“अपने को बताना कोई अध्यात्म नहीं, दूसरे को जानना अध्यात्म है।”
अक्सर हम अध्यात्म को स्व-प्रचार या स्व-घोषणा समझ लेते हैं—
कि मैंने यह साधना की, मुझे यह अनुभूति हुई, मैं यह जानता हूँ।
पर यह अहं का विस्तार है, अध्यात्म नहीं।
सच्चा अध्यात्म वहाँ शुरू होता है जहाँ
मैं पीछे हटता है और तू सामने आता है।
दूसरे को जानना मतलब—
उसके दुःख को बिना उपदेश दिए समझ लेना
उसकी चुप्पी को सुन लेना
उसकी कमज़ोरी में उसे तौलना नहीं, थाम लेना
जब आप किसी को जज नहीं करते, बल्कि समझते हैं—
तभी भीतर का ज्ञान जागता है।
अपने बारे में बोलना जानकारी है,
दूसरे के लिए संवेदना रखना चेतना है।
और यही चेतना अध्यात्म का मूल है।
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