उत्तराखंड की राजनीति को लेकर आम लोगों में जो नाराज़गी है, वह किसी एक घटना से नहीं, बल्कि लगातार बनते गए अनुभवों से पैदा हुई है।
1) सत्ता, सेवा पर भारी
नीतियाँ अक्सर जनता के हित से ज़्यादा सत्ता की मजबूती के लिए बनती दिखती हैं। खनन, ज़मीन, बड़े प्रोजेक्ट और पहाड़ों की संवेदनशीलता—इन सबमें स्थानीय लोगों की आवाज़ पीछे छूट जाती है।
2) भ्रष्टाचार, पर जवाबदेही नहीं
घोटालों के आरोप लगते हैं, जांच बैठती है, लेकिन नतीजा बहुत कम निकलता है। जब दोषियों पर कार्रवाई नहीं होती, तो व्यवस्था पर भरोसा टूटता है।
3) असली मुद्दों से ध्यान भटकाना
रोज़गार, शिक्षा, स्वास्थ्य, पलायन और आपदा प्रबंधन जैसे मुद्दों पर गंभीर चर्चा की जगह पहचान और ध्रुवीकरण की राजनीति हावी हो जाती है।
4) स्थानीय सरकारें सिर्फ नाम की
पंचायत और नगर निकायों के पास अधिकार कम हैं। असली ताक़त ऊपर केंद्रित रहती है, जिससे जमीनी लोकतंत्र कमजोर पड़ता है।
5) पहाड़ का सिर्फ़ चुनावी इस्तेमाल
उत्तराखंड की भौगोलिक और पर्यावरणीय चुनौतियाँ अलग हैं, लेकिन नीतियाँ मैदानी राज्यों की नकल पर बनती हैं—जब तक कोई आपदा न आ जाए।
नतीजा क्या है?
लोग नाराज़ ही नहीं, खुद को अनसुना महसूस करते हैं। जब राजनीति सेवा की बजाय सौदेबाज़ी बन जाए, तो उसे “गंदी” कहा जाना स्वाभाविक है।
फिर भी एक उम्मीद है
उत्तराखंड की जनता ने हमेशा सवाल पूछे हैं—चिपको से लेकर जन आंदोलनों तक। समस्या जनता नहीं, राजनीतिक संस्कृति है।
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