Monday, January 26, 2026

“रोज़ नए-नए मार्गों की खोज करना ही जीवन है”—यह केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन है।

“रोज़ नए-नए मार्गों की खोज करना ही जीवन है”—
यह केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन है।

जीवन ठहराव में नहीं, जिज्ञासा में सांस लेता है। जो हर दिन वही रास्ता चलता है, वह सुरक्षित तो रहता है, पर विकसित नहीं होता। नए मार्ग केवल भौगोलिक नहीं होते—वे विचारों के होते हैं, संवेदनाओं के होते हैं, साहस और आत्ममंथन के होते हैं।

नए मार्ग चुनने का अर्थ है प्रश्न करना, जोखिम उठाना और असफलताओं से सीखना। यही प्रक्रिया मनुष्य को साधारण से असाधारण बनाती है। इतिहास गवाह है कि जिन लोगों ने प्रचलित रास्तों से हटकर सोचा, वही परिवर्तन के वाहक बने।

जीवन वास्तव में एक सतत यात्रा है—जहाँ मंज़िल से अधिक महत्वपूर्ण होता है रास्ता, और हर नया रास्ता हमें स्वयं से थोड़ा और परिचित कराता है। इसलिए जीवन को जीना है, तो खोजते रहिए—क्योंकि खोज ही जीवन की सबसे सच्ची पहचान है।

जब खेल संवाद बने और संवेदना कर्म, तब गणतंत्र जीवंत होता है



✍️ विशेष संपादकीय

जब खेल संवाद बने और संवेदना कर्म, तब गणतंत्र जीवंत होता है

77वें गणतंत्र दिवस पर कोटद्वार के राजकीय स्पोर्ट्स स्टेडियम में आयोजित क्रिकेट सद्भावना मैत्री मैच केवल एक खेल आयोजन नहीं था, बल्कि यह उस लोकतांत्रिक चेतना का सार्वजनिक प्रकटीकरण था, जिसकी नींव हमारे संविधान में निहित है। प्रेस क्लब कोटद्वार द्वारा अपने पूर्व अध्यक्ष स्वर्गीय सुधीन्द्र नेगी जी की स्मृति में आयोजित यह आयोजन समाज के विभिन्न वर्गों को एक साझा मंच पर लाने का सार्थक प्रयास रहा।

आज के समय में जब संवाद की जगह अक्सर शोर और टकराव ले लेते हैं, तब वकील, पुलिस, मीडिया और सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों का एक मैदान पर उतरना अपने आप में एक संदेश था—कि असहमति के बावजूद सहअस्तित्व संभव है। खेल के दौरान दिखी प्रतिस्पर्धा मर्यादित रही और यही इस आयोजन की सबसे बड़ी उपलब्धि थी।

ट्रॉफी भले ही बार एसोसिएशन कोटद्वार के हिस्से आई हो, पर वास्तविक जीत उस सौहार्द की रही, जो हर मैच के साथ मजबूत होता गया। ऐसे आयोजन हमें यह भी याद दिलाते हैं कि गणतंत्र केवल अधिकारों का उत्सव नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारियों का संकल्प भी है।

इस पूरे आयोजन को अर्थवत्ता तब मिली, जब खेल के बाद गणतंत्र दिवस के अवसर पर प्रेस क्लब कोटद्वार की ओर से कुष्ठ आश्रम में सेवा का कार्य किया गया। प्रेस क्लब के सचिव दिनेश एवं कार्यकारिणी सदस्यों द्वारा आश्रम में भोजन वितरण कर यह संदेश दिया गया कि लोकतंत्र की असली परीक्षा मैदान या मंच पर नहीं, बल्कि समाज के सबसे उपेक्षित व्यक्ति तक हमारी संवेदना पहुंचने में होती है।

