Saturday, September 20, 2025

गीता, बौद्ध दर्शन और वेदांत की रोशनी में “शून्य” और रिश्तों का गणित।



रिश्तों का गणित और शून्य का आध्यात्मिक रहस्य

रिश्ते, मानव जीवन का सबसे जटिल गणित हैं।
हम सोचते हैं कि यदि हम सब कुछ दे देंगे—
प्यार, विश्वास, त्याग, समर्पण—
तो सामने से भी वैसा ही उत्तर मिलेगा।
परंतु गीता हमें याद दिलाती है कि फल की आशा ही दुख का कारण है

गीता का संदेश

श्रीकृष्ण कहते हैं— “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन”
अर्थात हमें केवल कर्म पर अधिकार है,
फल पर नहीं।
रिश्तों का शून्य भी इसी सूत्र से समझा जा सकता है।
जब हम रिश्तों में केवल कर्म करते हैं—
बिना हिसाब, बिना अपेक्षा—
तभी वह सच्चे अर्थों में संतुलित होते हैं।

बौद्ध दृष्टिकोण

बौद्ध दर्शन में शून्यता (Śūnyatā) का बहुत गहरा अर्थ है।
शून्यता का मतलब खालीपन नहीं,
बल्कि हर वस्तु और हर संबंध का अस्थायी और परस्पर-निर्भर होना।
यदि हम यह मान लें कि रिश्ते स्थायी नहीं,
बल्कि बदलती परिस्थितियों पर आधारित हैं,
तो शून्य का अनुभव दुखद नहीं,
बल्कि मुक्ति देने वाला हो जाता है।

वेदांत का रहस्य

वेदांत कहता है कि “शून्य” ही पूर्ण है।
“पूर्णमदः पूर्णमिदं, पूर्णात् पूर्णमुदच्यते”
जब सब शून्य हो जाता है,
तो वास्तव में सब पूर्ण ही है,
क्योंकि आत्मा की संपन्नता कभी घटती नहीं।
रिश्तों का शून्य हमें यह सिखाता है कि
हमारे भीतर की पूर्णता ही असली आधार है,
बाहरी स्वीकार्यता नहीं।


निष्कर्ष

रिश्तों का गणित तब तक कठिन लगेगा,
जब तक हम इसे जोड़-घटाव से देखेंगे।
लेकिन जब हम इसे धर्म (कर्तव्य), शून्यता (अस्थायीता)
और पूर्णता (आत्मिक समृद्धि) के दृष्टिकोण से देखेंगे,
तब समझ आएगा—

👉 शून्य अंत नहीं है,
बल्कि नई शुरुआत का बिंदु है।



No comments:

Post a Comment

न्यूज़ विचार और व्यव्हार

जब मीडिया सत्ता की ढाल बने, तब जनता की पत्रकारिता ज़रूरी

जब मीडिया सत्ता की ढाल बने, तब जनता की पत्रकारिता ज़रूरी लोकतंत्र के चार स्तंभों में मीडिया को इसलिए जगह दी गई थी ताकि वह सत्ता पर निगरानी र...