गलवान के बाद ‘गले मिलना’?
CPC–RSS–BJP संवाद: कूटनीति या रणनीतिक मनोवैज्ञानिक युद्ध
जब चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (CPC) का प्रतिनिधिमंडल दिल्ली के केशव कुंज में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुख्यालय पहुंचता है और उससे पहले भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेतृत्व से मुलाकात करता है, तो यह सामान्य राजनयिक घटना नहीं रह जाती। यह एक साफ़ राजनीतिक संकेत बन जाती है—खासतौर पर उस चीन से, जिसके साथ भारत का भरोसा गलवान घाटी में खून से टूट चुका है।
BJP का यह कहना कि बातचीत ‘खुले तौर पर’ हुई और इससे ‘हालात बेहतर होने’ के संकेत मिले, अपने आप में एक बड़ा दावा है। सवाल यह है कि हालात किस मोर्चे पर बेहतर हुए?
सीमा पर? व्यापार में? या केवल बातचीत की मेज़ पर?
CPC प्रतिनिधिमंडल में भारत में चीन के राजदूत शू फेइहोंग की मौजूदगी इस बात को स्पष्ट करती है कि यह दौरा न तो अकादमिक था, न ही प्रतीकात्मक। वहीं RSS के जनरल सेक्रेटरी दत्तात्रेय होसबोले से सीधी मुलाकात यह दिखाती है कि चीन अब केवल भारत सरकार से नहीं, बल्कि भारत की वैचारिक रीढ़ से संवाद करना चाहता है।
चीन किससे बात कर रहा है—सरकार से या राष्ट्रवाद से?
यह पहली बार नहीं है जब चीन ने किसी देश में सत्ता के साथ-साथ वैचारिक केंद्रों को साधने की कोशिश की हो। CPC अच्छी तरह जानती है कि भारत में RSS केवल एक संगठन नहीं, बल्कि दीर्घकालिक राष्ट्रवादी सोच का केंद्र है, जिसकी छाया सरकार, नीतियों और जनमत—तीनों पर पड़ती है।
ऐसे में यह सवाल अनिवार्य हो जाता है:
क्या चीन भारत के भीतर वैचारिक पढ़त (Ideological Mapping) कर रहा है?
क्या यह संवाद सीमा विवाद के समाधान से पहले मनोवैज्ञानिक भरोसा बनाने की कोशिश है?
या फिर यह वही पुरानी रणनीति है—बातचीत के नाम पर समय खरीदना?
गलवान की छाया संवाद की मेज़ पर
भारत यह नहीं भूल सकता कि बातचीत और समझौतों के दौर में ही चीन ने वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर यथास्थिति बदली।
इतिहास बताता है कि चीन की कूटनीति में मुस्कान और सैन्य चाल साथ-साथ चलती हैं।
इसलिए CPC–RSS–BJP संवाद को ‘सकारात्मक संकेत’ कहना जितना आसान है, उतना ही ख़तरनाक भी—अगर यह मान लिया जाए कि संवाद अपने आप में समाधान है।
भारत के लिए लाल रेखाएं
भारत संवाद करे—यह ज़रूरी है।
लेकिन संवाद की शर्तें स्पष्ट हों:
सीमा पर यथास्थिति से कोई समझौता नहीं
राष्ट्रीय सुरक्षा पर कोई ‘सॉफ्ट कॉर्नर’ नहीं
और वैचारिक सम्मान को रणनीतिक भ्रम न समझा जाए
निष्कर्ष: सावधानी ही असली राष्ट्रहित
CPC का RSS और BJP—दोनों से एक ही दौरे में मिलना बताता है कि चीन भारत को अब केवल एक पड़ोसी नहीं, बल्कि एक रणनीतिक चुनौती और संभावना—दोनों के रूप में देख रहा है।
भारत के लिए यह संवाद परीक्षा है—
परिपक्वता की नहीं, सजगता की।
क्योंकि इतिहास गवाह है:
चीन से दोस्ती के वादे आसान होते हैं, लेकिन उनकी कीमत अक्सर सीमाओं पर चुकानी पड़ती है।
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