Friday, June 6, 2025

"बाहरी संतरे बनाम पहाड़ी नारंगियां: पहाड़ का स्वाद और स्वाभिमान"


जब बाजार में फलों की बात होती है, तो संतरा और नारंगी जैसी चीज़ें सिर्फ स्वाद या रंग तक सीमित नहीं होतीं—वे संस्कृति, पहचान और आत्मनिर्भरता का भी प्रतीक बन जाती हैं। पहाड़ में जब बाहरी संतरे आते हैं, तो वे अपनी चमक-दमक, बड़े आकार और व्यापारी नेटवर्क के कारण आसानी से दुकानों पर छा जाते हैं। लेकिन वहीं पहाड़ी नारंगियां—छोटे आकार की, खट्टी-मीठी और औषधीय गुणों से भरपूर—कहीं कोने में दम तोड़ती नज़र आती हैं।

अब सवाल उठता है: बाजार भाव किसका ज्यादा होना चाहिए?
इसका उत्तर भाव में नहीं, "भावना" में छिपा है।


स्वाद का मूल्य या ब्रांड की चमक?

  • बाहरी संतरे: बड़े पैमाने पर खेती, प्रचार, पैकेजिंग और शहरों से आने वाली मांग का साथ लिए हुए होते हैं। ग्राहक को बड़ा, चमकदार और दिखावटी फल जल्दी आकर्षित करता है।
  • पहाड़ी नारंगियां: स्वाद में तीव्र, मौसम के अनुसार सीमित, और पारंपरिक तौर पर स्थानीय जलवायु में पली-बढ़ी। औषधीय गुण जैसे कि पाचन में सहायक, बुखार व जुकाम में राहत देने वाली, इन्हें खास बनाते हैं।

पहाड़ के लिए असली मूल्य क्या है?

  • अगर पहाड़ बाजार के आधार पर निर्णय लेगा, तो वह बाहरी संतरे को प्राथमिकता देगा।
  • लेकिन अगर पहाड़ पारिस्थितिकी, संस्कृति और स्थानीय आर्थिकी के हिसाब से सोचता है, तो पहाड़ी नारंगी की कीमत अनमोल हो जाती है।

लोगों की तुलना में सोचें

  • जैसे हम अपने बेटों को विदेश पढ़ाने भेजते हैं और वहां की संस्कृति सीखने को उत्साहित होते हैं, वैसे ही जब बाहरी फल आते हैं, तो हम उन्हीं पर भरोसा कर लेते हैं।
  • पर अपनी बेटियों की शिक्षा, अपने गांव की मिट्टी, और अपने फल की मिठास को अगर हम नहीं पहचानेंगे, तो कौन पहचानेगा?

बाजार का पुनर्मूल्यांकन ज़रूरी है

अगर सिर्फ दाम से फल की कीमत तय होनी है, तो पहाड़ी नारंगियां हमेशा पीछे रहेंगी। लेकिन अगर हम स्थानीय स्वाद, स्वास्थ्य लाभ, जैव विविधता और आत्मनिर्भरता को भी मूल्य में जोड़ें, तो पहाड़ी नारंगी का बाजार भाव कहीं ऊपर चला जाता है।


निष्कर्ष: फैसला पहाड़ को करना है

बाहरी संतरे आएंगे, जाएंगे, और उनके साथ पैकेजिंग और मुनाफा भी। लेकिन पहाड़ी नारंगियां—जो हमारे खेतों, हमारी यादों और हमारी मातृभूमि की पहचान हैं—अगर आज हमने उन्हें अनदेखा किया, तो कल उनके अस्तित्व के लिए भी तरसेंगे।

इसलिए बाजार नहीं, अब पहाड़ को तय करना है कि उसकी असली मिठास और पहचान किसमें है।



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