Saturday, June 28, 2025

**“कैदी जो आज़ाद हो सकते थे”**


🎬 **“कैदी जो आज़ाद हो सकते थे”**

*(एक सच्ची कहानी उन 140 कैदियों की, जो रिहाई के पात्र थे, लेकिन सालों तक जेल में सड़ते रहे)*


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## 🎞️ **डॉक्यूमेंट्री स्क्रिप्ट**


### 🎬 शीर्षक: **"कैदी जो आज़ाद हो सकते थे"**


**अवधि:** 12-15 मिनट

**भाषा:** हिंदी

**फॉर्मेट:** नैरेशन + ग्राउंड विज़ुअल्स + केस स्टोरीज़ + कोर्ट टिप्पणियाँ


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### 🔊 **\[Opening Scene – ब्लैक स्क्रीन पर नैरेशन]**


🎙️ (धीमी आवाज में)

“कल्पना कीजिए…

आपने अपनी सजा पूरी कर ली है।

कोर्ट, समाज, और सरकार — सभी ने माना कि अब आप आज़ाद होने के योग्य हैं।

लेकिन फिर भी… आप आज़ाद नहीं।

आप जेल में ही बंद हैं... बिना कसूर के।

ऐसे हैं उत्तराखंड के वो 140 कैदी...

**‘जो आज़ाद हो सकते थे।’**”


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### 🎥 **\[सीन 1 – जेल के बाहर के शॉट्स, ताले लगे दरवाज़े, बंजर गलियाँ]**


🎙️ नैरेशन:

"उत्तराखंड की जेलें… जहाँ सैकड़ों कैदी अपने किए की सजा भुगतते हैं। लेकिन कुछ ऐसे भी हैं, जिनकी **सजा पूरी हो चुकी है**, पर रिहाई अब तक नहीं हुई।"


📋 टेक्स्ट ऑन स्क्रीन:


> *“140 कैदी, 5 से 6 साल से जेलों में बंद, जबकि वे रिहाई के पात्र हैं।”*

> — *उत्तराखंड हाईकोर्ट, जून 2025*


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### 🎥 **\[सीन 2 – डॉक्यूमेंट्स की क्लोज़-अप, पुराने सरकारी फाइलों की धूल भरी अलमारी]**


🎙️ नैरेशन:

"सरकारी फाइलों की भीड़ में, कहीं गुम हो जाती है इन कैदियों की **रिहाई की अपील**।

Sentence Review Board की बैठकें स्थगित होती रहीं…

और हर बार नई तारीख दी जाती रही।"


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### 🎥 **\[सीन 3 – कोर्ट रूम स्केच, न्यूज़ क्लिपिंग्स फ्लैश]**


📢 न्यूज़ एंकर (वॉइसओवर):

“उत्तराखंड हाईकोर्ट ने जेलों में बंद 140 रिहाई के पात्र कैदियों की रिहाई में देरी पर जताई कड़ी नाराज़गी…”


🎙️ नैरेशन:

"हाईकोर्ट ने इसे **'प्रशासनिक उदासीनता'** कहा — और दो सप्ताह में सक्षम बोर्ड गठित करने का आदेश दिया।"


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### 🎥 **\[सीन 4 – एक पूर्व कैदी की कहानी (रीक्रिएटेड विज़ुअल्स)]**


👤 (वृद्ध व्यक्ति कैमरे की ओर)

"मेरी रिहाई 2020 में होनी थी…

लेकिन मैं 2024 तक जेल में ही था।

कहते थे – ‘बोर्ड नहीं बैठा अभी’।

वो 4 साल मेरी ज़िंदगी के सबसे काले साल थे।"


🎙️ नैरेशन:

"ऐसी कहानी अकेले एक की नहीं… **140 ज़िंदगियाँ** इस सिस्टम की चुप्पी का शिकार बनीं।"


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### 🎥 **\[सीन 5 – वकीलों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की क्लिप]**


🧑‍⚖️ अधिवक्ता (क्लिप):

"हमने कई बार अनुरोध किया कि Sentence Review Board नियमित हो…

लेकिन किसी ने ध्यान नहीं दिया।"