स्वर्गीय सुधीन्द्र नेगी जी की स्मृति में खेला गया यह आयोजन और उसके साथ जुड़ा यह सेवा कार्य, दोनों मिलकर यही कहते हैं कि स्मरण तब सार्थक होता है, जब वह कर्म में ढलता है। गणतंत्र दिवस ऐसे ही प्रयासों से जीवंत बनता है—जहां खेल संवाद बने और संवेदना सामाजिक कर्तव्य।

— दिनेश गुसाईं
(वरिष्ठ पत्रकार )



Saturday, January 24, 2026

मानव शरीर: चलता-फिरता वर्कशॉप



📰 मानव शरीर: चलता-फिरता वर्कशॉप

उपशीर्षक:

कोशिकाओं से अंगों तक, शरीर की अद्भुत रिपेयरिंग मशीन


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🔹 शरीर की सबसे छोटी वर्कशॉप: कोशिकाएं

हर कोशिका में अपने आप को ठीक करने की क्षमता होती है। DNA रिपेयर, प्रोटीन का पुनर्निर्माण, और नष्ट कोशिकाओं की जगह नई कोशिकाओं का निर्माण—यह सब निरंतर होता रहता है।

इन्फोग्राफिक आइडिया: कोशिका + DNA repair enzymes + नई कोशिकाओं का चित्र


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🔹 अंग और ऊतक स्तर की मरम्मत

हड्डियां: टूटी हड्डी नई हड्डियों से जुड़ती है।

त्वचा: कट या घाव स्वतः भर जाता है।

जिगर: अपनी क्षतिग्रस्त हिस्सों को तेजी से पुनर्निर्मित करता है।

हृदय: मरम्मत धीमी लेकिन लगातार होती रहती है।


इन्फोग्राफिक आइडिया: बाहरी घाव और हड्डी रिपेयर की प्रक्रिया का क्रमबद्ध चित्र


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🔹 प्रतिरक्षा प्रणाली: हमारी सुरक्षा तंत्र

घाव या संक्रमण होने पर सफेद रक्त कोशिकाएं तुरंत सक्रिय होती हैं। सूजन, दर्द और ऊतक निर्माण — ये शरीर की मरम्मत प्रक्रिया के संकेत हैं।

इन्फोग्राफिक आइडिया: घाव पर प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया दिखाता एनिमेशन या चरणबद्ध चित्र


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🔹 शरीर = 24×7 ऑटो-रिपेयर मशीन

शरीर की यह वर्कशॉप लगातार चलती रहती है।

इनपुट: पोषण, पानी, ऑक्सीजन, नींद

प्रोसेसिंग: कोशिकाएं, हार्मोन, प्रतिरक्षा प्रणाली

आउटपुट: ऊर्जा, मरम्मत, रोग प्रतिरोध

वेस्ट मैनेजमेंट: किडनी, पसीना, श्वसन


इन्फोग्राफिक आइडिया: शरीर को कारखाना/वर्कशॉप की तरह दिखाना, इनपुट → प्रोसेस → आउटपुट → वेस्ट


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🔹 निष्कर्ष

मानव शरीर एक अद्भुत वर्कशॉप है, जो खुद को लगातार मरम्मत और बनाए रखती है। हमारी जिम्मेदारी है कि इसे सही पोषण, पर्याप्त नींद और मानसिक संतुलन देकर लंबे समय तक स्वस्थ रखा जाए।

 क्योंकि जब शरीर स्वस्थ रहेगा, तभी हम जीवन की चुनौतियों का सामना पूरी ताकत और ऊर्जा के साथ कर पाएंगे।


हम सभी ऊर्जा हैं : कंपन करता हुआ मानव अस्तित्व

हम सभी ऊर्जा हैं : कंपन करता हुआ मानव अस्तित्व

— एक वैचारिक संपादकीय

आधुनिक विज्ञान, दर्शन और आध्यात्म—तीनों आज एक ऐसे बिंदु पर आकर मिलते दिखाई देते हैं, जहाँ मानव को केवल मांस-हड्डियों का ढांचा नहीं, बल्कि ऊर्जा का एक सक्रिय स्रोत माना जा रहा है। यह विचार कि “हम सभी ऊर्जा हैं, जो अलग-अलग आवृत्तियों में कंपन कर रही हैं” अब केवल आध्यात्मिक कल्पना नहीं, बल्कि वैज्ञानिक समझ का भी हिस्सा बनता जा रहा है।

