भारत में पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता लोकतंत्र के वे स्तंभ हैं, जिन पर पारदर्शिता और जवाबदेही की पूरी संरचना टिकी है। अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत मिली अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सिर्फ एक अधिकार नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी भी है—सत्ता से सवाल पूछने की जिम्मेदारी।
लेकिन वास्तविकता इससे अलग और अधिक जटिल है।
एक ओर पत्रकार भ्रष्टाचार, भूमि घोटालों और प्रशासनिक लापरवाही को उजागर करते हैं, वहीं दूसरी ओर उन पर मानहानि, आईटी एक्ट या अन्य धाराओं में मुकदमे दर्ज होते हैं। Press Council of India जैसी संस्थाएं मौजूद होने के बावजूद जमीनी स्तर पर सुरक्षा का अभाव साफ दिखाई देता है।
सामाजिक कार्यकर्ताओं की स्थिति भी इससे भिन्न नहीं है। Public Interest Litigation (PIL) के माध्यम से वे जनहित के मुद्दों को अदालत तक ले जाते हैं, लेकिन कई बार उन्हें “विरोधी” या “विकास विरोधी” करार दिया जाता है।
उत्तराखंड जैसे संवेदनशील राज्य में, जहां पर्यावरण और विकास के बीच संतुलन एक बड़ा सवाल है, वहां इन दोनों वर्गों की भूमिका और भी अहम हो जाती है।
बफर जोन, अवैध खनन, भूमि विवाद—ये सभी मुद्दे तभी सामने आते हैं जब कोई पत्रकार या एक्टिविस्ट जोखिम उठाकर सच को सामने लाता है।
सवाल यह है:
क्या हमारे लोकतंत्र में “सवाल पूछना” अब जोखिम भरा पेशा बनता जा रहा है?
जब तक पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता सुरक्षित नहीं होंगे, तब तक लोकतंत्र की आत्मा भी सुरक्षित नहीं रह सकती।
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