अटल जी की जयंती पर सभी नेता कार्यकर्ता ने उन्हें याद किया जगह जगह राजनीतिक भाषण हुए पर उनको सच्चे मन से अनुसरण करने वाले बहुत कम दिखे, कौन उनके वास्तविक राजनीतिक उत्तराधिकारी हैं आओ जानते हैं उनके बड़े मन की राजनीति बात।
“छोटे मन से कोई बड़ा नहीं होता, टूटे मन से कोई खड़ा नहीं होता”—यह पंक्ति अटल बिहारी वाजपेयी की है, और शायद इसी एक वाक्य में उनके पूरे सार्वजनिक जीवन का सार छिपा है।
आज के समय में जब राजनीति और समाज दोनों ही असहिष्णुता, त्वरित प्रतिक्रिया और सतही जीत की होड़ में उलझे दिखते हैं, यह पंक्ति हमें ठहरकर सोचने को मजबूर करती है। अटल जी का मानना था कि नेतृत्व का कद भाषणों से नहीं, मन की विशालता से तय होता है। संकीर्ण सोच के साथ सत्ता मिल भी जाए, तो वह इतिहास नहीं रचती—केवल शोर पैदा करती है।
दूसरी पंक्ति और भी गहरी है—“टूटे मन से कोई खड़ा नहीं होता।” यह केवल व्यक्तिगत अवसाद की बात नहीं, बल्कि सामाजिक हताशा का संकेत है। जब नागरिक बार-बार अपमानित हों, उनकी बात सुनी न जाए, और असहमति को अपराध बना दिया जाए, तो मन टूटते हैं। ऐसे में विकास के आंकड़े खड़े हो सकते हैं, लेकिन समाज खुद खड़ा नहीं रह पाता।
अटल जी की राजनीति संवाद की राजनीति थी। विरोधियों के प्रति सम्मान और लोकतांत्रिक मर्यादाओं के प्रति प्रतिबद्धता उनकी पहचान थी। वे जानते थे कि मन तोड़कर भीड़ तो जुटाई जा सकती है, लेकिन राष्ट्र नहीं बनाया जा सकता।
आज ज़रूरत इस बात की है कि हम फिर से उस राजनीति और उस सामाजिक सोच की ओर लौटें जहाँ बड़ा बनने की शर्त दूसरों को छोटा करना नहीं, बल्कि मन को बड़ा करना हो। क्योंकि अंततः देश वही आगे बढ़ता है, जिसके नागरिक आत्मसम्मान के साथ खड़े हों—और टूटे मनों के सहारे कोई भविष्य नहीं बनता।
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