संपादकीय: मजीठिया वेज बोर्ड – पत्रकारों के अधिकारों की लड़ाई अभी भी जारी
मजीठिया वेज बोर्ड का सुप्रीम कोर्ट में फैसला पत्रकारिता के इतिहास में एक मील का पत्थर था। अदालत ने स्पष्ट किया कि पत्रकारों और समाचार पत्र कर्मचारियों के न्यूनतम वेतन और भत्तों की सिफारिशें वैध और लागू होने योग्य हैं। वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंसाल्विस की वकालत ने कर्मचारियों के अधिकारों को सुरक्षित रखने में निर्णायक भूमिका निभाई।
लेकिन, 2025 में भी यह लड़ाई पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। कई मीडिया संस्थानों में वेज बोर्ड की सिफारिशों का पूर्ण पालन नहीं हो रहा है। कर्मचारियों को अभी भी अपने बकाया वेतन और भत्तों के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। यह दर्शाता है कि कानूनी जीत के बावजूद, वास्तविक जीवन में न्याय के लिए निरंतर सतर्कता और प्रयास की आवश्यकता होती है।
मजीठिया वेज बोर्ड का मामला हमें याद दिलाता है कि पत्रकारिता केवल सूचना का आदान-प्रदान नहीं, बल्कि लोकतंत्र की रीढ़ है। जब तक पत्रकारों के अधिकार सुरक्षित नहीं होंगे, समाज में निष्पक्ष और स्वतंत्र मीडिया का सपना अधूरा रहेगा।
न्यायपालिका ने दिशा दिखा दी है, अब यह जिम्मेदारी मीडिया संस्थानों और समाज की है कि पत्रकारों के अधिकारों की पूरी रक्षा सुनिश्चित करें।
No comments:
Post a Comment