डॉ. भीमराव अंबेडकर ने भारतीय रुपये और मौद्रिक नीति पर गहराई से काम किया था। इस विषय पर उनका सबसे प्रसिद्ध ग्रंथ है –
📘 “The Problem of the Rupee: Its Origin and Its Solution” (रुपये की समस्या: उत्पत्ति और समाधान)
यह 1923 में प्रकाशित हुआ था। यह उनका पीएच.डी. का शोध कार्य भी था (लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स और कोलंबिया यूनिवर्सिटी से जुड़ा हुआ)।
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भाषण और तर्क (मुख्य बिंदु)
डॉ. अंबेडकर ने कई जगह इस पर भाषण दिए, विशेषकर हिल्टन यंग कमीशन (1925–26) के सामने, जब भारतीय मुद्रा और केंद्रीय बैंक के गठन पर चर्चा हो रही थी। उनके विचारों ने सीधे तौर पर भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI, 1935) की स्थापना की नींव रखी।
उनके भाषण और पुस्तक के मुख्य अंश इस प्रकार थे:
1. रुपये की गिरती कीमत (Depreciation of Rupee)
अंबेडकर ने समझाया कि रुपये का मूल्य लगातार गिरता जा रहा है क्योंकि यह सिल्वर (चाँदी) स्टैंडर्ड पर आधारित था, जबकि दुनिया गोल्ड स्टैंडर्ड पर जा चुकी थी।
2. गोल्ड स्टैंडर्ड का समर्थन
उन्होंने कहा कि भारत को एक स्थिर गोल्ड स्टैंडर्ड अपनाना चाहिए ताकि रुपये का मूल्य अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थिर रह सके।
3. मुद्रास्फीति (Inflation) और जनता पर असर
रुपये की अस्थिरता से आम जनता, मजदूरों और किसानों पर सबसे ज्यादा बोझ पड़ता है। मुद्रा नीति का बोझ अमीर वर्ग नहीं बल्कि गरीब वर्ग उठाता है।
4. केंद्रीय बैंक की आवश्यकता
उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत को एक स्वतंत्र और सक्षम सेंट्रल बैंक चाहिए, जो मुद्रा आपूर्ति और मौद्रिक स्थिरता बनाए रखे।
👉 इसी तर्क से बाद में भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 बना।
5. वेतन और रुपया
उनके भाषण में यह भी था कि यदि रुपया अस्थिर रहेगा तो वेतन और मजदूरी कभी स्थिर नहीं रह पाएँगे। इससे आर्थिक असमानता बढ़ेगी।
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अंबेडकर का एक उद्धरण (हिंदी अनुवाद):
> “मुद्रा व्यवस्था का सबसे बड़ा उद्देश्य होना चाहिए – स्थिरता। बिना स्थिर रुपये के न तो मजदूर को न्याय मिल सकता है, न ही किसान को सुरक्षा।”
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