Sunday, August 24, 2025

An ADR (Association for Democratic Reforms) analysis of 500 MPs and MLAs who switched parties and re-contested elections between 2014 and 2021

It’s difficult to pinpoint the exact current number of sitting Members of Parliament (MPs) in the BJP who were previously elected as MPs from the Congress or any other parties—because elected affiliations change, and there’s no centralized, continuously updated breakdown of that dynamic.



Broader Trends (2014–2021)

  • An ADR (Association for Democratic Reforms) analysis of 500 MPs and MLAs who switched parties and re-contested elections between 2014 and 2021 found that:

    • 177 Congress MLAs/MPs left the party.
    • 253 total candidates—including both MPs and MLAs—from various parties joined the BJP.
    • Of those re-contesting legislators, 173 MPs/MLAs who joined BJP were counted in that fold.
  • Another ADR report states that 35% of MLAs/MPs who switched parties during that period joined BJP—and most of these defectors came from the Congress.


Estimates from 2016–2020

  • Between 2016 and 2020, among 405 MLAs/MPs who defected and re-contested elections:

    • 182 (44.9%) joined the BJP.
    • A significant share of defectors—from Congress—were part of that group.
  • Specifically, out of the 12 Lok Sabha MPs who defected in that span, about five moved, and in the Rajya Sabha, seven were Congress defectors toward BJP.


Recent Notable Individual MP Defections (Post-2021)

  • Kiran Choudhry: Former Congress MLA in Haryana, she and her daughter joined BJP in mid-2024. She became a Rajya Sabha MP for BJP in August 2024.

  • Raju Parmar: Former Rajya Sabha MP from Gujarat under Congress, joined BJP in August 2022.

  • Pradan Baruah: Originally Congress, defected to BJP before winning the Lakhimpur Lok Sabha seat in 2016.

  • Subhash Maharia: Former Congress MP, rejoined BJP in 2023 (after an earlier BJP stint).


Summary Table

Time Period Approx. No. of Congress-origin MPs/MLAs who joined BJP (and re-contested)
2014–2021 ~173 defectors counted (MPs + MLAs)
2016–2020 ~182 defectors among MLAs/MPs
Recent MPs (post-2021) At least 4 notable individuals (Choudhry, Parmar, Baruah, Maharia)

Important Caveats

  • Defections vs current affiliation: The data above reflects those who switched parties and re-contested elections—not necessarily only MPs; some are MLAs. It doesn’t tell us who continues to serve as an MP today.

  • Constant updates: Parliament has witnessed resignations, by-elections, and new defections even after 2021. So, the current total number of active MPs in BJP who originally came from Congress or others is continually evolving.


Final Take

While there is no single, up-to-date figure available, you have:

  1. Historical data: 170–180+ MLAs/MPs defected from Congress to BJP between 2014 and 2021.
  2. Registered cases (2022 onwards): At least 4 prominent MPs moved from Congress to BJP.

Keep in mind, only some among those defectors continued as MPs. The rest may be MLAs or candidates who contested under BJP. For an updated tally of currently sitting MPs who were elected as Congress members previously, each individual would need to be verified via Parliament records or official election affidavits.



1) PPT (प्रस्तुति) की रूपरेखा – "पुलिस व्यवस्था, उनका व्यवहार और आम जनता के अधिकार"



1) PPT (प्रस्तुति) की रूपरेखा – "पुलिस व्यवस्था, उनका व्यवहार और आम जनता के अधिकार"

स्लाइड्स:

  1. शीर्षक स्लाइड: विषय का नाम, प्रस्तुतकर्ता का नाम
  2. प्रस्तावना: पुलिस का महत्व और जनता से जुड़ाव
  3. पुलिस व्यवस्था की संरचना: डीजीपी से लेकर कांस्टेबल तक का ढाँचा
  4. पुलिस के मुख्य कार्य: कानून-व्यवस्था, अपराध नियंत्रण, आपदा प्रबंधन
  5. पुलिस के व्यवहार की चुनौतियाँ: भ्रष्टाचार, काम का बोझ, असंवेदनशीलता
  6. जनता के अधिकार: CrPC, संविधान और अन्य कानूनी प्रावधान
  7. महिलाओं और बच्चों के विशेष अधिकार: सुरक्षा और विशेष प्रावधान
  8. जनता-पुलिस संबंध सुधारने के उपाय: संवेदनशीलता, पारदर्शिता, जवाबदेही
  9. महत्वपूर्ण हेल्पलाइन नंबर: 100, 1090, 181, 112 आदि
  10. निष्कर्ष: विश्वास और सहयोग का महत्व

