Monday, March 9, 2026

कोटद्वार की शादियाँ और बढ़ता आर्थिक अंतर: क्या हम एक असमान समाज की ओर बढ़ रहे हैं?

 कोटद्वार की शादियाँ और बढ़ता आर्थिक अंतर: क्या हम एक असमान समाज की ओर बढ़ रहे हैं?

कोटद्वार और तराई-भाबर क्षेत्र में हाल के वर्षों में शादियों का स्वरूप तेजी से बदलता दिख रहा है। महंगे बैंक्वेट, सैकड़ों व्यंजन, भव्य सजावट और लाखों रुपये का खर्च — यह सब अब सामान्य दृश्य बनता जा रहा है। लेकिन इस चमक-दमक के पीछे एक गंभीर सामाजिक सवाल भी खड़ा हो रहा है।

शादियों में बड़ी मात्रा में भोजन और संसाधनों की बर्बादी दिखाई देती है, जबकि समाज का एक बड़ा वर्ग आज भी अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष कर रहा है। प्रकृति ने भोजन और प्राकृतिक संसाधनों पर सभी को समान अधिकार दिया है, लेकिन आर्थिक रूप से संपन्न वर्ग के अत्यधिक उपभोग और प्रदर्शन से संसाधनों का असंतुलन साफ नजर आने लगा है।

कोटद्वार जैसे शहरों में, जहां बाहर से आए आर्थिक रूप से मजबूत वर्ग की मौजूदगी बढ़ी है, वहां यह दिखावे की संस्कृति एक सामाजिक दबाव भी बना रही है। कई मध्यमवर्गीय परिवार सामाजिक प्रतिष्ठा बनाए रखने के लिए अपनी क्षमता से अधिक खर्च करने को मजबूर होते हैं। इसका परिणाम कर्ज, आर्थिक तनाव और मानसिक दबाव के रूप में सामने आता है।

पहाड़ की संस्कृति सादगी, सामुदायिक सहयोग और संतुलित जीवन पर आधारित रही है। लेकिन बदलती उपभोक्तावादी सोच उस परंपरा को धीरे-धीरे कमजोर कर रही है।

अब सवाल यह है कि क्या विवाह जैसे सामाजिक उत्सव को प्रतिष्ठा की प्रतिस्पर्धा बनाना जरूरी है?
या फिर समाज को सादगी, संतुलन और संसाधनों के जिम्मेदार उपयोग की ओर लौटने की जरूरत है?

क्या आपको भी लगता है कि शादियों का बढ़ता दिखावा समाज में आर्थिक दूरी को और बढ़ा रहा है?


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