Sunday, December 28, 2025

इतिहास का कथन, वर्तमान का सबक

इतिहास का कथन, वर्तमान का सबक

(संपादकीय)

1919 में यदि औपनिवेशिक सत्ता के प्रतिनिधि Lord Chelmsford से जुड़ा यह कथन— “ब्राह्मणों में नायकत्व नहीं होता”—कहा या प्रचारित किया गया, तो वह केवल उस दौर की राजनीतिक चाल नहीं थी। वह एक सोची-समझी रणनीति थी—समाज को बाँटो, नेतृत्व को कमज़ोर करो और सत्ता को सुरक्षित रखो।

दुखद सच्चाई यह है कि एक सदी बाद भी यह रणनीति बदली नहीं है, केवल शासक बदल गए हैं, तरीके आधुनिक हो गए हैं।

आज भी नायकत्व को परिभाषित करने का ठेका कुछ खास खाँचों ने ले रखा है। कोई जाति, कोई वर्ग, कोई विचारधारा—सबको प्रमाणपत्र बाँटे जा रहे हैं कि कौन “नेतृत्व के योग्य” है और कौन नहीं। फर्क बस इतना है कि 1919 में यह काम विदेशी सत्ता करती थी, आज यह काम हम अपने ही समाज के भीतर से कर रहे हैं।

वर्तमान भारत में जब भी कोई वर्ग सवाल पूछता है, तर्क देता है, संविधान की भाषा बोलता है—उसे तुरंत किसी न किसी लेबल में बंद कर दिया जाता है।

कभी “एलीट”

कभी “अर्बन नक्सल”

कभी “जातिवादी”


यह वही मानसिकता है, जो कभी “नायकत्व नहीं होता” जैसे वाक्यों में व्यक्त हुई थी।

आज नेतृत्व को भी केवल शोर, शक्ति और आक्रामकता से जोड़ दिया गया है। शांत विवेक, वैचारिक गहराई और नैतिक साहस को कमजोरी समझा जाने लगा है। यह सोच लोकतंत्र के लिए उतनी ही खतरनाक है, जितनी औपनिवेशिक शासन के लिए राष्ट्रीय चेतना खतरनाक थी।

इतिहास गवाह है—जब भी समाज ने नायकत्व को संकीर्ण परिभाषाओं में कैद किया, तब-तब वह बाहरी या भीतरी सत्ता के हाथों खिलौना बना। 1919 में अंग्रेज़ों ने यह प्रयोग किया था, आज हम वही प्रयोग स्वयं पर दोहरा रहे हैं।

सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि किस जाति या वर्ग में नायकत्व है।
असल सवाल यह है—क्या हम विचार आधारित नेतृत्व से डरने लगे हैं?
क्या हम अब भी यह तय करना चाहते हैं कि कौन नेतृत्व करेगा, और कौन केवल अनुसरण?

1919 का कथन हमें चेतावनी देता है—नायकत्व को जाति, वर्ग या पहचान से जोड़ना सत्ता के लिए तो सुविधाजनक हो सकता है, लेकिन समाज के लिए यह हमेशा विनाशकारी सिद्ध हुआ है।

इतिहास केवल पढ़ने के लिए नहीं होता।
इतिहास इसलिए होता है ताकि हम वही गलती दोबारा न करें—
जिसे कभी किसी वायसराय ने हमारे लिए रचा था,
और जिसे आज हम स्वयं अपने लिए रच रहे हैं।

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