Thursday, January 8, 2026

रिश्ते, सवाल और पत्रकारिता का साहस

संपादकीय | रिश्ते, सवाल और पत्रकारिता का साहस

हर रिश्ता निभाने के लिए नहीं होता। कुछ रिश्ते इसलिए आते हैं ताकि हमें जीवन के लिए तैयार किया जा सके। वे हमें आराम नहीं देते, बल्कि असहज करते हैं—हमारे भीतर सवाल खड़े करते हैं, हमारी धारणाओं को तोड़ते हैं और हमें सोचने पर मजबूर करते हैं। ऐसे रिश्ते अक्सर टूट जाते हैं, लेकिन जाते-जाते हमें वह दृष्टि दे जाते हैं, जिसके बिना आगे बढ़ना संभव नहीं होता।

जीवन में कई बार ऐसा क्षण आता है जब सब कुछ “ठीक” होना ही सबसे बड़ा सवाल बन जाता है। क्योंकि जब सब ठीक दिखता है, तब अक्सर अन्याय, चुप्पी और समझौते भी ठीक मान लिए जाते हैं। सवाल पूछना जोखिम भरा होता है, लेकिन वही जोखिम मनुष्य को जीवित और जागरूक बनाए रखता है।

पत्रकारिता का स्वभाव भी कुछ ऐसा ही है। यह सुविधा का नहीं, साहस का पेशा है। पत्रकारिता सिखाती है कि हर स्वीकार्य सच अंतिम सच नहीं होता। यह सत्ता से प्रश्न करने, भीड़ के विरुद्ध खड़े होने और असहज तथ्यों को सामने रखने का नैतिक बल देती है। यहाँ आगे बढ़ना मतलब लोकप्रिय होना नहीं, बल्कि ज़िम्मेदार होना है।

जिस तरह कुछ रिश्ते हमें मजबूत बनाकर विदा हो जाते हैं, उसी तरह पत्रकारिता भी हमें आसान रास्ते नहीं देती—वह हमें सच के कठिन रास्ते पर चलना सिखाती है। और शायद इसी में उसका सबसे बड़ा मूल्य छिपा है: आगे बढ़ने का साहस।

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