भारत में मिलावट का लोकतंत्र: शुद्धता अमीरों के लिए, ज़हर गरीबों के लिए
भारत में आज़ादी के 75 साल बाद अगर कोई चीज़ सबसे ज़्यादा “लोकतांत्रिक” हो चुकी है, तो वह है मिलावट।
दूध, दही, घी, मसाले, दवा, सब्ज़ी, मिठाई—कुछ भी शुद्ध नहीं, कुछ भी सुरक्षित नहीं। फर्क सिर्फ़ इतना है कि अमीर वर्ग शुद्धता खरीद सकता है, जबकि गरीब मजबूरी में मिलावटी खा-पीकर ज़िंदा रहता है।
अमेरिका या अन्य देशों से भारत में सामान आना अपने आप में बुरी बात नहीं है। समस्या यह नहीं है कि विदेशी सामान आ रहा है, समस्या यह है कि भारत में आने के बाद उसका हश्र क्या होगा। जिस देश में दूध में पानी नहीं, बल्कि केमिकल मिलते हों, वहाँ यह उम्मीद करना कि विदेशी सामान सुरक्षित रहेगा—अपने आप को धोखा देना है।
मिलावट मजबूरी नहीं, मुनाफ़े की रणनीति है
अक्सर तर्क दिया जाता है कि “जनसंख्या ज़्यादा है, मांग ज़्यादा है, इसलिए मिलावट होती है।”
यह तर्क पूरी तरह झूठा है।
मिलावट होती है क्योंकि:
सज़ा का डर नहीं
निगरानी नाम की चीज़ काग़ज़ों में है
ईमानदारी घाटे का सौदा है
और जल्दी अमीर बनने की मानसिकता ने मेहनत, गुणवत्ता और नैतिकता को कुचल दिया है
भारत में आज ईमानदार उत्पादन करने वाला मूर्ख और मिलावट करने वाला होशियार माना जाता है—यही सबसे बड़ा सामाजिक पतन है।
गरीब का पेट, सबसे सस्ता प्रयोगशाला
देश में शुद्ध चीज़ अब “लक्ज़री प्रोडक्ट” बन चुकी है।
ऑर्गेनिक स्टोर, टेस्टेड फूड, ब्रांडेड हेल्थ प्रोडक्ट—सब अमीरों के लिए।
गरीब को मिलता है:
नकली दूध
रंग लगे मसाले
मिलावटी तेल
और असरहीन या नकली दवाइयाँ
यानी गरीब सिर्फ़ आर्थिक नहीं, स्वास्थ्य के स्तर पर भी सज़ा भुगत रहा है।
कामचोरी नहीं, गुणवत्ता से नफ़रत
कहना कड़वा है, लेकिन सच है—भारत में बड़ी आबादी को काम की गुणवत्ता की समझ ही नहीं।
काम “चलाऊ” हो, दिखने में ठीक लगे, पैसा मिल जाए—बस।
यही सोच:
इमारतें गिराती है
सड़कें बहा ले जाती है
दवाइयों को ज़हर बनाती है
और खाने को बीमारी
यह आलस्य नहीं, यह गुणवत्ता के प्रति घोर उपेक्षा है।
विदेशी सामान भी नहीं बचेगा
अगर यही हाल रहा, तो यह तय है कि:
अमेरिका से आने वाला दूध पाउडर
विदेशी दवाइयाँ
आयातित खाद्य पदार्थ
सबमें “देसी मिलावट” शुरू होगी।
क्योंकि भारत में मिलावट कोई अपराध नहीं, एक स्किल बन चुकी है—जिस पर शर्म नहीं, गर्व किया जाता है।
सवाल सरकार से नहीं, सिस्टम से है
यह किसी एक सरकार या पार्टी का मुद्दा नहीं है।
यह उस सिस्टम का परिणाम है जहाँ:
कानून है, लेकिन लागू नहीं
संस्थाएँ हैं, लेकिन निष्क्रिय
और जनता है, लेकिन मजबूर
जब तक मिलावट को राष्ट्रीय अपराध की तरह नहीं देखा जाएगा,
जब तक सज़ा त्वरित और सार्वजनिक नहीं होगी,
जब तक शुद्धता को अधिकार नहीं बनाया जाएगा—
तब तक भारत में विकास होगा, लेकिन स्वस्थ नागरिक नहीं।
और याद रखिए—
जो देश अपने गरीब को ज़हर खिलाकर विकास का जश्न मनाता है,
वह ज़्यादा दूर तक नहीं चल पाता।
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