विज्ञान स्पष्ट करता है कि इस ब्रह्मांड में कुछ भी स्थिर नहीं है। परमाणु से लेकर आकाशगंगा तक—सब कुछ गति और कंपन में है। जिसे हम ठोस वस्तु समझते हैं, वह भी सूक्ष्म स्तर पर ऊर्जा तरंगों का ही रूप है। ऐसे में मनुष्य, जो इसी ब्रह्मांड का हिस्सा है, उससे अलग कैसे हो सकता है?

मानव शरीर स्वयं एक जीवित ऊर्जा प्रणाली है। मस्तिष्क की तरंगें, हृदय की विद्युत गतिविधि, तंत्रिका तंत्र में दौड़ते संकेत—ये सभी इस बात का प्रमाण हैं कि हमारा अस्तित्व ऊर्जा के निरंतर प्रवाह पर आधारित है। दिलचस्प तथ्य यह है कि हमारी भावनाएँ और विचार इन ऊर्जा तरंगों को प्रभावित करते हैं। तनाव शरीर को असंतुलित करता है, जबकि शांति और सकारात्मकता ऊर्जा को लयबद्ध बनाती है।

यही कारण है कि कुछ लोगों की उपस्थिति हमें सुकून देती है, तो कुछ स्थानों या परिस्थितियों में बेचैनी महसूस होती है। आम भाषा में जिसे हम “वाइब्स” कहते हैं, वह वास्तव में ऊर्जा के कंपन का ही अनुभव है। यह अनुभव न तो अंधविश्वास है और न ही कोरी कल्पना—बल्कि चेतना की सूक्ष्म समझ है।

भारतीय दर्शन तो सदियों पहले ही कह चुका है—
“अहं ब्रह्मास्मि”
अर्थात मैं वही ब्रह्म हूँ, वही ऊर्जा, वही चेतना। उपनिषदों और योग दर्शन में चेतना को कंपनशील ऊर्जा माना गया है, जिसे साधना, ध्यान और संयम के माध्यम से ऊँचे स्तर तक ले जाया जा सकता है।

आज के समय में, जब समाज तनाव, हिंसा और असंतुलन से जूझ रहा है, यह समझ और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि हम यह स्वीकार कर लें कि हमारे विचार और भावनाएँ केवल निजी नहीं, बल्कि सामूहिक ऊर्जा को प्रभावित करती हैं, तो शायद हम अधिक जिम्मेदार नागरिक और संवेदनशील मनुष्य बन सकें।

विकास का अर्थ केवल भौतिक प्रगति नहीं है। वास्तविक विकास है—
अपनी आंतरिक आवृत्ति को ऊँचा उठाना।
नकारात्मकता से सकारात्मकता की ओर,
डर से समझ की ओर,
और द्वेष से करुणा की ओर।

अंततः, मनुष्य कोई स्थिर इकाई नहीं, बल्कि एक चलती-फिरती ऊर्जा है। सवाल सिर्फ इतना है—
हम किस आवृत्ति पर कंपन कर रहे हैं?

यही प्रश्न हमारे वर्तमान को भी परिभाषित करता है और भविष्य को भी।

Tuesday, January 20, 2026

लोकतंत्र की आत्मा इसी समझ पर टिकी होती है कि जनता कौन है और जनता के सेवक कौन।

लोकतंत्र की आत्मा इसी समझ पर टिकी होती है कि जनता कौन है और जनता के सेवक कौन। 


1️⃣ Civil (जनता / नागरिक) कौन होते हैं?

