---
विषय: राजनेता द्वारा मानव जाति को दो वर्गों — उपकरण और दुश्मन — में बाँट देने की प्रवृत्ति
अवधि: लगभग 15–20 मिनट
कलाकार: 5–6 पात्र
शैली: प्रतीकात्मक, व्यंग्यात्मक, यथार्थवादी
---
🎬 पात्र परिचय:
1. राजनेता – सत्ता का प्रतीक, आत्ममुग्ध और चालाक
2. सचिव – सलाहकार, कभी ईमानदार, कभी डरपोक
3. जनता – दो भागों में विभाजित (उपकरण और दुश्मन)
4. पत्रकार/कवि – सच का आईना
5. आवाज़/सूत्रधार – पृष्ठभूमि व कथ्य को आगे बढ़ाता है
---
🎭 दृश्य 1: सत्ता का मंच
(मंच पर सिंहासन रखा है। रोशनी धीमी है। सूत्रधार की आवाज़ आती है:)
सूत्रधार:
"यह वह मंच है जहाँ कभी लोकतंत्र बैठता था... अब वहाँ राजनीति का चेहरा बैठा है। देखिए, कैसे वह इंसानों को औजार और बाधा समझता है।"
(राजनेता मंच पर आता है, भारी वस्त्रों में। सचिव उसके पीछे। जनता दो ओर खड़ी है — बाईं ओर ‘उपकरण’, दाईं ओर ‘दुश्मन’।)
राजनेता:
"मैं जनता से प्रेम करता हूँ... बशर्ते वह मेरी बात माने!
जो मेरी जय-जयकार करे — वह मेरा साथी।
जो मेरे झूठ में भी सच देखे — वह मेरा औज़ार।
बाकी सब? देशद्रोही!"
(जनता खामोश है। ‘उपकरण’ समूह तालियाँ बजाता है, ‘दुश्मन’ चुप खड़ा रहता है।)
---
🎭 दृश्य 2: संवाद और भ्रम
(पत्रकार मंच पर आता है, अपने हाथ में एक कलम और काग़ज़ लेकर)
पत्रकार:
"महाराज, क्या मैं सवाल कर सकता हूँ?"
राजनेता:
"तुम्हारा सवाल मेरे लिए हथियार बनता है या ज़हर?
अगर मेरी तस्वीर चमकाए तो पूछो, वरना जेल भेज दूँगा!"
पत्रकार:
"तो क्या सच बोलना अब देशद्रोह है?"
राजनेता: (हँसता है)
"सच? यहाँ सच वही होता है जो प्रचार करता है!"
---
🎭 दृश्य 3: जनता की आत्मा बोलती है
(‘दुश्मन’ की ओर खड़ी जनता का एक प्रतिनिधि आगे आता है)
जनता प्रतिनिधि:
"हम तुम्हारे दुश्मन नहीं हैं,
हम वो आईना हैं जिससे तुम डरते हो।
हम वो आवाज़ हैं जिसे तुम दबाना चाहते हो।
हम इंसान हैं, औजार नहीं!"
राजनेता (गुस्से में):
"सत्ता चलाने के लिए तर्क नहीं, समर्थन चाहिए।
तुम्हें या तो मेरे साथ रहना होगा... या मेरे खिलाफ!"
---
🎭 दृश्य 4: आईना टूटता है या जगता है?
(कवि मंच पर आता है, भावुक होकर बोलता है):
कवि:
"जब राजनेता इंसानों को वस्तु समझे,
जब सवाल देशद्रोह लगे,
जब समर्थन बिक जाए,
तब लोकतंत्र मर नहीं जाता —
वह जनता के हृदय में छुप जाता है।"
---
🎭 अंतिम दृश्य: आवाज़ें उठती हैं
(दोनों जनता पक्ष एक साथ मंच पर आ जाते हैं, एक साथ बोलते हैं):
जनता (समवेत स्वर में):
"हम औजार नहीं हैं।
हम दुश्मन नहीं हैं।
हम नागरिक हैं — जागरूक, ज़िंदा, ज़िम्मेदार।"
(राजनेता अकेला रह जाता है। प्रकाश धीमा होता है।)
सूत्रधार (अंतिम पंक्तियाँ):
"राजनीति तब सुंदर होती है जब वह सेवा बनती है।
लेकिन जब वह सत्ता बन जाए — तो आईना ज़रूर दिखाइए।"
---
🎭 मंच सज्जा व निर्देश:
राजनेता के वस्त्र – भारी, सोने जैसे रंग में, प्रतीकात्मक
जनता के वस्त्र – सामान्य लेकिन रंगों से वर्ग विभाजन (उपकरण: सफेद/पीला, दुश्मन: काला/ग्रे)
प्रकाश प्रभाव – शुरुआत में तिरछी रोशनी, अंत में मंच पर समान प्रकाश
पृष्ठभूमि संगीत – हल्की पृष्ठभूमि ध्वनि, अंत में जन-आंदोलन की आवाज़
---
📝 संदेश:
यह नाटक सिर्फ एक नेता की नहीं, हर सत्ता की प्रवृत्ति की आलोचना है — जो समाज को दो भागों में बाँटती है: जो उसके साथ हैं, और जो उसके खिलाफ गिने जाते हैं। लेकिन असल लोकतंत्र वह है जहाँ सवाल पूछना गुनाह नहीं, अधिकार होता है।
No comments:
Post a Comment