👩‍⚕️ सोशल वर्कर:

"बुजुर्ग कैदी मानसिक रूप से टूट चुके हैं। कई तो जेल में ही बीमार हो गए।"


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### 🎥 **\[सीन 6 – जेलों की भीड़भाड़, कैदियों की संख्या पर आंकड़े]**


📊 ग्राफिक्स ऑन स्क्रीन:


> "उत्तराखंड की जेलों की कुल क्षमता: 3000

> वर्तमान कैदी: 4600

> रिहाई के पात्र: 140+ (2025 रिपोर्ट)"


🎙️ नैरेशन:

"जब जेलें ओवरलोड हैं, तब भी जिन्हें छोड़ा जा सकता है, उन्हें रोकना न सिर्फ अन्याय है – बल्कि अमानवीयता है।"


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### 🎥 **\[सीन 7 – हाईकोर्ट के आदेश का फ्लैश, ऑडियो क्लिप (रीक्रिएटेड)]**


👨‍⚖️ *आवाज़ (नाटकीय पुनर्निर्माण)*

"यह न्याय का मज़ाक है…

पात्र कैदियों को अब और एक दिन भी जेल में नहीं रहना चाहिए।"


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### 🎥 **\[सीन 8 – सामाजिक संगठनों की अपील]**


🎙️ नैरेशन:

"Udaen Foundation और अन्य सामाजिक संगठन अब आवाज़ उठा रहे हैं –

कि सिर्फ आदेश नहीं, **प्रभावी कार्यवाही** हो।

हर पात्र कैदी को रिहा किया जाए।

और दोषी अधिकारियों की जवाबदेही तय हो।"


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### 🎥 **\[सीन 9 – उम्मीद और पुनर्वास के विज़ुअल्स]**


🎙️ नैरेशन:

"इन 140 कैदियों को सिर्फ आज़ादी ही नहीं चाहिए…

उन्हें चाहिए **सम्मान, पुनर्वास, और जीवन जीने का दूसरा अवसर।**

हमें उन्हें वो अवसर देना होगा… क्योंकि

**'न्याय में देरी, अन्याय होता है।'**"


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### 🎬 **\[अंतिम दृश्य – कैमरा ऊपर की ओर उठता है, बैकग्राउंड में धूप, खुला गेट, और आवाज़]**


🎙️ वॉइसओवर:

**"कैदी जो आज़ाद हो सकते थे —

अब वो कह रहे हैं,

'हमें और देर मत कीजिए…

अब हमें जीने दीजिए।'"**




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## 📰 **मानवाधिकार की घुटन और जेलों का बोझ: रिहाई के पात्र कैदियों के लिए न्याय की देरी, उत्तराखंड हाईकोर्ट का हस्तक्षेप**



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**दिनांक:** 28 जून 2025

**स्थान:** नैनीताल, उत्तराखंड

**प्रस्तुति:** *Udaen Foundation / Udaen News Network (यदि उपयोग करना चाहें)*


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### 📌 **मामला क्या है?**


उत्तराखंड हाईकोर्ट ने राज्य की जेलों में 5 से 6 वर्षों से **रिहाई के पात्र 140 कैदियों** की अब तक रिहाई न होने पर **गंभीर नाराजगी** जताई है। अदालत ने इस देरी को **"प्रशासनिक उदासीनता"** करार दिया है और दो सप्ताह के भीतर **सक्षम प्राधिकारी बोर्ड** गठित कर शीघ्र रिहाई की प्रक्रिया आरंभ करने का आदेश दिया है।


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### ⚖️ **कोर्ट की टिप्पणियाँ और आदेश:**


* यह मामला **मुख्य न्यायाधीश जी. नरेंद्र** और **न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल** की खंडपीठ के समक्ष प्रस्तुत हुआ।

* रिपोर्ट में बताया गया कि 140 ऐसे कैदी हैं जो **सरकार की नीति के अनुसार रिहाई के पात्र** हैं, परंतु **कोई निर्णय नहीं लिया गया**।

* रिपोर्ट में तीन कैदियों का उदाहरण दिया गया, जो **2019, 2020, और 2021 से ही रिहाई के योग्य** थे।