Civil शब्द का अर्थ है — देश के सामान्य नागरिक
यानि वे लोग जो किसी सरकारी पद पर नहीं हैं, लेकिन संविधान द्वारा मान्यता प्राप्त हैं।

जनता (Civil) के अधिकार

भारतीय संविधान के भाग–3 (Fundamental Rights) के अंतर्गत नागरिकों को ये अधिकार मिले हैं:

🔹 (क) मौलिक अधिकार

  • जीवन और सम्मान का अधिकार (अनुच्छेद 21)
  • समानता का अधिकार (कानून के सामने सब बराबर)
  • विचार, अभिव्यक्ति और बोलने की स्वतंत्रता
  • धर्म मानने और प्रचार करने की स्वतंत्रता
  • शांतिपूर्ण विरोध और आंदोलन का अधिकार
  • सूचना पाने का अधिकार (RTI)
  • न्याय पाने का अधिकार (कोर्ट जाने का अधिकार)

🔹 (ख) लोकतांत्रिक अधिकार

  • वोट देने का अधिकार
  • सरकार से सवाल पूछने का अधिकार
  • जनहित याचिका (PIL) का अधिकार

📌 जनता (Civil) के दायित्व

संविधान का भाग–4A (Fundamental Duties) नागरिकों को ये कर्तव्य सौंपता है:

  • संविधान और कानून का सम्मान
  • राष्ट्रीय ध्वज और प्रतीकों का आदर
  • सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा
  • सामाजिक सौहार्द बनाए रखना
  • पर्यावरण और प्रकृति की रक्षा
  • कर (Tax) देना
  • हिंसा से दूर रहना

लोकतंत्र में अधिकार तभी सुरक्षित रहते हैं, जब नागरिक अपने दायित्व निभाते हैं।


2️⃣ Civil Servants (जनसेवक / सरकारी कर्मचारी) कौन होते हैं?

Civil Servants वे लोग हैं जिन्हें जनता के टैक्स से वेतन मिलता है और जिनका काम जनता की सेवा करना है।

उदाहरण:

  • IAS, IPS, IFS
  • राज्य प्रशासनिक सेवा
  • पुलिस, तहसील, सचिवालय
  • शिक्षक, डॉक्टर (सरकारी)
  • नगर निगम, पंचायत कर्मचारी

Civil Servants के अधिकार

  • वेतन और भत्ते
  • सेवा सुरक्षा (बिना कारण हटाया नहीं जा सकता)
  • पदोन्नति का अधिकार
  • सुरक्षित कार्य वातावरण
  • न्याय पाने का अधिकार (Tribunal / कोर्ट)

📌 Civil Servants के दायित्व

यहीं असली जवाबदेही होती है:

  • जनता की सेवा करना
  • संविधान के अनुसार कार्य करना
  • निष्पक्ष और ईमानदार रहना
  • कानून का पालन कराना, न कि उसका दुरुपयोग
  • राजनीतिक पक्षपात से दूर रहना
  • नागरिकों के साथ सम्मानजनक व्यवहार
  • सूचना छिपाना नहीं (RTI का पालन)

⚖️ Civil servant मालिक नहीं, सेवक होता है।


3️⃣ जनता बनाम जनसेवक – स्पष्ट अंतर

विषय जनता (Civil) जनसेवक (Civil Servant)
सत्ता का स्रोत संविधान जनता
भूमिका मालिक / संप्रभु सेवक
वेतन देता कौन जनता (टैक्स से)
जवाबदेह कानून के प्रति जनता + कानून के प्रति
शक्ति लोकतांत्रिक प्रशासनिक

4️⃣ अगर जनसेवक दायित्व न निभाए तो?

