लोक अदालत (Lok Adalat) भारत में न्याय देने की एक वैकल्पिक व्यवस्था (Alternative Dispute Resolution System – ADR) है, जिसे न्यायपालिका द्वारा मान्यता प्राप्त है।
परिभाषा
लोक अदालत का अर्थ है – जनता की अदालत। यह एक ऐसी व्यवस्था है जहाँ दोनों पक्ष आपसी सहमति से, बिना लंबी अदालती प्रक्रिया और खर्च के, अपने विवाद का निपटारा करते हैं।
मुख्य विशेषताएँ
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स्वेच्छा (Voluntary): दोनों पक्ष अपनी इच्छा से विवाद सुलझाने आते हैं।
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तेज निपटारा: यहाँ मामलों का निपटारा जल्दी होता है।
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कम खर्च: यहाँ कोर्ट फीस नहीं लगती। अगर केस पहले से कोर्ट में है, तो फीस भी वापस हो जाती है।
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बाध्यकारी (Binding): लोक अदालत का निर्णय अदालत के डिक्री (Court Decree) की तरह अंतिम और मान्य होता है।
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अपील नहीं: लोक अदालत के फैसले के खिलाफ आम तौर पर अपील नहीं की जा सकती।
किस प्रकार के मामले लोक अदालत में आते हैं?
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सिविल मामले (जैसे – पैसों के विवाद, ज़मीन-जायदाद के छोटे विवाद, पारिवारिक मामले)
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मोटर वाहन दुर्घटना मुआवज़ा मामले
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बैंक ऋण (Loan Recovery) संबंधी मामले
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बिजली, पानी, टेलीफोन बिल विवाद
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श्रम विवाद
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छोटे-मोटे आपराधिक मामले (Compoundable offences)
कानूनी आधार
लोक अदालत की व्यवस्था वैधानिक रूप से Legal Services Authorities Act, 1987 के तहत स्थापित की गई है।
प्रकार
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राष्ट्रीय लोक अदालत (संपूर्ण देश में एक ही दिन)
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स्थायी लोक अदालत (Public Utility Services के मामलों के लिए)
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तालुका/जिला स्तर की लोक अदालतें
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मोबाइल लोक अदालतें (गाँव-गाँव जाकर सुनवाई करती हैं)
👉 सरल भाषा में, लोक अदालत वह जगह है जहाँ बिना वकील और अदालत की लंबी प्रक्रिया में पड़े, आपसी सहमति से सस्ता, जल्दी और न्यायपूर्ण समाधान मिलता है।
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