* **राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA), राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (SLSA), और जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA)** के प्रयासों के बावजूद सरकार की निष्क्रियता बनी रही।


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### 🧾 **यह मामला क्यों महत्वपूर्ण है?**


* भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के अनुसार, *"हर व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार है।"*

* यदि कोई व्यक्ति अपनी सजा पूरी कर चुका है या सरकार की नीति के अंतर्गत **रिहाई का पात्र है**, तो उसे और अधिक जेल में रखना **न्यायालयिक हिंसा** और **मानवाधिकार हनन** है।

* जेलों पर पहले से ही **क्षमता से अधिक भीड़** है। ऐसे मामलों में देरी **अन्य कैदियों के लिए भी संकट** पैदा करती है।


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### 📣 **उद्यान फाउंडेशन / नागरिक समाज की मांग:**


1. **सभी पात्र कैदियों की सूची सार्वजनिक की जाए।**

2. **रिहाई में देरी के लिए उत्तरदायी प्रशासनिक अधिकारियों की जवाबदेही तय हो।**

3. **स्थायी 'Sentence Review Board'** का गठन किया जाए, जो 6-6 महीने में स्वतः समीक्षा करे।

4. **पिछले मामलों में मानसिक, सामाजिक और आर्थिक नुकसान की भरपाई** पर विचार हो।

5. **RTI के माध्यम से जिला-वार सूची** प्राप्त कर स्थानीय कानूनी सहायता केंद्र बनाए जाएं।


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### 🔍 **जनहित याचिका या RTI हेतु आधारभूत प्रश्न:**


* जिला जेलों में कितने कैदी रिहाई के पात्र हैं लेकिन अब तक बंद हैं?

* Sentence Review Board की बैठकें कितनी बार हुईं और किसने रोका?

* 2018 से 2024 तक कितने कैदियों को समय से पहले रिहा किया गया?


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### 🕊️ **न्याय की देरी, न्याय का इंकार:**


यह मामला हमें यह सोचने को मजबूर करता है कि **"सजा पूरी हो जाने के बाद भी अगर आज़ादी न मिले, तो यह किस प्रकार का लोकतंत्र है?"**

उत्तराखंड हाईकोर्ट की यह सख्त टिप्पणी **राज्य की जेल प्रणाली, दया नीति, और प्रशासनिक जवाबदेही** को नए सिरे से देखने की मांग करती है।


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### 🖊️ *लेखक/संपादक सुझाव:*


* इस विषय पर एक RTI फाइल करें

* जेल सुधारों पर पंचायत / ब्लॉक स्तर पर संवाद आयोजित करें

* मीडिया में दबाव बनाकर सरकार से रिपोर्ट मांगें

* उच्चतम न्यायालय में *guidelines for mandatory sentence review system* की याचिका तैयार करें


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## 📰 **उत्तराखंड हाईकोर्ट ने 140 पात्र कैदियों की रिहाई में देरी पर जताई कड़ी नाराज़गी, दो हफ्ते में बोर्ड गठन का आदेश**






**नैनीताल, 28 जून 2025 | संवाददाता: उद्यान न्यूज़ नेटवर्क (Udaen News Network)**


उत्तराखंड हाईकोर्ट ने राज्य की जेलों में 5-6 वर्षों से बंद **140 रिहाई के पात्र कैदियों** की रिहाई में हो रही **बेतहाशा देरी** पर सख्त नाराजगी जताई है। अदालत ने इसे **प्रशासनिक उदासीनता** बताते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि **दो सप्ताह के भीतर सक्षम प्राधिकारी बोर्ड का गठन कर रिहाई की प्रक्रिया** तत्काल शुरू की जाए।


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### 📌 **क्या है मामला?**


शनिवार को मुख्य न्यायाधीश **जी. नरेंद्र** और न्यायमूर्ति **राकेश थपलियाल** की खंडपीठ के समक्ष यह मामला प्रस्तुत हुआ, जिसमें एक विस्तृत रिपोर्ट के माध्यम से यह बताया गया कि **140 ऐसे कैदी** हैं जो **सरकार की नीतियों के अनुसार** रिहाई के पूर्णतः पात्र हैं, लेकिन फिर भी वर्षों से जेलों में बंद हैं।


रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया कि इनमें से **तीन कैदी तो वर्ष 2019, 2020 और 2021** से ही रिहाई के योग्य हैं। बावजूद इसके उन्हें अब तक कोई कानूनी राहत नहीं मिली।


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### ⚖️ **कोर्ट की सख्त टिप्पणी:**


न्यायालय ने कहा कि –


> **"राष्ट्रीय, राज्य और जिला विधिक सेवा प्राधिकरणों के निरंतर प्रयासों के बावजूद इन कैदियों को रिहा नहीं किया गया है, जो सीधे-सीधे मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।"**


कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि **"यह प्रशासनिक लापरवाही और मानवीय संवेदनशीलता की घोर कमी को दर्शाता है।"**


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### 🧾 **क्या कहती है सरकार की नीति?**


सरकार की रिहाई नीति के अनुसार, ऐसे कैदी जो एक निश्चित अवधि की सजा पूरी कर चुके हैं या अच्छे आचरण के आधार पर छूट के पात्र हैं, उन्हें समय-समय पर गठित **Sentence Review Board** की संस्तुति पर रिहा किया जाना चाहिए। लेकिन हाईकोर्ट की रिपोर्ट के अनुसार, **इस प्रक्रिया में वर्षों से ठहराव बना हुआ है।**


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### 🚨 **अब क्या हुआ आदेश?**


हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि—


* **दो सप्ताह में Sentence Review Board का गठन किया जाए।**

* **140 कैदियों की समीक्षा प्रक्रिया तुरंत शुरू की जाए।**

* **रिहाई की पूरी कार्यवाही समयबद्ध रूप से पूरी की जाए।**


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### 📣 **जन संगठनों की प्रतिक्रिया:**


**Udaen Foundation** और अन्य सामाजिक संगठनों ने इस आदेश का स्वागत करते हुए कहा कि यह उत्तराखंड की न्याय प्रणाली के लिए **मानवीय और संवेदनशील दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम** है।


> **"यह सिर्फ कैदियों की नहीं, बल्कि न्याय के उस सिद्धांत की रिहाई है, जो कहता है कि न्याय में देरी, अन्याय होती है।"** — *दीनेश गुसाईं, अध्यक्ष, उद्यान फाउंडेशन*


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### 🕊️ **क्या है अगला कदम?**


अब निगाहें इस बात पर होंगी कि—


* राज्य सरकार कितनी तत्परता से बोर्ड का गठन करती है।

* क्या सभी पात्र कैदियों को समय पर न्याय मिलेगा?

* क्या आगे से जेलों में रिहाई प्रक्रिया को नियमित किया जाएगा?


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### 🔎 **विशेष टिप्पणी:**


"उत्तराखंड की जेलों में न्याय की प्रतीक्षा कर रहे इन 140 कैदियों की पीड़ा यह दर्शाती है कि प्रशासनिक चुप्पी भी कई बार **एक धीमा जहर बन जाती है**। हाईकोर्ट का यह आदेश उन सभी आवाज़ों के लिए उम्मीद की किरण है, जो सालों से 'रिहाई की तारीख' का इंतज़ार कर रहे थे।"


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Friday, June 27, 2025

न्यूयॉर्क सिटी में डेमोक्रेटिक उम्मीदवार जोहरन मामदानी (Zohran Mamdani) वर्तमान में क्यों लोकप्रिय हो रहे हैं।




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🌟 परिचय

जोहरन क्वामे मामदानी, 33 वर्ष, क्वींस, न्यूयॉर्क के स्टेट असेंबली सदस्य, और लोकतांत्रिक सोशलिस्ट ऑफ अमेरिका के सदस्य, वर्तमान में NYC मेयेरल रेस में एक बड़ी लोकप्रियता हासिल कर रहे हैं। उनका अभियान मनोरंजक, सीधे-सादे वीडियो, और कार्यकर्ता-उन्मुख रणनीति के साथ एक नई राजनीतिक शैली पेश कर रहा है।  


