भारतीय धार्मिक परंपरा में जैन धर्म को अक्सर किसी एक सामाजिक वर्ग से जोड़कर देखा जाता है। यह प्रश्न बार-बार उठता है कि क्या जैन धर्म क्षत्रिय कुल से जुड़ा हुआ था, और यदि हाँ, तो आज जैन समाज में व्यापारी वर्ग की प्रधानता क्यों दिखाई देती है। इस प्रश्न का उत्तर इतिहास, दर्शन और सामाजिक विकास—तीनों को साथ रखकर समझना आवश्यक है।
जैन परंपरा के अनुसार अंतिम तीर्थंकर महावीर स्वामी क्षत्रिय कुल में जन्मे थे। उनके पिता राजा सिद्धार्थ और माता रानी त्रिशला थीं। इसी प्रकार प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव को भी इक्ष्वाकु वंश का क्षत्रिय राजा माना जाता है। जैन ग्रंथों में अधिकांश तीर्थंकरों का संबंध राजवंशों से बताया गया है। इस दृष्टि से यह कहना ऐतिहासिक रूप से गलत नहीं कि तीर्थंकरों का जन्म क्षत्रिय कुलों में हुआ।
लेकिन यहीं पर एक बड़ी भ्रांति जन्म लेती है। जैन धर्म जन्म आधारित श्रेष्ठता को नहीं, बल्कि कर्म आधारित उन्नति को स्वीकार करता है। जैन दर्शन का मूल सिद्धांत है—आत्मा स्वतंत्र है, शुद्ध है और अपने कर्मों से बंधती तथा मुक्त होती है। न तो कोई ईश्वर किसी को ऊँचा-नीचा बनाता है और न ही जन्म किसी को मोक्ष का अधिकारी या अयोग्य ठहराता है।
महावीर स्वामी स्वयं इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं। वे राजा थे, परंतु उन्होंने राजसत्ता, वैभव और कुल-गौरव को त्यागकर संयम और तप का मार्ग चुना। जैन धर्म में राजा का महत्व उसके सिंहासन से नहीं, बल्कि उसके त्याग से तय होता है। यही कारण है कि जैन परंपरा में साधु सर्वोच्च आदर्श है—वह चाहे किसी भी कुल में जन्मा हो।
समय के साथ सामाजिक परिस्थितियाँ बदलीं। युद्ध, हिंसा और सत्ता संघर्ष से दूरी बनाए रखने के लिए जैन समाज ने ऐसे व्यवसाय अपनाए जो अहिंसा के अधिक अनुकूल थे। व्यापार, लेखा, शिक्षा और दान—ये क्षेत्र जैन मूल्यों से सहज रूप से मेल खाते थे। परिणामस्वरूप जैन समाज में वैश्य वर्ग की संख्या बढ़ी। यह परिवर्तन धार्मिक आदेश नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और नैतिक चयन था।
आज आवश्यकता इस बात की है कि जैन धर्म को किसी जाति या वर्ग के खांचे में बंद न किया जाए। जैन धर्म का संदेश स्पष्ट है—अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह और आत्मसंयम। यह संदेश हर मनुष्य के लिए है, चाहे वह किसी भी कुल, वर्ग या पृष्ठभूमि से आता हो।
अंततः कहा जा सकता है कि जैन धर्म की जड़ें भले ही क्षत्रिय राजपरिवारों में दिखाई देती हों, लेकिन उसकी शाखाएँ और फल समस्त मानवता के लिए हैं। यह धर्म सत्ता से नहीं, साधना से; जन्म से नहीं, कर्म से; और बाहरी पहचान से नहीं, आंतरिक शुद्धता से मनुष्य का मूल्य तय करता है। यही जैन दर्शन की सबसे बड़ी प्रासंगिकता और शक्ति है।
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