“भावुक लोग संबंध को संभालते हैं, प्रैक्टिकल लोग संबंध का फायदा उठाते हैं, और प्रोफेशनल लोग फायदा देखकर संबंध बनाते हैं।”
यह पंक्ति केवल एक विचार नहीं, बल्कि आज के सामाजिक चरित्र का आईना है।
एक समय था जब रिश्ते भरोसे, त्याग और संवेदना की बुनियाद पर खड़े होते थे। संबंध निभाना जीवन की सबसे बड़ी पूंजी मानी जाती थी। आज वही रिश्ते लाभ–हानि के गणित में उलझते दिखाई देते हैं। सवाल यह नहीं कि समय बदला है, सवाल यह है कि क्या इंसान भी अपने मूल से दूर होता जा रहा है?
भावुक लोग आज भी समाज की रीढ़ हैं। वे रिश्तों को इसलिए निभाते हैं क्योंकि उनके लिए संबंध स्वयं में एक मूल्य है। वे टूटते रिश्तों को जोड़ने की कोशिश करते हैं, भले ही इसकी कीमत उन्हें अकेले चुकानी पड़े। दुर्भाग्य यह है कि ऐसे लोग अक्सर ‘कमज़ोर’ समझ लिए जाते हैं, जबकि असल में वही सबसे मजबूत होते हैं।
प्रैक्टिकल लोग यथार्थ की बात करते हैं। उनका तर्क है कि जीवन केवल भावनाओं से नहीं चलता। लेकिन जब व्यावहारिकता अवसरवाद में बदल जाती है, तब संबंध एक साधन मात्र रह जाते हैं। ज़रूरत तक रिश्ता, सुविधा तक साथ—यही सोच सामाजिक खोखलेपन को जन्म देती है।
सबसे अधिक चिंता का विषय हैं प्रोफेशनल रिश्ते—जहाँ इंसान नहीं, फायदा केंद्र में होता है। यहाँ मुस्कान भी रणनीति होती है और संवाद भी निवेश। जब लाभ समाप्त, तो संबंध समाप्त। यही प्रवृत्ति राजनीति, मीडिया, कॉरपोरेट और यहाँ तक कि सामाजिक संगठनों तक में स्पष्ट दिखती है।
समस्या भावुक, प्रैक्टिकल या प्रोफेशनल होने में नहीं है। समस्या तब पैदा होती है जब भावनाओं का पूरी तरह बहिष्कार कर दिया जाता है। एक स्वस्थ समाज के लिए ज़रूरी है कि व्यावहारिकता में मानवीय संवेदना बनी रहे और पेशेवर अनुशासन में नैतिकता जीवित रहे।
आज ज़रूरत इस बात की है कि हम अपने रिश्तों से यह पूछें—
क्या यह संबंध सिर्फ लाभ के लिए है, या विश्वास के लिए भी?
क्योंकि जो समाज रिश्तों को केवल फायदे से तौलता है, वह अंततः इंसान को भी एक वस्तु बना देता है।
रिश्ते अगर बोझ लगने लगें, तो समझिए हमने भावनाओं को नहीं, इंसानियत को खो दिया है।
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