✅ नेताओं की अधिकता और काम की कमी से समस्याएँ:
1. राजनीतिक स्वार्थ बढ़ेगा – एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ में असली जनहित पीछे रह जाता है।
2. भ्रष्टाचार और संसाधनों की बर्बादी – योजनाएँ बनती हैं पर क्रियान्वयन कम होता है, पैसा बीच में ही खपत।
3. जनता का भरोसा टूटता है – लोग निराश होकर राजनीति से दूरी बनाते हैं।
4. फूट और ध्रुवीकरण – नेता अपने-अपने गुट बनाकर समाज को बाँट सकते हैं।
5. काम की जगह दिखावा – घोषणाएँ होती हैं, पर धरातल पर बदलाव नहीं आता।
✅ “जनता का सोना बनना” क्यों तय है:
जनता को समस्याओं से जूझना पड़ता है — जैसे बेरोज़गारी, महँगाई, अधूरी योजनाएँ।
जनता खुद संगठित होकर समाधान ढूँढने लगती है, क्योंकि नेताओं से उम्मीद खत्म हो जाती है।
जनता में जागरूकता आती है — लोग सवाल पूछते हैं, विरोध करते हैं, आंदोलनों में शामिल होते हैं।
कभी-कभी जनता खुद नेता बन जाती है — स्थानीय स्तर पर संगठन, स्वयं सहायता समूह, आंदोलन आदि बनते हैं।
लेकिन…
अगर जनता जागरूक और संगठित हो तो वही स्थिति बदलाव का अवसर भी बन सकती है। इसलिए यह कहना सही होगा:
➡ नेताओं की अधिकता और काम की कमी जनता को सोना बना सकती है – या तो निराशा में, या संघर्ष में जागरूक होकर। फर्क इस बात से पड़ेगा कि जनता चुप रहती है या संगठित होकर बदलाव की पहल करती है।
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