2) नाटक/संवाद का खाका (Drama Script Idea)

पात्र:

  • एक पुलिसकर्मी
  • एक आम नागरिक (जिसका चोरी का केस है)
  • एक वकील
  • एक महिला कार्यकर्ता

संवाद उदाहरण:

  • नागरिक: "सर, मेरी शिकायत दर्ज क्यों नहीं हो रही?"
  • पुलिस: "हम व्यस्त हैं, बाद में आना।"
  • वकील: "सर, CrPC 154 के तहत FIR दर्ज करना आपका कर्तव्य है।"
  • महिला कार्यकर्ता: "और महिलाओं की सुरक्षा के लिए धारा 46 का पालन होना चाहिए।"
  • अंत में पुलिस का रवैया बदलता है, और FIR दर्ज होती है।

3) अधिकार पुस्तिका (PDF Booklet)

  • अध्याय 1: पुलिस के बारे में बुनियादी जानकारी
  • अध्याय 2: गिरफ्तारी और FIR से जुड़े अधिकार
  • अध्याय 3: महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों के विशेष अधिकार
  • अध्याय 4: शिकायत और हेल्पलाइन नंबर
  • अध्याय 5: पुलिस के दायित्व और जनता का सहयोग


पुलिस व्यवस्था, उनका व्यवहार और आम जनता के अधिकार – विस्तृत विश्लेषण

पुलिस व्यवस्था, उनका व्यवहार और आम जनता के अधिकार – विस्तृत विश्लेषण


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1. प्रस्तावना

पुलिस किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण अंग है। इसका मुख्य उद्देश्य कानून-व्यवस्था बनाए रखना, अपराध की रोकथाम और जनता की सुरक्षा करना है। लेकिन पुलिस और आम जनता के बीच का रिश्ता कई बार अविश्वास, डर और गलतफहमियों से प्रभावित रहता है। इस विषय को समझने के लिए हमें पुलिस व्यवस्था, उनके व्यवहार और जनता के अधिकारों का संतुलित अध्ययन करना होगा।


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2. पुलिस व्यवस्था – संरचना और कार्य

संरचना:

भारत में पुलिस राज्य का विषय है; प्रत्येक राज्य का अपना पुलिस बल होता है।

प्रमुख पद:

डीजीपी (Director General of Police)

आईजी, डीआईजी, एसपी, डीएसपी

इंस्पेक्टर, सब-इंस्पेक्टर, कांस्टेबल



मुख्य कार्य:

1. कानून-व्यवस्था बनाए रखना


2. अपराध की रोकथाम और जांच


3. यातायात प्रबंधन


4. आपदा के समय राहत कार्य


5. वीआईपी सुरक्षा और शांति व्यवस्था





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3. पुलिस का व्यवहार – चुनौतियाँ और समस्याएँ

अक्सर जनता का पुलिस से अनुभव नकारात्मक होता है, जिसके कारण पुलिस की छवि प्रभावित होती है। इसके मुख्य कारण:

1. अत्यधिक काम का बोझ और संसाधनों की कमी – स्टाफ कम और काम अधिक।


2. राजनीतिक दबाव और भ्रष्टाचार – पुलिस का दुरुपयोग।


3. जनता के प्रति असंवेदनशीलता – कई बार भाषा और रवैया कठोर।


4. जवाबदेही का अभाव – शिकायतों के समाधान में देरी।


5. अधिकारों की जानकारी का अभाव – आम नागरिक अपने अधिकार नहीं जानते।




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4. आम जनता के पुलिस से संबंधित अधिकार (भारतीय कानून के अंतर्गत)

