Tuesday, January 13, 2026

जो हमें तोड़ नहीं पाता, वही हमें मज़बूत बनाता है

जो हमें तोड़ नहीं पाता, वही हमें मज़बूत बनाता है

जीवन और समाज—दोनों के इतिहास में यह वाक्य केवल एक प्रेरक कथन नहीं, बल्कि अनुभव से निकला हुआ सत्य है कि संघर्ष मनुष्य की असली परीक्षा होते हैं। हर कठिनाई विनाश के लिए नहीं आती; कुछ कठिनाइयाँ मनुष्य को भीतर से गढ़ने आती हैं।

आज का समय अस्थिरता, अविश्वास और त्वरित लाभ की राजनीति का समय है। ऐसे दौर में व्यक्ति, समाज और लोकतांत्रिक संस्थाएँ लगातार दबाव में हैं। पत्रकारिता सवाल पूछने पर कटघरे में खड़ी है, नागरिक अधिकारों को असुविधा कहा जा रहा है और असहमति को देशद्रोह की तरह देखा जाने लगा है। यह दबाव स्वाभाविक रूप से थकाता है—कभी-कभी तोड़ भी देता है। लेकिन जो दबाव तोड़ नहीं पाता, वही भविष्य की मजबूत चेतना का निर्माण करता है।

इतिहास गवाह है कि दमन ने कभी भी विचारों को समाप्त नहीं किया। विचार दबते हैं तो और पैने होते हैं। सामाजिक आंदोलनों, लोकतांत्रिक संघर्षों और स्वतंत्र पत्रकारिता की यात्रा में असफलताएँ आईं, बंदिशें लगीं, लेकिन इन्हीं कठिन दौरों ने नेतृत्व, वैचारिक स्पष्टता और नैतिक साहस को जन्म दिया।

हालाँकि यह भी सच है कि हर पीड़ा अपने आप ताकत में नहीं बदलती। बिना आत्ममंथन के संघर्ष केवल घाव छोड़ता है। सीख, विवेक और धैर्य—यही वह प्रक्रिया है जो दर्द को शक्ति में बदलती है। जो समाज अपनी असफलताओं से सबक नहीं लेता, वह बार-बार उन्हीं गलतियों का शिकार होता है।

आज ज़रूरत इस बात की है कि हम कठिन समय को केवल सहें नहीं, बल्कि उसे समझें। सवाल पूछते रहें, सच लिखते रहें और अन्याय के सामने खड़े रहें। क्योंकि इतिहास अंततः उन्हीं का पक्ष लेता है जो टूटते नहीं—बल्कि संघर्ष से और मज़बूत होकर निकलते हैं।

यही इस कथन का सार है—
जो हमें तोड़ नहीं पाता, वही हमें मज़बूत बनाता है।

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