Sunday, March 1, 2026

कोटद्वार की राजनीति: सेवा का पथ या करियर का मंच?

कोटद्वार की राजनीति: सेवा का पथ या करियर का मंच?

आज केवल एक नगर नहीं, बल्कि उत्तराखंड की बदलती राजनीतिक संस्कृति का आईना बनता जा रहा है। यहाँ जनप्रतिनिधियों और पूर्व जनप्रतिनिधियों का जमावड़ा है। बैठकों, आयोजनों, स्वागत-सम्मानों और शक्ति-प्रदर्शन के बीच राजनीति का एक समानांतर पाठशाला-सा माहौल दिखाई देता है। परंतु इस दृश्य के पीछे एक गहरी बेचैनी भी छिपी है—राजनीति का उद्देश्य आखिर है क्या?

कोटद्वार में आज एक ऐसा नौजवान भी दिखता है जो उभरता है, गिरता है, फिर संभलता है और खुद को किसी न किसी खांचे में फिट करने की कोशिश करता है। वह राजनीति का ‘क, ख, ग’ सीख रहा है—लेकिन किस उद्देश्य से? समाज सेवा के लिए या पद की प्राप्ति के लिए? वह किसी नेता के इर्द-गिर्द मंडराता है, राजनैतिक चाटुकारिता को कौशल मानता है, और अवसर की प्रतीक्षा में अपने करियर की तलाश करता भटकता रहता है।

सिर्फ युवा ही नहीं, कई पूर्व कर्मचारी और सामाजिक कार्यकर्ता भी इस दोराहे पर खड़े दिखाई देते हैं। वे अपने अनुभव और नेटवर्क के सहारे राजनीति में जगह बनाना चाहते हैं, पर स्पष्ट वैचारिक दिशा के बिना। परिणामस्वरूप राजनीति एक मिशन के बजाय ‘सेट होने’ का माध्यम बनती जा रही है।

सबसे बड़ा प्रश्न यही है—क्या राजनीति समाज सेवा है या करियर? यदि राजनीति को केवल करियर के रूप में देखा जाएगा, तो प्राथमिकता पद, प्रतिष्ठा और संसाधन होंगे; न कि जनसमस्याएँ। फिर विकास की चर्चा भी रणनीति बन जाएगी और जनता केवल साधन।

कोटद्वार जैसे संवेदनशील क्षेत्र में, जहाँ पहाड़ और मैदान की सामाजिक-आर्थिक जटिलताएँ साथ-साथ चलती हैं, राजनीति को और अधिक जिम्मेदार होना चाहिए। पलायन, रोजगार, शहरी अव्यवस्था, संसाधनों का दोहन—ये मुद्दे नारेबाज़ी से नहीं, स्पष्ट दृष्टि और दीर्घकालिक सोच से हल होंगे। लेकिन जब स्वयं राजनीतिक कार्यकर्ता दिशा के संकट में हों, तो वे समाज को दिशा कैसे देंगे?

राजनीति का पहला पाठ सेवा है, दूसरा उत्तरदायित्व और तीसरा आत्मानुशासन। यदि इन तीनों की जगह महत्वाकांक्षा, चापलूसी और अवसरवाद ले लें, तो लोकतंत्र कमजोर होता है।

आज आवश्यकता है कि कोटद्वार की राजनीति आत्ममंथन करे। युवा कार्यकर्ता यह तय करें कि वे भीड़ का हिस्सा बनना चाहते हैं या बदलाव का माध्यम। पूर्व जनप्रतिनिधि मार्गदर्शक की भूमिका निभाएँ, न कि शक्ति-संतुलन के केंद्र मात्र बनें।

राजनीति यदि समाज सेवा है तो उसे त्याग, धैर्य और सिद्धांत चाहिए। और यदि वह केवल करियर है, तो वह समाज को नहीं, केवल व्यक्तियों को आगे बढ़ाएगी।

निर्णय कोटद्वार के राजनीतिक समाज को करना है—वे इतिहास रचना चाहते हैं या केवल उपस्थिति दर्ज कराना।