भारत में संविधान और कानून नागरिकों को पुलिस के खिलाफ कई अधिकार प्रदान करते हैं:

(क) गिरफ्तारी से संबंधित अधिकार

धारा 50 CrPC: गिरफ्तारी पर कारण बताना अनिवार्य।

धारा 41 CrPC: बिना वारंट गिरफ्तारी केवल विशेष परिस्थितियों में।

धारा 46 CrPC: महिलाओं को सूर्यास्त के बाद और सूर्योदय से पहले गिरफ्तार नहीं किया जा सकता (विशेष अनुमति को छोड़कर)।

धारा 57 CrPC: 24 घंटे से अधिक हिरासत में नहीं रखा जा सकता; अदालत में पेश करना जरूरी।


(ख) अन्य अधिकार

चुप रहने का अधिकार (Article 20(3)) – स्वयं के खिलाफ बयान देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।

कानूनी सहायता का अधिकार (Article 22) – वकील से मिलने का अधिकार।

FIR दर्ज कराने का अधिकार (धारा 154 CrPC) – पुलिस मना नहीं कर सकती; न लेने पर उच्च अधिकारियों या न्यायालय से संपर्क।

महिलाओं की सुरक्षा के विशेष प्रावधान: महिला पुलिसकर्मी की उपस्थिति में ही पूछताछ।



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5. पुलिस-जनता संबंध सुधारने के उपाय

1. संवेदनशीलता और व्यवहार प्रशिक्षण: पुलिस को सामुदायिक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।


2. तकनीक और पारदर्शिता: सीसीटीवी, बॉडी कैमरे, ऑनलाइन शिकायत पोर्टल।


3. जवाबदेही: पुलिस शिकायत प्राधिकरण (Police Complaint Authority) की मजबूती।


4. जन-जागरूकता: लोगों को उनके अधिकार और कानून की जानकारी देना।


5. पुलिस का लोकतांत्रिकरण: राजनीतिक हस्तक्षेप कम करना।




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6. निष्कर्ष

पुलिस का उद्देश्य जनता की सेवा और सुरक्षा है। अगर पुलिस का व्यवहार सहयोगी और संवेदनशील हो तथा जनता अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो, तो पुलिस-जनता संबंध मजबूत होंगे और लोकतंत्र की नींव और सुदृढ़ होगी।


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“वर्ण व्यवस्था से जाति व्यवस्था की ओर: एक ऐतिहासिक और सामाजिक विश्लेषण”



I. शीर्षक (Title)

“वर्ण व्यवस्था से जाति व्यवस्था की ओर: एक ऐतिहासिक और सामाजिक विश्लेषण”


II. प्रस्तावना (Introduction)

  • भारतीय समाज का प्राचीन इतिहास और विविधता।
  • वर्ण व्यवस्था का उद्देश्य: कर्म और गुण आधारित सामाजिक संरचना।
  • विषय की प्रासंगिकता: क्यों यह आज भी महत्वपूर्ण है।

III. वर्ण व्यवस्था का मूल स्वरूप

  1. ऋग्वैदिक समाज में चार वर्ण – ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र।
  2. आधार: कर्म, गुण और क्षमता।
  3. विशेषताएँ:
    • सामाजिक गतिशीलता (ऊपर-नीचे जाने की संभावना)
    • वर्ण बदलने के उदाहरण – ऋषि विश्वामित्र, परशुराम आदि।
  4. उद्देश्य: समाज में श्रम-विभाजन और संतुलन।

IV. जाति व्यवस्था में परिवर्तन के कारण

  1. धार्मिक रूढ़िवादिता और मनुस्मृति जैसी ग्रंथों की व्याख्या।
  2. जन्म आधारित वर्ण निर्धारण।
  3. भूमि और संसाधनों पर वर्चस्व बनाए रखने की प्रवृत्ति।
  4. शिक्षा पर नियंत्रण और शूद्रों का बहिष्कार।
  5. विदेशी आक्रमण और सामाजिक असुरक्षा।
  6. व्यावसायिक विशेषीकरण और जातीय उपविभाजन।