जनता के पास ये अधिकार हैं:

  • शिकायत (CM Portal, DM, विभाग)
  • RTI डालना
  • कोर्ट / हाईकोर्ट / सुप्रीम कोर्ट जाना
  • मीडिया और जनप्रतिनिधि के माध्यम से आवाज उठाना
  • शांतिपूर्ण आंदोलन

🔴 निष्कर्ष (सबसे ज़रूरी बात)

लोकतंत्र में जनता शासक होती है और सिविल सर्वेंट सेवक।
यदि सेवक खुद को मालिक समझने लगे, तो लोकतंत्र कमजोर होता है।

Saturday, January 17, 2026

उत्तराखंड: पहाड़, पानी और अधिकार — सरकार नहीं, जनता मालिक

संपादकीय

उत्तराखंड: पहाड़, पानी और अधिकार — सरकार नहीं, जनता मालिक

उत्तराखंड की पहचान उसकी नदियाँ, जंगल और पहाड़ हैं। लेकिन विडंबना यह है कि इन्हीं पर सबसे पहले स्थानीय लोगों के अधिकार सिमटते दिखाई देते हैं। जबकि संवैधानिक सच्चाई यह है कि सत्ता का स्रोत जनता है, और सरकार केवल ट्रस्टी—मालिक नहीं। यह सिद्धांत भारतीय संविधान की आत्मा है।

ज़मीन: विकास या विस्थापन?

पहाड़ों में ज़मीन केवल संपत्ति नहीं, जीवन-आधार है। सड़क, बांध, सुरंग, या टाउनशिप—हर परियोजना “जनहित” के नाम पर आती है, पर अनुच्छेद 300A याद दिलाता है कि संपत्ति कानून के बिना नहीं ली जा सकती। सवाल यह है कि क्या उचित मुआवज़ा, स्थानीय सहमति और पर्यावरणीय न्याय वास्तव में सुनिश्चित हो रहे हैं? जब निर्णय दूर बैठे दफ्तरों में होते हैं और बोझ पहाड़ उठाते हैं, तब विकास का नैतिक आधार कमजोर पड़ता है।

जंगल: संरक्षण के नाम पर बेदखली

उत्तराखंड के जंगल सदियों से वन-समुदायों की देखरेख में रहे हैं। आज “संरक्षण” की भाषा में परंपरागत अधिकार हाशिये पर हैं। जबकि वन अधिकार कानून, 2006 स्पष्ट करता है कि जंगलों पर पहला दावा स्थानीय समुदायों का है और ग्राम सभा सर्वोच्च। यदि संरक्षण का अर्थ लोगों को बाहर करना है, तो यह संरक्षण नहीं—विच्छेदन है।

पानी: नौले, धाराएँ और निजीकरण का खतरा

यहाँ की सभ्यता नौलों और धाराओं पर टिकी है। फिर भी जलस्रोत सूख रहे हैं, नदियाँ सुरंगों में कैद हैं, और पानी धीरे-धीरे व्यापार बनता जा रहा है। अनुच्छेद 21 के अंतर्गत स्वच्छ पानी जीवन का हिस्सा है। पहाड़ों में जल प्रबंधन का अधिकार स्थानीय निकायों और समुदायों के बिना संभव नहीं—केंद्रीकरण यहाँ समाधान नहीं, समस्या है।

केंद्र–राज्य नहीं, जनता केंद्र में

चाहे संघ सरकार, केंद्र सरकार या भारत सरकार—नाम कुछ भी हो, सीमा एक है: संविधान। उत्तराखंड जैसे संवेदनशील राज्य में नीति बनाते समय स्थानीय सहमति, पारिस्थितिकी और आजीविका को केंद्र में रखना होगा। पहाड़ों को केवल “प्रोजेक्ट साइट” समझना भविष्य के लिए जोखिम है।
 अंत में जो निष्कर्ष रहता है कि उत्तराखंड में संघर्ष सरकार बनाम राज्य का नहीं, नीति बनाम नागरिक का है। ज़मीन आपकी है, जंगल समुदाय के हैं, पानी सबका है। सरकार का कर्तव्य है—ट्रस्टशिप, पारदर्शिता और न्याय। और नागरिकों का अधिकार—सवाल पूछना, सहमति देना या न देना।
यही पहाड़ों का रास्ता है—विकास के साथ अधिकार। यही उत्तराखंड की आत्मा है।

सरकार, संसाधन और नागरिक: मालिक कौन?

