Monday, June 9, 2025

"हरामी की कोई जात नहीं होती – चरित्र की पहचान जाति से नहीं होती"

"हरामी की कोई जात नहीं होती – चरित्र की पहचान जाति से नहीं होती"

भारत एक ऐसा देश है जहाँ सदियों से जाति व्यवस्था सामाजिक संरचना का हिस्सा रही है। लेकिन जब हम किसी के नैतिक पतन, अपराध या दुष्कर्म की बात करते हैं, तो यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि "हरामी की कोई जात नहीं होती।" यह एक कठोर, लेकिन कटु सत्य है कि किसी के कर्म को उसकी जाति, धर्म, संप्रदाय या जन्म से नहीं जोड़ा जाना चाहिए।


🔹 हरामी कौन है?

हरामी शब्द का प्रयोग आमतौर पर उस व्यक्ति के लिए होता है जो धोखा देता है, विश्वासघात करता है, या जो समाज के नैतिक मूल्यों को ठुकराकर अपने स्वार्थ के लिए गलत रास्ता अपनाता है। यह व्यक्ति किसी भी रूप में हो सकता है — नेता, अफसर, दुकानदार, शिक्षक, धार्मिक गुरु या आम आदमी। उसका असली परिचय उसकी जात नहीं, उसके कर्म होते हैं।


🔹 जाति नहीं, चरित्र जिम्मेदार है

हर समाज में अच्छाई और बुराई दोनों के उदाहरण मिलते हैं। कोई ब्राह्मण होकर भी बलात्कारी हो सकता है, और कोई दलित होकर भी संत। कोई ठाकुर होकर भी भ्रष्टाचारी हो सकता है और कोई मुस्लिम होकर भी ईमानदारी की मिसाल। इसलिए जब कोई गलत काम करता है, तो उसका धर्म या जाति नहीं, उसका चरित्र उसे दोषी बनाता है।


🔹 जातिगत घृणा को बढ़ावा देने का माध्यम न बनें

जब किसी अपराधी या दुष्कर्मी की पहचान को उसकी जाति या धर्म से जोड़ा जाता है, तो यह समाज में नफरत की एक नयी दीवार खड़ी करता है। इससे असली मुद्दा — अपराध — पीछे छूट जाता है, और लोगों का ध्यान जाति आधारित घृणा की ओर चला जाता है। यह बेहद खतरनाक प्रवृत्ति है, जो देश की एकता और सामाजिक समरसता को तोड़ सकती है।


🔹 हरामीपन का कोई जातीय प्रमाणपत्र नहीं होता

जो लड़की की इज्जत लूटे, जो गरीब की ज़मीन हड़पे, जो रिश्वत लेकर सिस्टम को खोखला करे, जो बच्चों का हक खा जाए — वह हरामी है, चाहे वो किसी भी जाति, धर्म या इलाके से क्यों न हो। समाज को ऐसे लोगों को पहचानना होगा और उनके खिलाफ आवाज उठानी होगी — बिना किसी जातिगत पूर्वग्रह के।


🔹 समाज को चाहिए नई दृष्टि

हमें चाहिए कि हम अपने बच्चों को सिखाएं कि अच्छाई-बुराई इंसान के कर्मों में होती है, जन्म में नहीं। इंसानियत की असली कसौटी उसका विवेक, सहानुभूति और न्याय के प्रति उसका नजरिया होता है, न कि उसकी जाति या वंशावली।


🔚 निष्कर्ष

"हरामी की कोई जात नहीं होती" — यह केवल एक कहावत नहीं, बल्कि आज के समाज के लिए एक चेतावनी है। अगर हम अपने आसपास हो रही बुराइयों को जाति की चश्मे से देखेंगे, तो हम न तो अपराध को समझ पाएंगे, न ही उसका समाधान कर पाएंगे। बुराई को जातियों में मत बाँटो — हरामी को सिर्फ हरामी समझो, और इंसान को इंसान।


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