V. जाति व्यवस्था की विशेषताएँ

  • जन्म आधारित कठोर व्यवस्था।
  • छुआछूत और अस्पृश्यता।
  • विवाह, भोजन और सामाजिक संपर्क पर प्रतिबंध।
  • हजारों जाति और उपजातियों का निर्माण।

VI. जाति व्यवस्था के दुष्परिणाम

  1. सामाजिक असमानता और शोषण।
  2. शूद्र और अस्पृश्यों पर अत्याचार।
  3. समाज में विभाजन और कमजोरी।
  4. विद्रोह और सुधार आंदोलनों की आवश्यकता।

VII. सुधार और आधुनिक दृष्टिकोण

  • बुद्ध, कबीर, गुरु नानक, ज्योतिबा फुले, डॉ. अंबेडकर का योगदान।
  • संविधान में जाति-भेद पर प्रतिबंध।
  • आरक्षण और सामाजिक सुधार आंदोलन।
  • वर्तमान चुनौतियाँ – राजनीति और मानसिकता में जाति का प्रभाव।

VIII. निष्कर्ष (Conclusion)

  • वर्ण व्यवस्था का उद्देश्य श्रम-विभाजन था, लेकिन यह जाति आधारित शोषण में बदल गया।
  • आधुनिक समाज में योग्यता और मानवता आधारित व्यवस्था की आवश्यकता।
  • “जाति का उन्मूलन ही सच्चे लोकतंत्र का आधार है।”

PPT (प्रस्तुति) के लिए स्लाइड सुझाव:

  1. Slide 1: शीर्षक + उपशीर्षक (लेखक/संस्थान का नाम)
  2. Slide 2: प्रस्तावना (विषय का महत्व)
  3. Slide 3: वर्ण व्यवस्था का परिचय
  4. Slide 4: वर्ण से जाति की ओर बदलाव के कारण
  5. Slide 5: जाति व्यवस्था की विशेषताएँ
  6. Slide 6: जाति व्यवस्था के दुष्परिणाम
  7. Slide 7: सुधार आंदोलन और आधुनिक दृष्टिकोण
  8. Slide 8: निष्कर्ष और सुझाव


वर्ण व्यवस्था से जाति व्यवस्था की ओर – एक विश्लेषण

वर्ण व्यवस्था से जाति व्यवस्था की ओर – एक विश्लेषण

भारतीय समाज का इतिहास अत्यंत प्राचीन और जटिल है। इसमें समय के साथ अनेक सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक परिवर्तन हुए। वर्ण व्यवस्था और जाति व्यवस्था इसी क्रम में विकसित हुई दो महत्वपूर्ण सामाजिक व्यवस्थाएँ हैं।


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1. वर्ण व्यवस्था का मूल स्वरूप

उत्पत्ति:
ऋग्वैदिक काल में समाज चार वर्णों में विभाजित था – ब्राह्मण (ज्ञान), क्षत्रिय (शक्ति/शासन), वैश्य (व्यापार), शूद्र (सेवा)।

लक्षण:

यह विभाजन मुख्यतः कर्म और गुण पर आधारित था, न कि जन्म पर।

व्यक्ति अपनी योग्यता के अनुसार किसी भी वर्ण का कार्य कर सकता था।

सामाजिक गतिशीलता मौजूद थी – जैसे ऋषि विश्वामित्र क्षत्रिय होकर भी ब्रह्मर्षि बने।

उद्देश्य था – समाज के कार्यों का संतुलन और दक्षता।




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2. जाति व्यवस्था की ओर संक्रमण

समय के साथ वर्ण व्यवस्था ने कठोर और वंशानुगत रूप ले लिया। इसके पीछे कई कारण थे:

1. धार्मिक ग्रंथों का रूढ़िवादी व्याख्यान: मनुस्मृति जैसे ग्रंथों ने वर्ण को जन्म से जोड़ना शुरू किया।


2. आर्थिक कारण: भूमि और संसाधनों पर अधिकार बनाए रखने के लिए ऊँचे वर्णों ने सामाजिक गतिशीलता को रोका।


