Wednesday, September 17, 2025

भारत सरकार अधिनियम 1909, 1919 और 1935 की एक तुलनात्मक सारणी (Comparison Chart in Hindi)




📊 भारत सरकार अधिनियम: 1909, 1919 और 1935 की तुलना

पहलू / विशेषता अधिनियम 1909 (मॉर्ले-मिंटो सुधार) अधिनियम 1919 (मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार) अधिनियम 1935
मुख्य उद्देश्य भारतीयों को सीमित प्रतिनिधित्व देना प्रशासन में भारतीयों की भागीदारी बढ़ाना संघीय ढाँचा और प्रांतीय स्वायत्तता स्थापित करना
विधानमंडल - केंद्रीय विधान परिषद का विस्तार
- सदस्यों की संख्या बढ़ी - केंद्र में द्विसदनीय व्यवस्था
(काउंसिल ऑफ स्टेट + लेजिस्लेटिव असेंबली) - केंद्र में द्विसदनीय संघीय विधानमंडल
(राज्य परिषद + संघीय सभा)
भारतीय प्रतिनिधित्व - प्रांतीय परिषदों में चुने हुए सदस्य
- मुसलमानों के लिए अलग निर्वाचक मंडल (Separate Electorates) - प्रांतों में भारतीय मंत्रियों की भूमिका
- गवर्नर की सहायता हेतु उत्तरदायी सरकार - प्रांतीय स्वायत्तता (Cabinet प्रांतों में उत्तरदायी)
- गवर्नर-जनरल और गवर्नरों के पास विशेष शक्तियाँ
मताधिकार (Franchise) बहुत सीमित, केवल ज़मींदार/शिक्षित वर्ग थोड़ा बढ़ा, फिर भी सीमित लगभग 10% भारतीयों को वोट का अधिकार
विशेष प्रावधान - अलग निर्वाचन मंडल (मुस्लिमों के लिए)
- परिषदें सलाहकार मात्र - Dyarchy प्रांतों में लागू (शिक्षा, स्वास्थ्य भारतीयों को; रक्षा, वित्त ब्रिटिशों के पास) - Dyarchy केंद्र में लागू
- प्रांतों में पूर्ण स्वायत्तता
न्यायपालिका कोई नई व्यवस्था नहीं कोई बड़ा बदलाव नहीं संघीय न्यायालय (Federal Court) की स्थापना (1937)
प्रांतों की स्थिति ब्रिटिश अधिकारियों के नियंत्रण में कुछ हद तक जिम्मेदार शासन की ओर पूर्ण प्रांतीय स्वायत्तता + नए प्रांतों का गठन (सिंध, बिहार-उड़ीसा अलग, NWFP)
महत्व - भारतीय राजनीति में प्रवेश का पहला कदम
- साम्प्रदायिक आधार की शुरुआत - स्वशासन की ओर एक कदम
- भारतीय नेताओं में उम्मीदें जगीं - भारतीय प्रशासन की रीढ़
- स्वतंत्र भारत के संविधान की नींव

📌 संक्षेप में:

  • 1909 अधिनियम: केवल सीमित प्रतिनिधित्व और साम्प्रदायिक राजनीति की शुरुआत।
  • 1919 अधिनियम: जिम्मेदार शासन की ओर बढ़ता कदम, लेकिन "Dyarchy" से असंतोष।
  • 1935 अधिनियम: सबसे व्यापक, प्रांतीय स्वायत्तता और संघीय ढाँचे की आधारशिला।


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