"हम पत्रकारिता करते थे, इसलिए उनसे अलग थे"
— एक आत्मस्वीकृति, एक विचार-युद्ध
"वो मीडिया हाउस की नौकरी करता था इसलिए पत्रकार था,
हम नौकरी नहीं पत्रकारिता करते थे इसलिए उनसे अलग थे।"
ये कोई शाब्दिक तुलना नहीं है, बल्कि दो ध्रुवों की पहचान है — एक वो जो सूट-बूट पहनकर स्टूडियो की चमक में खो जाता है, और एक वो जो धूल, धूप और भीड़ के बीच सच्चाई की तलाश में सड़क पर चल रहा होता है।
आज के दौर में पत्रकारिता महज़ एक 'जॉब प्रोफाइल' बन गई है — जहाँ टीआरपी, एडवर्टाइजमेंट और कॉरपोरेट हितों के बीच सच की आवाज कहीं खो सी गई है। लेकिन कभी यही पत्रकारिता एक मिशन थी। एक जन आंदोलन का हिस्सा, जो सत्ता से सवाल करता था, जनता की आवाज बनता था और समाज के अंतिम आदमी तक पहुँचने का जरिया बनता था।
उनके पास संसाधन थे, बड़े चैनल का नाम था, मोटा वेतन था —
हमारे पास सिर्फ एक पुरानी डायरी थी, एक स्याही से भरा पेन, और कुछ चिठ्ठियाँ जो हमने उन माँओं से ली थीं जिनके बेटे सीमा पर शहीद हुए थे, या उन बेटियों से जो अन्याय के खिलाफ खड़ी थीं।
वो 'प्राइम टाइम' के एंकर थे —
हम 'ग्राउंड रिपोर्ट' के सिपाही।
वो खबरें बनाते थे —
हम खबरों के बीच जीते थे।
आज जब पत्रकारिता को 'प्रोफेशन' से 'प्रोडक्ट' बना दिया गया है, तब ये फर्क और ज़्यादा जरूरी हो गया है। पत्रकार होने का मतलब अब स्टूडियो में बैठकर शोर मचाना नहीं है, बल्कि बिना माइक के भी बोल पाना है।
हमने अपनी कलम को कभी 'बिकने' नहीं दिया —
इसलिए हम पत्रकार थे,
और वो सिर्फ नौकरी करने वाले।
यह लेख एक अपील है — युवा पत्रकारों से, मीडिया छात्रों से, और हर उस नागरिक से जो सच्चाई को जानने का अधिकार रखता है।
पत्रकारिता नौकरी नहीं, ज़िम्मेदारी है। अगर आप भी इसे जीना चाहते हैं, तो सच के साथ खड़े होइए — भले ही अकेले क्यों न खड़े होना पड़े।
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