3. शुद्ध-अशुद्ध की अवधारणा: कर्म को पवित्र और अपवित्र के आधार पर बाँटना शुरू हुआ।


4. शिक्षा पर नियंत्रण: ब्राह्मणों ने ज्ञान को अपने तक सीमित कर लिया, जिससे निम्न वर्ग के लिए उन्नति के रास्ते बंद हो गए।


5. विदेशी आक्रमण और सामाजिक असुरक्षा: समाज में स्थायित्व बनाए रखने के लिए जातियों का कठोर विभाजन हुआ।


6. व्यावसायिक विशेषीकरण: पेशा जन्म से निर्धारित होने लगा, जिससे जातियाँ उपजातियों में बँट गईं।




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3. जाति व्यवस्था की विशेषताएँ

जन्म-आधारित, कठोर और अनिवार्य।

सामाजिक गतिशीलता लगभग असंभव।

छुआछूत और भेदभाव का प्रचलन।

विवाह, भोजन और सामाजिक संपर्क पर कठोर नियम।

हजारों जातियों और उपजातियों का निर्माण।



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4. परिणाम

सामाजिक असमानता और अन्याय।

शूद्र और अस्पृश्यों का शोषण।

समाज में विभाजन और आंतरिक कमजोरी।

सुधार आंदोलनों की आवश्यकता – बुद्ध, कबीर, गुरु नानक, ज्योतिबा फुले, डॉ. अंबेडकर जैसे नेताओं ने जाति-विरोधी आंदोलन चलाए।



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5. आधुनिक परिप्रेक्ष्य

भारतीय संविधान ने जातिगत भेदभाव को गैरकानूनी घोषित किया।

शिक्षा, आरक्षण और सामाजिक आंदोलनों ने स्थिति में सुधार किया।

फिर भी जातिगत मानसिकता और राजनीति आज भी कई क्षेत्रों में मौजूद है।



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निष्कर्ष

वर्ण व्यवस्था का प्रारंभिक उद्देश्य समाज में कार्य-विभाजन था, लेकिन समय के साथ यह जन्म आधारित जाति व्यवस्था में बदल गई, जिसने असमानता और शोषण को जन्म दिया। आधुनिक भारत में आवश्यकता है कि हम कर्म और योग्यता आधारित समाज की ओर बढ़ें, जहाँ जाति या जन्म नहीं, बल्कि प्रतिभा और मानवता सर्वोच्च हो।

पतारसी–सुरागरसी : अपराध जांच की अहम प्रक्रिया

पतारसी–सुरागरसी : अपराध जांच की अहम प्रक्रिया

अपराध या संदिग्ध घटनाओं की जांच में “पतारसी” और “सुरागरसी” दो अत्यंत महत्वपूर्ण चरण हैं। ये दोनों शब्द पारंपरिक भारतीय पुलिस तंत्र की शब्दावली का हिस्सा हैं, जिनका उद्देश्य अपराधी तक पहुँचने, उसके बारे में जानकारी जुटाने और कानूनी रूप से उसे पकड़ने के लिए ठोस आधार तैयार करना होता है। नीचे इस विषय पर विस्तृत विवरण प्रस्तुत है:


1. पतारसी का अर्थ और महत्व

पतारसी का शाब्दिक अर्थ है “पता लगाना”।
यह वह प्रारंभिक प्रक्रिया है जिसमें अपराध होने के बाद अपराधी या संदिग्ध व्यक्ति का सुराग प्राप्त करने के लिए सूचनाएँ एकत्र की जाती हैं।

पतारसी में प्रमुख गतिविधियाँ:

