Saturday, September 20, 2025

प्रवचन : रिश्तों का गणित और शून्य का रहस्य



प्रवचन : रिश्तों का गणित और शून्य का रहस्य

भाइयों और बहनों,

अक्सर हम सब अपने जीवन में यह अनुभव करते हैं कि रिश्तों में बड़ा अजीब-सा गणित चलता है।
कभी हम कितना भी दे दें—अपना समय, अपना प्रेम, अपना समर्पण—फिर भी अंत में लगता है कि सब व्यर्थ हो गया, सब शून्य हो गया।

यह प्रश्न उठता है कि आखिर ऐसा क्यों होता है?
क्या सचमुच रिश्ते किसी गणित के हिसाब से चलते हैं?

भगवद्गीता हमें बताती है— “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन”
अर्थात हमारा अधिकार केवल कर्म करने पर है, फल पर नहीं।
जब हम रिश्तों में हिसाब रखने लगते हैं—कि मैंने इतना किया, बदले में मुझे क्या मिला—तो वहीं से असंतुलन शुरू हो जाता है।
रिश्ते तभी जीवित रहते हैं जब वे अपेक्षा नहीं, केवल कर्तव्य पर टिके हों।

बौद्ध दर्शन कहता है—सब कुछ क्षणभंगुर है।
हर वस्तु, हर संबंध, बदलता रहता है।
इसी को शून्यता कहा गया है।
जब हम इस सत्य को स्वीकार कर लेते हैं,
तो रिश्तों का टूटना, दूरी आना या शून्य हो जाना, हमें दुख नहीं देता—बल्कि हमें एक गहरी मुक्ति का अनुभव कराता है।

और वेदांत हमें बताता है कि यह शून्य वास्तव में शून्य नहीं, बल्कि पूर्णता है।
“पूर्णमदः पूर्णमिदं, पूर्णात् पूर्णमुदच्यते”
जिसे हम खोना समझते हैं, वह वास्तव में हमारे भीतर ही विद्यमान पूर्णता की ओर संकेत है।
रिश्तों का शून्य हमें यह सिखाता है कि हमारी असली संपन्नता बाहर से नहीं,
बल्कि भीतर से आती है।

तो भाइयों और बहनों,
रिश्तों का गणित हमें यही सिखाता है कि
👉 जोड़-घटाव से नहीं,
👉 अपेक्षा और प्रतिफल से नहीं,
बल्कि कर्तव्य, करुणा और आत्मिक पूर्णता से रिश्तों को समझना चाहिए।

याद रखिए,
शून्य अंत नहीं है,
बल्कि एक नई शुरुआत का बिंदु है।



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