बढ़ते ‘गर्म दिन’: जलवायु संकट की दस्तक को समझने का समय
भारत का औसत तापमान पिछले सौ वर्षों की तुलना में लगभग 0.9 डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है। पहली नजर में यह वृद्धि मामूली लग सकती है, लेकिन वैज्ञानिक दृष्टि से यह एक बड़े परिवर्तन का संकेत है। इससे भी अधिक चिंता की बात यह है कि देश के अधिकांश हिस्सों में हर दशक 5 से 10 अतिरिक्त ‘गर्म दिन’ जुड़ रहे हैं। यह केवल मौसम का बदलाव नहीं, बल्कि हमारे विकास मॉडल, पर्यावरणीय नीतियों और प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ते दबाव का परिणाम है।
जलवायु परिवर्तन को लंबे समय तक भविष्य के संकट के रूप में देखा गया, लेकिन अब इसके प्रभाव वर्तमान में महसूस किए जा रहे हैं। देश के कई हिस्सों में भीषण गर्मी, अनियमित वर्षा, सूखा, बाढ़ और जंगलों में आग जैसी घटनाएं सामान्य होती जा रही हैं। तापमान में बढ़ोतरी का सबसे बड़ा असर उन लोगों पर पड़ता है जो खुले में काम करते हैं, जिनकी आजीविका खेती पर निर्भर है और जिनके पास जलवायु संबंधी आपदाओं से निपटने के सीमित साधन हैं।
भारत का तापमान वैश्विक औसत वृद्धि से भले कम हो, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि खतरा भी कम है। भारत की विशाल आबादी, कृषि आधारित अर्थव्यवस्था और सीमित प्राकृतिक संसाधन इसे जलवायु परिवर्तन के प्रति अत्यंत संवेदनशील बनाते हैं। बढ़ती गर्मी का सीधा प्रभाव फसल उत्पादन, जल उपलब्धता, श्रम उत्पादकता और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। आने वाले वर्षों में यह आर्थिक विकास की गति को भी प्रभावित कर सकता है।
हिमालयी राज्यों, विशेषकर उत्तराखंड, के लिए यह चेतावनी और गंभीर है। ग्लेशियरों का पिघलना, पारंपरिक जलस्रोतों का सूखना, जंगलों में आग की बढ़ती घटनाएं और अनियमित वर्षा पर्वतीय क्षेत्रों की पारिस्थितिकी को प्रभावित कर रही हैं। जिन पहाड़ों को कभी प्राकृतिक जल भंडार माना जाता था, वे आज जल संकट और पर्यावरणीय असंतुलन की चुनौतियों से जूझ रहे हैं।
विडंबना यह है कि विकास के नाम पर हम जिस मॉडल को अपनाए हुए हैं, उसमें पर्यावरणीय लागत को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। अनियोजित शहरीकरण, अंधाधुंध निर्माण, वन कटान और प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन ने जलवायु संकट को और गहरा किया है। यदि विकास का अर्थ केवल कंक्रीट के जंगल खड़े करना और प्राकृतिक संपदा का दोहन करना रह जाएगा, तो भविष्य की कीमत वर्तमान पीढ़ी ही नहीं बल्कि आने वाली पीढ़ियां भी चुकाएंगी।
अब आवश्यकता केवल जलवायु परिवर्तन पर चर्चा करने की नहीं, बल्कि उसे विकास नीति के केंद्र में रखने की है। ऊर्जा, परिवहन, कृषि, जल प्रबंधन और शहरी नियोजन से जुड़ी नीतियों में पर्यावरणीय संतुलन को प्राथमिकता देनी होगी। साथ ही स्थानीय समुदायों की भागीदारी और पारंपरिक ज्ञान को भी महत्व देना होगा।
बढ़ते ‘गर्म दिन’ केवल मौसम विज्ञान का आंकड़ा नहीं हैं। वे हमें चेतावनी दे रहे हैं कि प्रकृति के साथ असंतुलन की सीमा अब पार होती जा रही है। यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में यह संकट केवल तापमान का नहीं, बल्कि जीवन, आजीविका और अस्तित्व का प्रश्न बन सकता है।
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