  • घटनास्थल का निरीक्षण: घटना के स्थल पर मौजूद भौतिक प्रमाण (जैसे पैरों के निशान, वाहन के टायर, कपड़ों के टुकड़े, हथियार आदि) का विश्लेषण।
  • प्रत्यक्षदर्शियों के बयान: घटना के समय मौजूद लोगों से पूछताछ कर संदिग्ध का हुलिया, कपड़े, व्यवहार आदि की जानकारी लेना।
  • स्थानीय जानकारी: क्षेत्र में रहने वाले मुखबिरों, चौकीदारों, ग्राम प्रहरी या अन्य स्रोतों से अपराधी की गतिविधियों का पता करना।
  • तकनीकी साधनों का उपयोग: आज के समय में CCTV फुटेज, मोबाइल लोकेशन, इंटरनेट डाटा, कॉल रिकॉर्ड इत्यादि का अध्ययन भी पतारसी का हिस्सा है।
  • अपराध के पैटर्न का अध्ययन: क्या यह अपराध पहले से चल रही किसी श्रृंखला का हिस्सा है? पुराने अपराधियों से समानता है या नहीं?

पतारसी का उद्देश्य अपराधी की पहचान और उसके संभावित ठिकानों का पता लगाना होता है।


2. सुरागरसी का अर्थ और महत्व

सुरागरसी शब्द का अर्थ है “सुराग का पीछा करना”।
पतारसी के दौरान मिले सुरागों को आधार बनाकर अपराधी तक पहुँचना, उसे पकड़ने के लिए योजनाबद्ध रूप से उसका पीछा करना और आवश्यक प्रमाण जुटाना इसका मुख्य उद्देश्य होता है।

सुरागरसी में प्रमुख गतिविधियाँ:

  • अपराधी का पीछा: पतारसी से मिले सुराग के आधार पर अपराधी की आवाजाही, छिपने के स्थान, और संपर्क सूत्रों पर निगरानी रखना।
  • गुप्तचरी एवं मुखबिरी नेटवर्क: गुप्त रूप से मुखबिरों को सक्रिय कर अपराधी की गतिविधियों की जानकारी प्राप्त करना।
  • तकनीकी निगरानी: मोबाइल फोन ट्रैकिंग, इंटरनेट और सोशल मीडिया पर गतिविधियों की निगरानी।
  • अन्य जिलों/राज्यों में तलाश: यदि अपराधी क्षेत्र छोड़ देता है तो उसके संभावित गंतव्य तक पहुंचने के लिए अन्य पुलिस थानों से संपर्क।
  • अंतरराज्यीय अपराध की स्थिति: इंटर-स्टेट क्राइम में अन्य एजेंसियों के साथ तालमेल कर अपराधी तक पहुँचना।

सुरागरसी का उद्देश्य केवल अपराधी की गिरफ्तारी नहीं, बल्कि उसके खिलाफ ठोस और कानूनी प्रमाण इकट्ठा करना होता है ताकि अदालत में केस सिद्ध हो सके।


3. पतारसी और सुरागरसी का आपसी संबंध

  • पतारसी और सुरागरसी एक-दूसरे के पूरक हैं।
  • पतारसी के बिना सुरागरसी संभव नहीं, क्योंकि जब तक कोई सुराग न मिले, अपराधी का पीछा नहीं किया जा सकता।
  • सुरागरसी के दौरान भी नए सुराग मिलते हैं, जिससे जांच मजबूत होती है।

4. कानूनी और पुलिस प्रणाली में उपयोग

  • भारतीय दंड संहिता (IPC) और आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC) के तहत पुलिस को अपराध की जांच और अपराधियों की खोज का अधिकार है।
  • पतारसी और सुरागरसी के आधार पर ही पुलिस केस डायरी तैयार करती है, जो अदालत में प्रस्तुत होती है।
  • आजकल इन प्रक्रियाओं में फॉरेंसिक साइंस, साइबर सेल, डॉग स्क्वॉड, और डिजिटल ट्रैकिंग जैसे आधुनिक साधन भी जुड़ गए हैं।

5. चुनौतियाँ

  • अपराधियों का संगठित और तकनीकी रूप से सशक्त होना।
  • साक्ष्यों के नष्ट हो जाने की संभावना।
  • गवाहों का सहयोग न करना या डरना।
  • सीमित संसाधन और तकनीकी कमियों के कारण देरी।

