Monday, December 8, 2025

कविता: शरीर और मन का अनुनाद



1️⃣ कविता: शरीर और मन का अनुनाद

सांसों की चुप रोशनी में,
मन का एक चराग जलता है।
शरीर की थकी गलियों में,
शांति का कोई पंछी पलता है।

जब धड़कनें विचारों के साथ
एक ही लय में चलती हैं,
तब भीतर का टूटा संगीत
फिर से सुर पाता है।

तन की मिट्टी और मन का आकाश,
दोनों एक ही क्षण में खुलते हैं,
और इंसान अपने भीतर छिपा
सच पहचानने लगता है।

न कोई युद्ध, न कोई शोर—
सिर्फ भीतर का धीमा कंपन।
जहाँ शरीर शांत, मन प्रसन्न,
और आत्मा गाती है—
"यही मेरा घर, यही मेरा ध्यान।"


2️⃣ संपादकीय: शरीर और मन का अनुनाद—समकालीन जीवन की गुम होती लय

हम आधुनिक दुनिया में तेज़ी से भागते हुए अक्सर भूल जाते हैं कि इंसान दो हिस्सों में बँटा हुआ नहीं है—एक शरीर और दूसरा मन। वास्तविकता यह है कि दोनों एक ही समग्र अस्तित्व के दो स्वर हैं। जब ये स्वर तालमेल में होते हैं, तभी जीवन का संगीत पूर्ण होता है; और जब इनमें दरार पड़ती है, तो हमारा पूरा अस्तित्व असंतुलन में डगमगाने लगता है।

आज का मनुष्य तनाव, भागदौड़ और अनिश्चितताओं के बीच जी रहा है। तकनीक की चमक और सूचनाओं की बाढ़ के बीच मन लगातार उत्तेजित रहता है, जबकि शरीर अनियमित जीवनशैली की मार झेलता है। परिणाम यह कि दोनों की लय टूट जाती है। यही टूटन चिंता, अनिद्रा, अवसाद और थकान के रूप में सामने आती है।

शरीर–मन अनुनाद कोई अध्यात्मिक कल्पना नहीं है; यह विज्ञान और व्यवहार दोनों की कसौटी पर खरी उतरने वाली वास्तविकता है। ध्यान, श्वास साधना और सचेत चाल-ढाल आज पूरी दुनिया में स्वास्थ्य-विज्ञान द्वारा स्वीकार की जा चुकी प्रक्रियाएँ हैं। यह प्रमाणित है कि धीमी और गहरी सांसें मस्तिष्क के तनाव केंद्रों को शांत करती हैं, और बदले में शरीर के हार्मोनल तंत्र को संतुलित करती हैं।

दूसरी ओर, शरीर की उपेक्षा सीधे मन की गुणवत्ता पर चोट करती है। खराब नींद, असंतुलित भोजन या निष्क्रियता केवल शारीरिक बीमारियाँ नहीं लातीं—वे विचारों को धुँधला, भावनाओं को चिड़चिड़ा और निर्णयों को अस्थिर बनाती हैं।

समस्या यह नहीं कि मनुष्य व्यस्त है; समस्या यह है कि वह अपनी लय से कट चुका है।
समाधान भी उतना ही सरल है—
शांत सांसें, सचेत अस्तित्व, और शरीर व मन के बीच संवाद।

आज की दुनिया को सिर्फ तेज़ गति नहीं, बल्कि सही लय की आवश्यकता है।
और यह लय तब मिलती है जब हम स्वीकार करते हैं कि शरीर और मन विरोध नहीं, बल्कि साथी हैं—एक-दूसरे की ऊर्जा को बढ़ाने वाले।

हमारे समाज, शिक्षा और कार्य-संस्कृति को भी इस समझ को अपनाने की ज़रूरत है। जीवन की गुणवत्ता केवल आर्थिक विकास से नहीं, बल्कि आंतरिक लय के संतुलन से तय होती है।

शरीर और मन के इस अनुनाद को पुनः खोज लेना, आधुनिक मनुष्य के लिए न केवल उपयोगी बल्कि आवश्यक है — क्योंकि लय में होता मनुष्य  सक्षम और शांत होता है।



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