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1. किफ़ायती जीवनशैली पर फोकस

किराया फ्रीज, मुफ्त मेट्रो बस, यूनिवर्सल चाइल्डकेयर, और सिटी-ओन्ड ग्रोसरी स्टोर्स – ये ऐसे उपाय हैं जो सीधे जनता के जेब पर असर डालते हैं।  

इन योजनाओं को अमीरों और बड़े कॉर्पोरेट्स पर टैक्स बढ़ाकर फंड करने का प्रस्ताव रखकर, वह “आर्थिक न्याय” का संदेश दे रहे हैं।  



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2. जेन Z & मिलेनियल्स के साथ गहरे कनेक्शन

TikTok, Instagram और मिम्स का इस्तेमाल करके उन्होंने युवा मतदाताओं के बीच ऊर्जा और जुड़ाव पैदा किया है। videos का नाम: जैसे “I’m freezing… your rent” वाला viral stunt।  

उनके अभियान की लगभग 46,000+ वॉलंटियर्स टीम ने 1 मिलियन से ज़्यादा दरवाज़े खटखटाए, जिससे जमीनी स्तर पर भारी सहभागिता हुई।  



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3. सांसद AOC और बर्नी सैंडर्स का समर्थन

अलेक्ज़ान्ड्रिया ओकसियो-कोर्टेज़ और बर्नी सैंडर्स जैसी उभरती और लोकप्रिय प्रोग्रेसिव आवाज़ों का समर्थन, उनकी क्षमताओं में विश्वास दर्शाता है।  

उनका समर्थन सिर्फ प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि अभियान को राष्ट्रव्यापी पहचान और नेटवर्किंग मदद प्रदान करता है।



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4. बहु-भाषी और सांस्कृतिक जुड़ाव

बॉलीवुड संगीत, हिंदी/उर्दू भाषा और Deewar तथा Om Shanti Om जैसी फिल्मों के जोक्स का प्रयोग, विशेष रूप से दक्षिण एशियाई समुदाय में गहराई से जुड़ता है। उनके "मेरे पास आप हैं" वीडियो को व्यापक रूप से साझा किया गया।  

यह रणनीति उनकी पहचान को साकार करती है—एक ऐसा खिलाड़ी जो विविधता में विश्वास करता है और प्रथम‑पीढ़ी के इमिग्रेंट्स से सीधे संवाद करता है।



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5. नवीनतम, प्रत्यक्ष राजनीति

“Politics of no translation”: सीधे सरल भाषा में जनता की समस्याएँ बता कर, वह पारंपरिक राजनीतिक झंझट से बचते हैं। "अगर मैं कहता हूं कि मैं आपका किराया फ्रीज कर दूंगा, तो आपको स्पष्ट रूप से समझ आता है"—ये उनकी राजनीति की धरातल को दर्शाता है।  



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6. चारिज़्मा और व्यक्तिगत कहानी

यूगांडा में जन्मे (मिरा नायर और महमूद मामदानी के पुत्र) और ब्रॉन्क्स हाई स्कूल से ग्रैजुएट, वह एक ग्लोबल पृष्ठभूमि के साथ युवा और ऊर्जा भरा चेहरा हैं।  

पूर्व में रैपर के रूप में Mr. Cardamom नाम से काम करना, उनके व्यक्तित्व को अनूठा बनाता है।  

अतीत में खुद लोगों की ज़मीनी समस्याओं से लड़ने का अनुभव (जैसे foreclosure counselor) उन्हें विश्वसनीयता देता है।  



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7. स्थापना के खिलाफ डेविड बनाम गोलीयथ

एंड्रयू क्युमो जैसे पूर्व गवर्नर के खिलाफ उनकी लड़ाई, कम बजट लेकिन मजबूत Grassroots vs हाई‑पावर सुपर-PAC से जुटाई गई धनराशि का टकराव है। Mamdani छोटे दान, सार्वजनिक फंड मेचिंग और वॉलंटियर आधार पर निर्भर हैं, जबकि क्युमो को BIg Money का समर्थन मिला।  