6. निष्कर्ष

पतारसी–सुरागरसी पुलिस की जांच प्रणाली की रीढ़ हैं। इनके माध्यम से अपराधी की पहचान से लेकर गिरफ्तारी और केस को अदालत में सिद्ध करने तक की पूरी प्रक्रिया चलती है। आधुनिक तकनीक के साथ इनके महत्व और भी बढ़ गया है।
यदि यह प्रक्रिया ईमानदारी, निष्पक्षता और वैज्ञानिक तरीके से की जाए तो अपराध की रोकथाम और न्याय प्रणाली पर लोगों का विश्वास मजबूत हो सकता है।



उत्तराखंड में ‘गोरख-धंधा’ शब्द पर लगेगा बैन? नाथ समाज की अपील पर सरकार विचार कर रही

उत्तराखंड में ‘गोरख-धंधा’ शब्द पर लगेगा बैन? नाथ समाज की अपील पर सरकार विचार कर रही

देहरादून: नाथ संप्रदाय की भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाले शब्द ‘गोरख-धंधा’ के इस्तेमाल पर उत्तराखंड में भी प्रतिबंध लगाने की तैयारी शुरू हो गई है। हरियाणा, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की तर्ज पर अब उत्तराखंड सरकार भी इस कदम को उठाने पर विचार कर रही है।

अखिल भारतीय नाथ समाज ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को पत्र लिखकर मांग की है कि मीडिया रिपोर्ट्स, अखबारों और पुलिस की आधिकारिक भाषा में इस शब्द के प्रयोग पर रोक लगाई जाए। नाथ समाज के राष्ट्रीय अध्यक्ष योगी राधेश्याम नाथ ने बताया कि केंद्र सरकार ने पहले ही 19 नवंबर 2018 को इस शब्द के प्रयोग पर प्रतिबंध लगाया था, जिसके बाद कई राज्यों ने आदेश जारी किए।

योगी राधेश्याम नाथ ने कहा, “गुरु गोरखनाथ हठयोग के प्रवर्तक हैं। ‘गोरख-धंधा’ शब्द का ऐतिहासिक अर्थ जटिल या कठिन योगिक साधनाओं से था, लेकिन समय के साथ इसका अर्थ बदलकर धोखाधड़ी और अवैध कामकाज के रूप में लिया जाने लगा, जो हमारे संत परंपरा का अपमान है।”

नाथ समाज का कहना है कि जब भी मीडिया या कोई व्यक्ति ‘गोरख-धंधा’ शब्द का प्रयोग अवैध गतिविधियों या ठगी के संदर्भ में करता है, तो यह नाथ संप्रदाय के अनुयायियों और संत परंपरा के लिए गहरी पीड़ा का कारण बनता है।

स्रोतों के अनुसार, उत्तराखंड सरकार इस प्रस्ताव पर सकारात्मक रुख अपनाए हुए है और जल्द ही अन्य राज्यों की तरह आधिकारिक आदेश जारी किया जा सकता है।

नाथ समाज ने एक और अहम मुद्दा उठाते हुए कहा कि देश में बौद्ध, जैन, सिख, इस्लाम और ईसाई धर्मों का पाठ्यक्रम में उल्लेख होता है, लेकिन नाथ धर्म, जिसे भगवान शिव द्वारा स्थापित सबसे प्राचीन संप्रदायों में माना जाता है, उसका कहीं जिक्र नहीं है। समाज का कहना है कि इससे उनकी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान धीरे-धीरे खत्म हो रही है।

अगर धामी सरकार इस पर प्रतिबंध लगाती है तो उत्तराखंड चौथा राज्य होगा, जहां ‘गोरख-धंधा’ शब्द के प्रयोग पर आधिकारिक रूप से बैन लगेगा।

न्यूज़ विचार और व्यव्हार

फिल्म या शॉर्ट फिल्म एआई की मदद से

 फिल्म या शॉर्ट फिल्म एआई की मदद से  1. विषय और कहानी तय करें सबसे पहले फिल्म का विषय, शैली (ड्रामा, थ्रिलर, डॉक्यूमेंट्री, साइंस फिक्शन आदि...