स्वर्गीय भारत सिंह रावत जी की पुण्यतिथि पर विशेष

कल स्वर्गीय भारत सिंह रावत जी की पुण्यतिथि थी। यह लेख आज लिखा जा रहा है, पर उनकी स्मृतियाँ समय की सीमाओं में बंधी नहीं हैं। वे जितने पदों से पहचाने गए, उससे कहीं अधिक अपने आचरण और जीवन मूल्यों से याद किए जाते हैं।

उनका सार्वजनिक जीवन संघर्ष और समर्पण की एक क्रमिक यात्रा रहा। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत एक शिक्षक के रूप में की। शिक्षा जगत में रहते हुए ही उन्होंने समाज और पहाड़ की समस्याओं को निकट से समझा। अंततः जनसेवा के व्यापक उद्देश्य से उन्होंने शिक्षक पद से त्यागपत्र दिया और सक्रिय राजनीति का मार्ग चुना।

इसके बाद वे ब्लॉक प्रमुख बने—जहाँ उन्होंने स्थानीय विकास और ग्राम स्तर की समस्याओं को प्राथमिकता दी। जमीनी राजनीति की समझ और जनता से सीधे संवाद ने उन्हें आगे बढ़ाया। तत्पश्चात वे लगातार लैंसडाउन विधानसभा क्षेत्र से विधायक निर्वाचित हुए। जनता का यह विश्वास उनकी कार्यशैली और ईमानदारी का प्रमाण था। बाद में उन्हें राज्य योजना आयोग, उत्तराखंड का उपाध्यक्ष बनाया गया, जहाँ उन्होंने राज्य की विकास नीतियों में पहाड़ की वास्तविक आवश्यकताओं को शामिल करने का प्रयास किया।

लेकिन इन उपलब्धियों के बीच उनकी सादगी कभी नहीं बदली। सामान्य पहनावा, सीमित संसाधन, और बेहद सहज दिनचर्या—वे पद पर रहते हुए भी आम नागरिक की तरह जीवन जीते रहे। मुझे आज भी वे दिन याद हैं जब मैं उन्हें झंडा चौक से अपने स्कूटर पर उनके घर छोड़ आता था। एक पूर्व विधायक और योजना आयोग के उपाध्यक्ष का बिना किसी तामझाम, बिना सुरक्षा घेरे, साधारण स्कूटर पर बैठना—यह उनकी विनम्रता का जीवंत उदाहरण था।

कभी-कभी वे अचानक हमारे घर पिताजी से मिलने आ जाते। बिना औपचारिकता, बिना सूचना। चाय की एक साधारण प्याली के साथ पहाड़ की राजनीति, समाज और भविष्य पर गहन और व्यावहारिक चर्चा होती। वे केवल विचारक नहीं, बल्कि समाधान खोजने वाले जननेता थे। पलायन, रोजगार, जल-जंगल-जमीन जैसे मुद्दे उनके लिए केवल राजनीतिक विमर्श नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी थे।

आज जब राजनीति में वीआईपी संस्कृति का प्रभाव बढ़ गया है—भारी काफिले, दिखावटी वैभव और जनसंपर्क से अधिक छवि प्रबंधन—तब रावत जी का जीवन एक मानक की तरह सामने आता है। उन्होंने सिद्ध किया कि राजनीति का वास्तविक सम्मान सादगी, ईमानदारी और जनता के साथ जीवंत संबंध से मिलता है, न कि प्रदर्शन से।

उनकी पुण्यतिथि पर, चाहे हम उन्हें एक दिन बाद स्मरण कर रहे हों, यह संकल्प लेना चाहिए कि सार्वजनिक जीवन को पुनः मूल्यों से जोड़ा जाए।

स्वर्गीय भारत सिंह रावत जी को विनम्र श्रद्धांजलि।
आपकी संघर्षपूर्ण यात्रा, सादगीपूर्ण जीवन और जनसेवा का संकल्प सदैव प्रेरणा देता रहेगा। 🙏

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कोटद्वार की राजनीति: सेवा का पथ या करियर का मंच?

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