संपादकीय

सरकार, संसाधन और नागरिक: मालिक कौन?

भारत में अक्सर यह भ्रम जानबूझकर फैलाया जाता है कि सरकार ही सर्वोच्च है—कि ज़मीन, जंगल और पानी पर अंतिम अधिकार सत्ता का है। जबकि संवैधानिक सच्चाई इससे ठीक उलट है। भारत का संविधान—भारतीय संविधान—स्पष्ट करता है कि सत्ता का स्रोत नागरिक हैं, सरकार केवल उनके नाम पर प्रबंधन (ट्रस्टशिप) करती है।

संघ सरकार (Union Government) संविधान से बंधी है; केंद्र सरकार (Central Government) प्रशासन चलाने का माध्यम है; और भारत सरकार (Government of India) देश की कानूनी पहचान। नाम अलग हो सकते हैं, पर तीनों की सीमा वही है—नागरिकों के अधिकारों की रक्षा। सरकार मालिक नहीं, सेवक है।

आज सबसे बड़ा टकराव प्राकृतिक संसाधनों पर दिखता है। ज़मीन को अधिग्रहण के नाम पर छीना जाता है, जंगलों को “संरक्षण” की आड़ में समुदायों से दूर किया जाता है, और पानी को व्यापार बना दिया जाता है। जबकि संविधान की भावना कहती है—संपत्ति कानून के बिना नहीं ली जा सकती, जीवन का अधिकार स्वच्छ पर्यावरण और पानी तक पहुँच की गारंटी देता है, और जंगल समुदायों के साझा अधिकार हैं, न कि महज़ फाइलों में दर्ज परिसंपत्तियाँ।

अनुच्छेद 300A नागरिक की संपत्ति की ढाल है—सरकार मनमानी नहीं कर सकती। अनुच्छेद 21 जीवन और गरिमा का अधिकार देता है—जिसमें स्वच्छ हवा-पानी शामिल है। वन अधिकार कानून, 2006 बताता है कि जंगलों पर पहला दावा उन समुदायों का है जो पीढ़ियों से उनकी रक्षा करते आए हैं; यहाँ ग्राम सभा की आवाज़ सर्वोपरि है, न कि किसी दफ्तर की मुहर।

लोकतंत्र का अर्थ केवल मतदान नहीं; सवाल पूछने का अधिकार भी है। सूचना का अधिकार, न्यायालय जाने की स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण विरोध—ये सब नागरिक को सरकार के ऊपर नहीं, संविधान के भीतर खड़ा करते हैं। जब सरकार नीति बनाते समय लोगों की सहमति और पर्यावरणीय न्याय को दरकिनार करती है, तब लोकतंत्र कमजोर होता है।

आज ज़रूरत है इस बुनियादी सच को दोहराने की—भारत में सर्वोच्च सत्ता सरकार नहीं, संविधान है; और संविधान में केंद्र में नागरिक है। ज़मीन आपकी है, जंगल समुदाय के हैं, पानी सबका है। सरकार का काम इन्हें बेचना नहीं, संरक्षित करना और न्यायपूर्ण ढंग से प्रबंधित करना है।

यदि यह संतुलन टूटता है, तो विकास नहीं—विस्थापन बढ़ता है; समृद्धि नहीं—असमानता गहराती है। इसलिए समय की मांग है कि शासन ट्रस्टशिप की भावना लौटाए, और नागरिक अपने संवैधानिक अधिकारों को पहचाने, मांगे और बचाए। यही भारत के लोकतंत्र की असली कसौटी है।

न्यूज़ विचार और व्यव्हार

जब मीडिया सत्ता की ढाल बने, तब जनता की पत्रकारिता ज़रूरी

जब मीडिया सत्ता की ढाल बने, तब जनता की पत्रकारिता ज़रूरी लोकतंत्र के चार स्तंभों में मीडिया को इसलिए जगह दी गई थी ताकि वह सत्ता पर निगरानी र...