Friday, December 26, 2025

सबको अपने हिस्से की भूख मिलती है, पर सबको अपने हिस्से का भात नहीं मिलता

सबको अपने हिस्से की भूख मिलती है, पर सबको अपने हिस्से का भात नहीं मिलता

यह पंक्ति किसी कविता का अलंकार नहीं, बल्कि हमारे समय का नंगा सच है। भूख किसी भेदभाव को नहीं मानती। वह अमीर के पेट में भी उठती है और गरीब की आँतों में भी। फर्क सिर्फ इतना है कि किसी के सामने थाली रख दी जाती है और किसी के सामने केवल प्रतीक्षा।

आज देश में अनाज की कमी नहीं है। सरकारी आँकड़े बताते हैं कि गोदाम भरे हैं, उत्पादन रिकॉर्ड तोड़ रहा है और योजनाएँ काग़ज़ों पर सफल हैं। इसके बावजूद एक बड़ा वर्ग ऐसा है, जो रोज़ अपने हिस्से की भूख के साथ सोता है। यह विरोधाभास बताता है कि समस्या भूख की नहीं, व्यवस्था की है।

किसान खेत में पसीना बहाता है, मज़दूर ईंट-गारा ढोता है, श्रमिक शहरों की नींव उठाता है—लेकिन सबसे पहले वही भात से वंचित रह जाता है। भूख उसकी नियति बना दी गई है और भात किसी और का अधिकार। यह सामाजिक असमानता का सबसे क्रूर रूप है, जहाँ मेहनत और भोजन के बीच की कड़ी तोड़ दी गई है।

भूख केवल पेट तक सीमित नहीं रहती। वह आत्मसम्मान, शिक्षा और भविष्य को भी निगल जाती है। भूखा बच्चा स्कूल में सीख नहीं पाता, भूखा युवा व्यवस्था पर विश्वास खो देता है और भूखा समाज धीरे-धीरे भीतर से टूटने लगता है। यह सिर्फ मानवीय संकट नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक विफलता भी है।

सबसे खतरनाक स्थिति तब होती है जब समाज भूख का आदी हो जाता है—जब खाली थाली को सामान्य मान लिया जाता है और इसे भाग्य या मजबूरी कहकर टाल दिया जाता है। यहीं से संवेदना मरने लगती है और नीति केवल आंकड़ों तक सिमट जाती है।

अब समय आ गया है कि भूख को दया का विषय नहीं, अधिकार का प्रश्न माना जाए। भोजन कोई उपकार नहीं, जीवन का मूल अधिकार है। जब तक हर व्यक्ति को उसके हिस्से का भात नहीं मिलेगा, तब तक विकास, समृद्धि और प्रगति जैसे शब्द खोखले ही रहेंगे।

क्योंकि किसी भी सभ्य समाज की पहचान उसके गोदामों से नहीं, बल्कि उसकी थालियों से होती है।

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