Monday, January 12, 2026

उत्तराखंड की गंदी होती राजनीति और जनता से टूटा भरोसा

संपादकीय | उत्तराखंड की गंदी होती राजनीति और जनता से टूटा भरोसा

उत्तराखंड का जन्म एक स्वप्न के साथ हुआ था—जनभागीदारी, पर्यावरण-संवेदनशील विकास और पहाड़ के अनुरूप शासन का स्वप्न। लेकिन दो दशकों बाद यह सवाल ज़्यादा तीखा हो गया है कि क्या राजनीति इस स्वप्न को ढो रही है, या उसे धीरे-धीरे दफ़ना रही है?

आज उत्तराखंड की राजनीति को “गंदी” कहे जाने के पीछे आक्रोश है—और वह आक्रोश निराधार नहीं। सत्ता के गलियारों में निर्णय अक्सर जनता की ज़रूरतों से नहीं, बल्कि राजनीतिक समीकरणों से तय होते दिखते हैं। पहाड़ की ज़मीन, जंगल, नदियाँ और संसाधन विकास के नाम पर सौदेबाज़ी का विषय बन गए हैं, जबकि स्थानीय समुदाय सिर्फ़ दर्शक।

भ्रष्टाचार के आरोप कोई नई बात नहीं रहे। जांच बैठती है, सुर्खियाँ बनती हैं, पर नतीजे अक्सर शून्य रहते हैं। जवाबदेही का यह अभाव लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर करता है। जब जनता देखती है कि दोष तय नहीं होते, तो व्यवस्था से विश्वास उठना स्वाभाविक है।

इससे भी ज़्यादा चिंताजनक है असली मुद्दों से जानबूझकर ध्यान भटकाना। रोज़गार का संकट, शिक्षा और स्वास्थ्य की बदहाली, पहाड़ों से होता पलायन, और बार-बार आने वाली आपदाओं की तैयारी—ये सब पीछे छूट जाते हैं। उनकी जगह प्रतीकात्मक राजनीति और ध्रुवीकरण ले लेता है, जो चुनाव जीत सकता है, लेकिन राज्य नहीं चला सकता।

स्थानीय स्वशासन की स्थिति भी निराशाजनक है। पंचायतें और नगर निकाय लोकतंत्र की रीढ़ होने चाहिए थे, पर अधिकारों की कमी ने उन्हें केवल औपचारिक बना दिया है। जब फैसले ऊपर से थोपे जाते हैं, तो पहाड़ की ज़मीनी समझ गायब हो जाती है।

फिर भी, तस्वीर का एक पक्ष और है। उत्तराखंड की जनता ने हमेशा सवाल पूछे हैं—वनों की रक्षा से लेकर अपने अधिकारों तक। चुप्पी इस समाज की पहचान नहीं रही। समस्या जनता में नहीं, उस राजनीतिक संस्कृति में है जिसने सत्ता को सेवा से ऊपर रख दिया।

आज ज़रूरत है साफ़ राजनीति की—जहाँ विकास पहाड़ को समझकर हो, जवाबदेही दिखे, और जनता सिर्फ़ वोटर नहीं, भागीदार बने। वरना “गंदी राजनीति” सिर्फ़ एक आरोप नहीं, आने वाले समय की कठोर सच्चाई बन जाएगी।

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