Wednesday, September 17, 2025

उत्तराखंड के भूमिधारी कानून और नजूल भूमि

 


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1. नजूल भूमि (Nazul Land) क्या है?

परिभाषा: नजूल भूमि वह भूमि होती है जो सरकारी/राज्य की भूमि है और जिसे सरकार ने किसानों या आम जनता को सीमित अवधि या विशेष शर्तों पर आवंटित किया है।

इसका मूल उद्देश्य होता है: किसानों को कृषि योग्य भूमि उपलब्ध कराना और भूमि का गैरकानूनी कब्जा रोकना।

नजूल भूमि पर स्थायी मालिकाना हक नहीं होता, केवल किरायेदारी या अस्थायी हक होता है।



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2. उत्तराखंड में नजूल भूमि की स्थिति

उत्तराखंड (पूर्व में उत्तरांचल, और उससे पहले उत्तर प्रदेश के तहत) में नजूल भूमि का इतिहास ब्रिटिश काल और उत्तर प्रदेश राज्य भूमि नीति से जुड़ा है।

विशेषकर तराई और भाभर क्षेत्र (जैसे कोटद्वार) में ब्रिटिश काल में कई नजूल/सरकारी बस्तियाँ बनाई गईं ताकि किसानों को खेती के लिए जमीन मिल सके और जंगल/राजस्व भूमि पर कब्जा न हो।

कोटद्वार और आसपास की तराई-भाभर भूमि में कई बार नजूल भूमि + राजस्व भूमि का मिश्रण मिलता है।



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3. भूमिधारी कानून के तहत

भूमिधारी कानून उत्तराखंड में लागू होने वाला वह कानून है जो जमींदारों और भूमिधारियों के अधिकार और कब्जों को विनियमित करता है।

अगर कोई भूमि भूमिधारी कानून के तहत आवंटित नहीं हुई और वह सरकारी नजूल/राजस्व भूमि है, तो वह नजूल भूमि के अंतर्गत आती है।

कोटद्वार में अधिकांश तराई-भाभर भूमि अब भी नजूल भूमि के अंतर्गत आती है, लेकिन कुछ हिस्से 1970–80 के बाद अवैध कब्जों या निजी खरीद-फरोख्त के कारण भूमि व्यवस्था में बदल गए हैं।



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✅ निष्कर्ष

कोटद्वार का तराई-भाभर क्षेत्र में अधिकांश सरकारी आवंटित कृषि भूमि और खुले क्षेत्र को “नजूल भूमि” कहा जा सकता है।

यदि भूमि किसी व्यक्ति या संस्था को स्थायी मालिकाना हक या पट्टा मिला है, तो वह नजूल भूमि नहीं रहती।

भूमि की वास्तविक स्थिति राजस्व अभिलेख और पट्टा/कब्जा रिकॉर्ड देखने के बाद ही तय होती है।




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