| मुख्य उद्देश्य |
भारतीयों को सीमित प्रतिनिधित्व देना |
प्रशासन में भारतीयों की भागीदारी बढ़ाना |
संघीय ढाँचा और प्रांतीय स्वायत्तता स्थापित करना |
| विधानमंडल |
- केंद्रीय विधान परिषद का विस्तार |
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| - सदस्यों की संख्या बढ़ी |
- केंद्र में द्विसदनीय व्यवस्था |
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| (काउंसिल ऑफ स्टेट + लेजिस्लेटिव असेंबली) |
- केंद्र में द्विसदनीय संघीय विधानमंडल |
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| (राज्य परिषद + संघीय सभा) |
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| भारतीय प्रतिनिधित्व |
- प्रांतीय परिषदों में चुने हुए सदस्य |
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| - मुसलमानों के लिए अलग निर्वाचक मंडल (Separate Electorates) |
- प्रांतों में भारतीय मंत्रियों की भूमिका |
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| - गवर्नर की सहायता हेतु उत्तरदायी सरकार |
- प्रांतीय स्वायत्तता (Cabinet प्रांतों में उत्तरदायी) |
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| - गवर्नर-जनरल और गवर्नरों के पास विशेष शक्तियाँ |
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| मताधिकार (Franchise) |
बहुत सीमित, केवल ज़मींदार/शिक्षित वर्ग |
थोड़ा बढ़ा, फिर भी सीमित |
लगभग 10% भारतीयों को वोट का अधिकार |
| विशेष प्रावधान |
- अलग निर्वाचन मंडल (मुस्लिमों के लिए) |
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| - परिषदें सलाहकार मात्र |
- Dyarchy प्रांतों में लागू (शिक्षा, स्वास्थ्य भारतीयों को; रक्षा, वित्त ब्रिटिशों के पास) |
- Dyarchy केंद्र में लागू |
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| - प्रांतों में पूर्ण स्वायत्तता |
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| न्यायपालिका |
कोई नई व्यवस्था नहीं |
कोई बड़ा बदलाव नहीं |
संघीय न्यायालय (Federal Court) की स्थापना (1937) |
| प्रांतों की स्थिति |
ब्रिटिश अधिकारियों के नियंत्रण में |
कुछ हद तक जिम्मेदार शासन की ओर |
पूर्ण प्रांतीय स्वायत्तता + नए प्रांतों का गठन (सिंध, बिहार-उड़ीसा अलग, NWFP) |
| महत्व |
- भारतीय राजनीति में प्रवेश का पहला कदम |
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| - साम्प्रदायिक आधार की शुरुआत |
- स्वशासन की ओर एक कदम |
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| - भारतीय नेताओं में उम्मीदें जगीं |
- भारतीय प्रशासन की रीढ़ |
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| - स्वतंत्र भारत के संविधान की नींव |
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