environment Product (GEP) और डिजिटल पर्यावरण शासन : हरित विकास का नया मॉडल या नीति-विवाद की शुरुआत?”

भारत में पर्यावरणीय नीति-निर्माण तेजी से डिजिटल प्लेटफॉर्म और डेटा-आधारित संकेतकों की ओर बढ़ रहा है। इसी संदर्भ में Ministry of Environment, Forest and Climate Change से जुड़े GEP (Gross Environment Product) जैसे कार्यक्रम और पोर्टल को सरकार द्वारा सतत विकास के नए औजार के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।

लेकिन पर्यावरणीय शासन का यह नया ढांचा केवल तकनीकी पहल नहीं है; यह आर्थिक विकास, पारिस्थितिक संतुलन और सामाजिक न्याय के जटिल संबंधों को भी पुनर्परिभाषित कर सकता है।


🌱 GEP क्या है और नीति-परिदृश्य में इसका महत्व

GEP को व्यापक रूप से एक ऐसे संकेतक के रूप में देखा जा रहा है, जो
👉 आर्थिक गतिविधियों के साथ-साथ पर्यावरणीय सेवाओं और पारिस्थितिक लागत को भी मापने का प्रयास करता है।

विशेषज्ञ चर्चाओं में यह बात सामने आई है कि GEP के अंतर्गत

  • वन, जल, वायु और मिट्टी जैसे चार प्रमुख प्राकृतिक क्षेत्रों के संकेतकों को

  • एकीकृत डेटा प्लेटफॉर्म पर लाने की आवश्यकता है,
    ताकि नीति-निर्माण अधिक वैज्ञानिक और दीर्घकालिक हो सके। (v1.wii.gov.in)

यह अवधारणा पारंपरिक GDP मॉडल से अलग है, क्योंकि यह
📊 विकास की पर्यावरणीय कीमत को भी सामने लाने का प्रयास करती है।


🌄 उत्तराखंड : GEP प्रयोग का संभावित केंद्र

हिमालयी राज्य Uttarakhand को GEP मॉडल के परीक्षण के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि

  • यहाँ की जैव विविधता

  • गंगा जैसी प्रमुख नदियों का उद्गम

  • पर्यटन और प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर अर्थव्यवस्था

इसे पर्यावरणीय संकेतक आधारित नीति प्रयोगों के लिए उपयुक्त क्षेत्र बनाते हैं।

वर्षों से जलवायु परिवर्तन, भूस्खलन और प्राकृतिक संसाधनों के क्षरण के जोखिमों को देखते हुए
राज्य स्तर पर भी डेटा-आधारित निगरानी और ज्ञान पोर्टल विकसित करने की जरूरत बताई गई है। (moef.gov.in)


📊 डिजिटल प्लेटफॉर्म : पारदर्शिता बनाम प्रशासनिक केंद्रीकरण

सरकारी दृष्टिकोण में डिजिटल पर्यावरण पोर्टल
✔️ मंजूरी प्रक्रिया को तेज
✔️ डेटा ट्रैकिंग को आसान
✔️ निवेश वातावरण को अनुकूल

बनाने का माध्यम हैं।

लेकिन पर्यावरणीय नीति विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि
👉 यदि डेटा का नियंत्रण केवल केंद्रीय एजेंसियों के पास रहा
👉 और स्थानीय समुदायों की भागीदारी सीमित हुई
तो यह डिजिटल प्रणाली लोकतांत्रिक पर्यावरण शासन के सिद्धांतों को कमजोर कर सकती है।


⚖️ कानूनी और संवैधानिक प्रश्न

भारत में पर्यावरण संरक्षण केवल प्रशासनिक दायित्व नहीं बल्कि

  • संविधान के नीति-निर्देशक तत्व

  • नागरिकों के मौलिक कर्तव्य

  • और न्यायपालिका द्वारा विस्तारित जीवन के अधिकार

से जुड़ा विषय है।

यदि GEP आधारित नीति-निर्माण
📌 परियोजनाओं को तेजी से मंजूरी देने का उपकरण बनता है
📌 लेकिन पर्यावरणीय प्रभाव के स्वतंत्र मूल्यांकन को कमजोर करता है
तो यह भविष्य में जनहित याचिकाओं और न्यायिक समीक्षा का कारण बन सकता है।


🏗️ विकास मॉडल की नई दिशा या संसाधन-आधारित अर्थव्यवस्था का दबाव

भारत में अवसंरचना, ऊर्जा और औद्योगिक परियोजनाओं की बढ़ती संख्या
पहले ही पर्यावरणीय संघर्षों को जन्म दे चुकी है।

GEP मॉडल यदि प्रभावी रूप से लागू होता है तो
👉 यह विकास की दिशा को सतत और संतुलित बना सकता है
लेकिन यदि इसे केवल
📉 निवेश आकर्षित करने की नीति
📈 आर्थिक संकेतकों को बेहतर दिखाने की रणनीति

के रूप में अपनाया गया, तो यह
🌍 प्राकृतिक संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव भी डाल सकता है।


👥 स्थानीय समुदायों की भूमिका : नीति का सबसे कमजोर कड़ी

पर्यावरणीय शासन में अक्सर देखा गया है कि

  • परियोजनाओं की जानकारी

  • पर्यावरणीय रिपोर्ट

  • और जोखिम आकलन

स्थानीय समुदायों तक समय पर नहीं पहुँचते।

डिजिटल प्लेटफॉर्म इस समस्या को हल कर सकते हैं,
लेकिन इसके लिए आवश्यक है कि
📢 डेटा सार्वजनिक डोमेन में सरल भाषा में उपलब्ध हो
📢 ग्राम सभाओं और नागरिक समाज को ऑनलाइन सहभागिता का अधिकार मिले

अन्यथा “डिजिटल पारदर्शिता” केवल प्रशासनिक शब्दावली बनकर रह जाएगी।


🌏 वैश्विक संदर्भ और भारत की नीति चुनौती

विश्व स्तर पर अब

  • कार्बन अकाउंटिंग

  • ग्रीन GDP

  • इकोसिस्टम सर्विस वैल्यूएशन

जैसे मॉडल तेजी से चर्चा में हैं।

भारत के लिए चुनौती यह है कि
👉 वह विकास की अपनी आवश्यकताओं
👉 और पर्यावरणीय दायित्वों

के बीच विश्वसनीय संतुलन स्थापित करे।

GEP जैसी पहल इस दिशा में
एक नीतिगत प्रयोग है,
जिसकी सफलता या असफलता
आने वाले वर्षों में भारत के विकास मॉडल को प्रभावित कर सकती है।


✍️ निष्कर्ष : डिजिटल पर्यावरण शासन की असली कसौटी

GEP पोर्टल और इससे जुड़े डिजिटल ढांचे
केवल प्रशासनिक नवाचार नहीं हैं —
ये भारत के हरित भविष्य की नीति-परिकल्पना का हिस्सा हैं।

लेकिन इनकी वास्तविक उपयोगिता तभी सिद्ध होगी जब
✔️ डेटा पारदर्शिता सुनिश्चित हो
✔️ स्थानीय समुदायों की भागीदारी मजबूत हो
✔️ वैज्ञानिक मूल्यांकन को प्राथमिकता मिले
✔️ और पर्यावरणीय न्याय को विकास के बराबर महत्व दिया जाए

अन्यथा
👉 डिजिटल हरित शासन
एक नए नीति-विवाद और सामाजिक संघर्ष का कारण भी बन सकता है।



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