नासिक कुंभ मेला दुनिया का सबसे बड़ा आध्यात्मिक और सांस्कृतिक आयोजन है। मिट्टी, संस्कृति और अध्यात्म की सुगंध से बना यह आयोजन स्वयं में महान है। लेकिन विडंबना यह है कि उसी आध्यात्मिक ऊर्जा के केंद्र—तपोवन—में आज 1700 से अधिक पेड़ों की कटाई का प्रस्ताव रखा गया है।
प्रश्न यह नहीं है कि कुंभ के लिए सुविधाएँ क्यों चाहिए। प्रश्न यह है कि सुविधाएँ प्रकृति की कीमत पर क्यों?
आज दुनिया सतत विकास की बात कर रही है। शहर आधुनिकता के साथ ‘ग्रीन इंफ्रास्ट्रक्चर’ को जोड़ रहे हैं। ऐसे समय में धार्मिक आयोजन के लिए हज़ारों पेड़ काटना नासिक को पीछे ले जाने वाला कदम है।
पेड़ केवल लकड़ी नहीं—एक जीवित तंत्र है। वे हवा शुद्ध करते हैं, मिट्टी को बाँधते हैं, गर्मी कम करते हैं और मानव–जीवन के लिए सुरक्षा कवच का काम करते हैं। तपोवन जैसे हरित क्षेत्र में पेड़ों की इतनी बड़ी कटाई न केवल पर्यावरणीय नुकसान है, बल्कि सांस्कृतिक विरासत पर भी प्रहार है।
क्या विकल्प नहीं हैं?
बिल्कुल हैं। आधुनिक बायोटॉयलेट, पोर्टेबल सैनिटेशन यूनिट, मोबाइल वॉशरूम, और पर्यावरण-अनुकूल अस्थायी ढाँचे दुनिया के अनेक बड़े आयोजनों में अपनाए जा चुके हैं। यह ऐसे समाधान हैं जिनसे पेड़ों को छुए बिना आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध कराई जा सकती हैं।
समाज और प्रशासन दोनों के लिए यह समय आत्मचिंतन का है। धार्मिक आयोजन के नाम पर प्रकृति का नुकसान हमारी आस्था का उद्देश्य नहीं हो सकता।
तपोवन को बचाना केवल 1700 पेड़ों को बचाना नहीं है—यह नासिक की पहचान, संस्कृति और भविष्य को सुरक्षित रखना है।
अब नागरिकों को जिम्मेदारी के साथ अपनी आवाज़ उठानी होगी ताकि विकास और पर्यावरण एक साथ चल सकें।
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