Saturday, February 7, 2026

दीवारें जो स्कूल बन गईं

🎨 दीवारें जो स्कूल बन गईं

$1 मिलियन पुरस्कार जीतने वाली रूबल नागी की कहानी

भारत में जब शिक्षा की बात होती है, तो अक्सर इमारतों, बजट और नीतियों पर चर्चा होती है। लेकिन रूबल नागी ने यह साबित कर दिया कि शिक्षा के लिए न तो भव्य भवन ज़रूरी हैं और न ही भारी-भरकम संसाधन—अगर सोच रचनात्मक और संवेदनशील हो तो झुग्गी की दीवारें भी स्कूल बन सकती हैं।

रूबल नागी को मिला $1 मिलियन का ग्लोबल टीचर प्राइज केवल एक व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह उस भारत की जीत है जहाँ आज भी लाखों बच्चे गरीबी, बाल श्रम और सामाजिक उपेक्षा के कारण शिक्षा से वंचित हैं। एक कलाकार होते हुए उन्होंने कैनवास की सीमाओं को तोड़ा और समाज को अपनी कला का मंच बना दिया।

झुग्गी-बस्तियों की उजड़ी, गंदी और उपेक्षित दीवारों को उन्होंने “Living Walls of Learning” में बदल दिया। इन दीवारों पर उकेरे गए रंग सिर्फ सौंदर्य नहीं रचते, बल्कि अक्षर ज्ञान, गणित, विज्ञान, स्वच्छता और सामाजिक मूल्यों का पाठ पढ़ाते हैं। जिन बच्चों ने कभी स्कूल का दरवाज़ा नहीं देखा, वे खेल-खेल में सीखने लगे।

Rouble Nagi Art Foundation के माध्यम से देशभर में 800 से अधिक मुफ्त लर्निंग सेंटर्स स्थापित करना यह दर्शाता है कि जब सरकारें योजनाएँ बनाने में उलझी रहती हैं, तब समाज से निकली पहलें ज़मीनी बदलाव ला सकती हैं। यह प्रयोग शिक्षा को किताबों से बाहर निकालकर जीवन से जोड़ता है।

यह पुरस्कार सरकारों के लिए भी एक आईना है। क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था अब भी इमारतों और आंकड़ों तक सीमित रहेगी, या वह रचनात्मकता और समावेशन को अपनाएगी? क्या नीति-निर्माता कला, संस्कृति और स्थानीय संसाधनों को शिक्षा का हिस्सा बनाने का साहस दिखाएँगे?

रूबल नागी की सफलता यह संदेश देती है कि शिक्षा मंत्रालयों की फाइलों से नहीं, बल्कि समाज की दीवारों से भी क्रांति शुरू हो सकती है। जरूरत है ऐसे प्रयासों को संस्थागत समर्थन देने की, ताकि यह प्रयोग अपवाद न रह जाए, बल्कि मॉडल बने।

आज जब दुनिया ने एक भारतीय कलाकार-शिक्षक को सम्मानित किया है, तब भारत के लिए यह आत्ममंथन का क्षण है—क्या हम अपनी दीवारों को यूँ ही खामोश रहने देंगे, या उन्हें भी बोलने और सिखाने देंगे?

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