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निष्कर्ष

जोहरन मामदानी का अचानक उभार एक समग्र परिवर्तन की मांग का संकेत है—राजनीति को अधिक सीधे, सुलभ और निष्पक्ष बनाना। वह महंगाई, सांस्कृतिक जुड़ाव और युवा ऊर्जा को जोड़ कर एक नया राजनीतिक मॉडल पेश कर रहे हैं। उनके पास न केवल एक वाइब है, बल्कि ज़मीनी प्रभाव और विचार भी हैं, जो उन्हें मौजूदा राजनीतिक संरचना का वास्तविक विकल्प बनाते हैं।



Tuesday, June 24, 2025

"हम पत्रकारिता करते थे — इसलिए उनसे अलग थे"



संपादकीय विशेष

"हम पत्रकारिता करते थे — इसलिए उनसे अलग थे"

— Udaen News Network की पत्रकारिता दर्शन पर आधारित विशेष टिप्पणी

"वो मीडिया हाउस की नौकरी करता था, इसलिए पत्रकार कहलाता था।
हम पत्रकारिता करते थे, इसलिए सच्चाई के साथ खड़े थे।"
यह केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि हमारे और उनके रास्ते का अंतर है — उनका रास्ता कॉरपोरेट एसी कमरों से होकर गुजरता है, और हमारा रास्ता गाँवों की पगडंडियों, आंदोलन की पंक्तियों और सच की खोज में निकली आवाज़ों से।

Udaen News Network एक मिशन है — ऐसा मिशन जो पत्रकारिता को फिर से उसके असली अर्थ तक ले जाना चाहता है। हमारे लिए पत्रकारिता, केवल घटनाओं की रिपोर्टिंग नहीं, बल्कि समाज की चेतना को जागृत करने का कार्य है। हमारे लिए यह एक सामाजिक उत्तरदायित्व है, न कि टीआरपी की दौड़।

क्यों अलग हैं हम?

  • क्योंकि हम सत्ता से सवाल पूछते हैं, समझौता नहीं करते।
  • क्योंकि हम मैदान में उतरते हैं, स्टूडियो की कुर्सियों से नहीं बोलते।
  • क्योंकि हम स्थानीय मुद्दों को राष्ट्रीय विमर्श तक लाते हैं।
  • क्योंकि हम हर उस आवाज़ के साथ हैं जिसे मुख्यधारा मीडिया अनसुना कर देता है।

हमारा कैमरा चमक-दमक की तलाश में नहीं, बल्कि छिपी हुई सच्चाई को उजागर करने के लिए है। हमारी कलम सत्ता की प्रशंसा में नहीं, बल्कि जनता की पीड़ा और प्रतिरोध को लिखने के लिए है।

Udaen News Network क्यों जरूरी है?

उत्तराखंड और हिमालयी क्षेत्रों के हजारों गाँवों की आवाज़ आज भी मीडिया से गायब है। वहाँ की नदियाँ सूख रही हैं, ज़मीनें खिसक रही हैं, युवा पलायन कर रहे हैं, और सरकारें आंकड़ों से बहलाने में लगी हैं। ऐसे समय में Udaen News Network का उदय एक जवाब है — एक विकल्प है उस मीडिया तंत्र के खिलाफ, जिसने ज़मीर गिरवी रखकर चैनल बेच दिए।

हम पत्रकार नहीं बनाते — हम पत्रकारिता करते हैं।

यदि आप भी पत्रकारिता को नौकरी नहीं, ज़िम्मेदारी मानते हैं —
यदि आप भी सत्ता की नहीं, जनता की सेवा करना चाहते हैं —
यदि आप भी रिपोर्टर नहीं, बदलाव के वाहक बनना चाहते हैं —
तो Udaen News Network आपका मंच है।

यहाँ आने वालों से हम डिग्री नहीं, दृष्टिकोण मांगते हैं।
यहाँ जुड़ने वालों से हम तकनीक नहीं, तीव्रता मांगते हैं।
यहाँ काम करने वालों से हम 'पैकेज' नहीं, 'पैशन' मांगते हैं।

अंत में एक वाक्य जो हमारा सिद्धांत बन गया है:

"हम पत्रकारिता करते हैं — नौकरी नहीं।
इसलिए हम उनसे अलग हैं।"


Udaen News Network – आवाज़ उन्हीं की, जिनकी कोई आवाज़ नहीं सुनता।
#JournalismWithZameer #SachaPatrakaar #VoiceOfTheHimalayas



"हम पत्रकारिता करते थे, इसलिए उनसे अलग थे"



"हम पत्रकारिता करते थे, इसलिए उनसे अलग थे"

— एक आत्मस्वीकृति, एक विचार-युद्ध

"वो मीडिया हाउस की नौकरी करता था इसलिए पत्रकार था,
हम नौकरी नहीं पत्रकारिता करते थे इसलिए उनसे अलग थे।"

ये कोई शाब्दिक तुलना नहीं है, बल्कि दो ध्रुवों की पहचान है — एक वो जो सूट-बूट पहनकर स्टूडियो की चमक में खो जाता है, और एक वो जो धूल, धूप और भीड़ के बीच सच्चाई की तलाश में सड़क पर चल रहा होता है।

आज के दौर में पत्रकारिता महज़ एक 'जॉब प्रोफाइल' बन गई है — जहाँ टीआरपी, एडवर्टाइजमेंट और कॉरपोरेट हितों के बीच सच की आवाज कहीं खो सी गई है। लेकिन कभी यही पत्रकारिता एक मिशन थी। एक जन आंदोलन का हिस्सा, जो सत्ता से सवाल करता था, जनता की आवाज बनता था और समाज के अंतिम आदमी तक पहुँचने का जरिया बनता था।

उनके पास संसाधन थे, बड़े चैनल का नाम था, मोटा वेतन था —
हमारे पास सिर्फ एक पुरानी डायरी थी, एक स्याही से भरा पेन, और कुछ चिठ्ठियाँ जो हमने उन माँओं से ली थीं जिनके बेटे सीमा पर शहीद हुए थे, या उन बेटियों से जो अन्याय के खिलाफ खड़ी थीं।

वो 'प्राइम टाइम' के एंकर थे —
हम 'ग्राउंड रिपोर्ट' के सिपाही।
वो खबरें बनाते थे —
हम खबरों के बीच जीते थे।

आज जब पत्रकारिता को 'प्रोफेशन' से 'प्रोडक्ट' बना दिया गया है, तब ये फर्क और ज़्यादा जरूरी हो गया है। पत्रकार होने का मतलब अब स्टूडियो में बैठकर शोर मचाना नहीं है, बल्कि बिना माइक के भी बोल पाना है।

हमने अपनी कलम को कभी 'बिकने' नहीं दिया —
इसलिए हम पत्रकार थे,
और वो सिर्फ नौकरी करने वाले।


यह लेख एक अपील है — युवा पत्रकारों से, मीडिया छात्रों से, और हर उस नागरिक से जो सच्चाई को जानने का अधिकार रखता है।
पत्रकारिता नौकरी नहीं, ज़िम्मेदारी है। अगर आप भी इसे जीना चाहते हैं, तो सच के साथ खड़े होइए — भले ही अकेले क्यों न खड़े होना पड़े।

एक "नौकरी करने वाला" और दूसरा "मिशन और सोच से पत्रकार"।

  एक "नौकरी करने वाला" और दूसरा "मिशन और सोच से पत्रकार"।

"वो मीडिया हाउस की नौकरी करता था, इसलिए पत्रकार कहलाता था।
हम पत्रकारिता करते थे, इसलिए सच्चाई के साथ खड़े थे — नौकरी से नहीं, ज़मीर से बंधे थे।"


"वो कैमरे के पीछे तनख्वाह ढूंढता था,
हम कलम में ज़िम्मेदारी ढूंढते थे।"


न्यूज़ विचार और व्यव्हार

जब मीडिया सत्ता की ढाल बने, तब जनता की पत्रकारिता ज़रूरी

जब मीडिया सत्ता की ढाल बने, तब जनता की पत्रकारिता ज़रूरी लोकतंत्र के चार स्तंभों में मीडिया को इसलिए जगह दी गई थी ताकि वह सत्ता पर निगरानी र...