Sunday, June 15, 2025

गढ़वाली नाटक: "भोर च अनपढ़"



🎭 गढ़वाली नाटक: "भोर च अनपढ़"

विषय: साक्षरता, आत्मसम्मान और ग्रामीण महिला जागरूकता


संक्षिप्त कथानक (Plot Summary):

गढ़वाल के एक छोटे से गांव मलयालगांव में रहने वाली भोरू – एक मेहनती लेकिन अनपढ़ महिला है। वह दूसरों के दस्तखत करवाती है, बच्चों की फीस जमा करवाती है, लेकिन खुद कभी स्कूल नहीं गई। जब उसकी बेटी कहती है "तू तो अनपढ़ हौ", तब उसे एक ठेस लगती है।

भोरू 40 साल की उम्र में साक्षरता अभियान से जुड़ती है और धीरे-धीरे पढ़ना-लिखना सीखती है। उसका ये सफर गांव की कई महिलाओं के लिए प्रेरणा बन जाता है।


मुख्य पात्र (Characters):

  1. भोरू – नायिका, अनपढ़ महिला
  2. जुनेदी – उसकी बेटी, स्कूल जाती है
  3. गगनु – उसका पति, मजदूरी करता है
  4. टीचर नीमा – गांव में आई शिक्षिका
  5. संगीता – गांव की दूसरी महिला जो पढ़ना चाहती है
  6. प्रधान चाचा – गांव के प्रधान
  7. नाटक के अंत में भोरू का भाषण

मुख्य दृश्य (Key Scenes):

दृश्य 1:
भोरू खेत में काम करती है, बेटी स्कूल जाती है। बेटी की किताब देखती है और कहती है – "काश म्यर हाथ भी पढ़ण मा लाग जानदा।"

दृश्य 2:
भोरू को राशन कार्ड में अंगूठा लगाना पड़ता है – उसे शर्म आती है।

दृश्य 3:
गांव में अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस पर शिक्षिका नीमा बोलती हैं – "उमर कु नई, इछा कु पढ़ाई चाहिं।"

दृश्य 4:
भोरू, संगीता और कुछ और महिलाएं रात को चुपचाप पढ़ने जाती हैं।

दृश्य 5:
भोरू खुद अपनी बेटी की फीस का फॉर्म भरती है – अब वह पढ़ी-लिखी है।

दृश्य 6 (अंतिम):
भोरू मंच से बोलती है –

“आज म्यर नाम म्यर हाथ से लिखी ग्ये। अब म्यर आत्मा भी पढ़ी-लिखी लगण लगी।”


मुख्य संदेश:

  • पढ़ाई की कोई उम्र नहीं होती
  • आत्मसम्मान केवल पैसे या दिखावे से नहीं, ज्ञान से आता है
  • महिलाएं जब पढ़ती हैं, पूरा समाज जागता है


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