सरकार, संसाधन और नागरिक: मालिक कौन?
भारत में अक्सर यह भ्रम जानबूझकर फैलाया जाता है कि सरकार ही सर्वोच्च है—कि ज़मीन, जंगल और पानी पर अंतिम अधिकार सत्ता का है। जबकि संवैधानिक सच्चाई इससे ठीक उलट है। भारत का संविधान—भारतीय संविधान—स्पष्ट करता है कि सत्ता का स्रोत नागरिक हैं, सरकार केवल उनके नाम पर प्रबंधन (ट्रस्टशिप) करती है।
संघ सरकार (Union Government) संविधान से बंधी है; केंद्र सरकार (Central Government) प्रशासन चलाने का माध्यम है; और भारत सरकार (Government of India) देश की कानूनी पहचान। नाम अलग हो सकते हैं, पर तीनों की सीमा वही है—नागरिकों के अधिकारों की रक्षा। सरकार मालिक नहीं, सेवक है।
आज सबसे बड़ा टकराव प्राकृतिक संसाधनों पर दिखता है। ज़मीन को अधिग्रहण के नाम पर छीना जाता है, जंगलों को “संरक्षण” की आड़ में समुदायों से दूर किया जाता है, और पानी को व्यापार बना दिया जाता है। जबकि संविधान की भावना कहती है—संपत्ति कानून के बिना नहीं ली जा सकती, जीवन का अधिकार स्वच्छ पर्यावरण और पानी तक पहुँच की गारंटी देता है, और जंगल समुदायों के साझा अधिकार हैं, न कि महज़ फाइलों में दर्ज परिसंपत्तियाँ।
अनुच्छेद 300A नागरिक की संपत्ति की ढाल है—सरकार मनमानी नहीं कर सकती। अनुच्छेद 21 जीवन और गरिमा का अधिकार देता है—जिसमें स्वच्छ हवा-पानी शामिल है। वन अधिकार कानून, 2006 बताता है कि जंगलों पर पहला दावा उन समुदायों का है जो पीढ़ियों से उनकी रक्षा करते आए हैं; यहाँ ग्राम सभा की आवाज़ सर्वोपरि है, न कि किसी दफ्तर की मुहर।
लोकतंत्र का अर्थ केवल मतदान नहीं; सवाल पूछने का अधिकार भी है। सूचना का अधिकार, न्यायालय जाने की स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण विरोध—ये सब नागरिक को सरकार के ऊपर नहीं, संविधान के भीतर खड़ा करते हैं। जब सरकार नीति बनाते समय लोगों की सहमति और पर्यावरणीय न्याय को दरकिनार करती है, तब लोकतंत्र कमजोर होता है।
आज ज़रूरत है इस बुनियादी सच को दोहराने की—भारत में सर्वोच्च सत्ता सरकार नहीं, संविधान है; और संविधान में केंद्र में नागरिक है। ज़मीन आपकी है, जंगल समुदाय के हैं, पानी सबका है। सरकार का काम इन्हें बेचना नहीं, संरक्षित करना और न्यायपूर्ण ढंग से प्रबंधित करना है।
यदि यह संतुलन टूटता है, तो विकास नहीं—विस्थापन बढ़ता है; समृद्धि नहीं—असमानता गहराती है। इसलिए समय की मांग है कि शासन ट्रस्टशिप की भावना लौटाए, और नागरिक अपने संवैधानिक अधिकारों को पहचाने, मांगे और बचाए। यही भारत के लोकतंत्र की असली कसौटी है।
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