उत्तराखंड की सबसे बड़ी त्रासदी आज कोई एक घोटाला, कोई एक सरकार या कोई एक चुनाव नहीं है—सबसे बड़ा संकट है ग्रामीण पलायन। पहाड़ के गाँव खाली हो रहे हैं, स्कूलों में ताले लग रहे हैं, खेत बंजर पड़ रहे हैं और राजनीति… इस सच्चाई पर लगभग मौन है।
गाँव से शहर की यह मजबूरी कोई नई नहीं है, लेकिन चिंता इस बात की है कि यह अब स्थायी पलायन बन चुका है। लोग सिर्फ़ रोज़गार के लिए नहीं जा रहे, वे इसलिए जा रहे हैं क्योंकि गाँव में रहने की बुनियादी शर्तें ही खत्म होती जा रही हैं—स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क, संचार और सम्मानजनक आजीविका।
राजनीति को अगर सबसे पहले इस संकट को समझना चाहिए था, तो वही सबसे ज़्यादा उदासीन दिखती है। चुनाव आते हैं, घोषणाएँ होती हैं—“रिवर्स पलायन”, “होम स्टे”, “स्टार्टअप गांव”—लेकिन ज़मीनी हकीकत वही रहती है। योजनाएँ काग़ज़ पर जन्म लेती हैं और वहीं दम तोड़ देती हैं।
सबसे पीड़ादायक सच यह है कि पलायन को अब सामान्य मान लिया गया है। जैसे यह विकास का स्वाभाविक परिणाम हो। लेकिन सवाल यह है—किस विकास का?
जिस विकास में अपने ही गाँव छोड़ना पड़े, वह प्रगति नहीं, विस्थापन है।
खेत छोड़कर गया किसान सिर्फ़ मज़दूर नहीं बनता, वह अपनी संस्कृति, भाषा और आत्मसम्मान का भी बोझ उठाकर जाता है। पीछे रह जाते हैं बुज़ुर्ग, महिलाएँ और वीरान घर—जो कभी जीवंत समाज हुआ करते थे।
स्थानीय स्वशासन इस संकट से लड़ने का सबसे मज़बूत हथियार हो सकता था, लेकिन पंचायतों को अधिकार नहीं दिए गए। फैसले राजधानी और सचिवालयों में होते रहे, जबकि गाँव की ज़रूरतें कभी ठीक से सुनी ही नहीं गईं।
आज ज़रूरत है ईमानदार स्वीकारोक्ति की—
पलायन कोई प्राकृतिक आपदा नहीं, यह नीतिगत विफलता है।
और जब तक राजनीति इसे स्वीकार नहीं करेगी, तब तक समाधान भी नहीं निकलेगा।
उत्तराखंड की राजनीति को तय करना होगा:
क्या वह खाली होते गाँवों को सिर्फ़ चुनावी आँकड़ा मानती रहेगी,
या गाँव को फिर से रहने लायक बनाने की ज़िम्मेदारी लेगी?
क्योंकि अगर गाँव नहीं बचे,
तो उत्तराखंड सिर्फ़ एक भौगोलिक इकाई रह जाएगा—
पहाड़ नहीं, पहचान नहीं।
यह संपादकीय सिर्फ़ सवाल नहीं पूछता, चेतावनी भी देता है—
पलायन को नज़रअंदाज़ करना, भविष्य को छोड़ देना है।
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