यह प्रश्न किसी एक व्यक्ति या समुदाय पर आरोप नहीं, बल्कि एक सभ्यतागत आत्मालोचना है। सच यह है कि आज का ब्राह्मण—और केवल ब्राह्मण ही क्यों, पूरा समाज—अपने मूल दर्शन से कटा हुआ है। इसके पीछे कई कारण हैं, जिन्हें समझना ज़रूरी है।
पहला कारण—जन्म का भ्रम।
समय के साथ ब्राह्मण होना साधना से हटकर पहचान बन गया। जो दर्शन कभी ज्ञान, संयम और तप पर आधारित था, वह केवल उपनाम और परंपरा में सिमट गया। जब “होना” स्वतः मान लिया जाए, तो “बनने” की यात्रा रुक जाती है। यही कारण है कि ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी, जो आत्मचिंतन और प्रश्न की मांग करती थी, औपचारिक कर्मकांड में बदल गई।
दूसरा कारण—ग्रंथों से दूरी।
जिस परंपरा की आत्मा उपनिषद जैसे ग्रंथों में बसती है, वहाँ आज उनका पाठ नहीं, केवल उनका नाम बचा है। ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी प्रश्न पूछना सिखाती है—“मैं कौन हूँ?”, “सत्य क्या है?”—लेकिन आज अधिकांश धार्मिक शिक्षा उत्तर रटाने तक सीमित है। प्रश्नों से डर और जिज्ञासा का अभाव बोध को जन्म ही नहीं लेने देता।
तीसरा कारण—कर्मकांड का वर्चस्व।
दर्शन कठिन है, कर्मकांड आसान। दर्शन विवेक माँगता है, कर्मकांड केवल अभ्यास। धीरे-धीरे ब्राह्मण की भूमिका समाज के पथप्रदर्शक से घटकर अनुष्ठान कराने वाले पेशेवर की बन गई। जब ज्ञान का स्थान प्रक्रिया ले ले, तब बोध खो जाता है।
चौथा कारण—सत्ता से समझौता।
इतिहास में कई दौर ऐसे आए जब ब्राह्मण वर्ग ने सत्ता से दूरी रखने के बजाय उससे समझौता किया। परिणामस्वरूप दर्शन निर्भीक नहीं रहा। जबकि ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी का मूल स्वर सत्ता से प्रश्न करना था—जैसा कि आदि शंकराचार्य ने अपने समय में किया। आज वह साहस कम दिखाई देता है।
पाँचवाँ कारण—आधुनिकता का अधूरा बोध।
आज का ब्राह्मण न पूरी तरह परंपरा में है, न पूरी तरह आधुनिक विवेक में। पश्चिमी आधुनिकता उसने उपभोग में अपनाई, लेकिन आलोचनात्मक चिंतन में नहीं; और परंपरा उसने रस्मों में बचाई, दर्शन में नहीं। इस दोराहे पर खड़ा व्यक्ति स्वाभाविक रूप से बौध से दूर हो जाता है।
निष्कर्ष
आज के ब्राह्मण को ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी का बोध इसलिए नहीं है क्योंकि उसने ब्राह्मण होने को विरासत और ब्राह्मण बनने की साधना छोड़ दी है।
बोध किसी जाति से नहीं, चेतना के श्रम से आता है।
जिस दिन ब्राह्मण फिर से प्रश्न करेगा, सत्ता से दूरी रखेगा, और ज्ञान को जीवन में उतारेगा—उसी दिन यह दर्शन पुनर्जीवित होगा।
यह संकट किसी एक वर्ग का नहीं, पूरे समाज का है। क्योंकि जब मार्गदर्शक ही मार्ग भूल जाए, तो यात्रा भटकना तय है।
No comments:
Post a Comment