Sunday, December 28, 2025

“धर्म को धारण करना चाहिए, धर्म का नशा नहीं करना चाहिए।”

“धर्म को धारण करना चाहिए, धर्म का नशा नहीं करना चाहिए।”

धर्म का अर्थ है—जो हमें धारण करे, जो हमारे आचरण, करुणा और विवेक को संभाले।
पर जब धर्म नशा बन जाता है, तब वह हमें नहीं संभालता—हम दूसरों को कुचलने लगते हैं।

धर्म का नशा आदमी को इतना मदहोश कर देता है कि
वह ईश्वर की जगह स्वयं को उसका ठेकेदार समझने लगता है।
फिर सत्य नहीं, केवल पहचान बचती है;
करुणा नहीं, केवल क्रोध बोलता है।

धर्म को धारण करने वाला व्यक्ति
शांत होता है, सहिष्णु होता है, प्रश्न करता है।
वहीं धर्म का नशा करने वाला
भीड़ बनाता है, दुश्मन खोजता है और हिंसा को आस्था कहता है।

सच्चा धर्म
हाथ में शस्त्र नहीं,
हृदय में संवेदना देता है।
वह दूसरों को बदलने नहीं,
खुद को बेहतर बनाने की प्रेरणा देता है।

धर्म यदि हमें
अहंकारी, कठोर और असहिष्णु बना दे—
तो समझ लेना चाहिए कि
हमने धर्म नहीं, नशा कर लिया है।

धर्म वह है जो
मनुष्य को मनुष्य बनाए।
बाक़ी सब—केवल शोर है।

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