कोटद्वार।
गढ़वाल का प्रवेश द्वार माने जाने वाले कोटद्वार की राजनीति हमेशा से दिलचस्प रही है। मैदानी और पहाड़ी क्षेत्र के मिश्रित सामाजिक ढांचे के कारण यहां का चुनावी गणित भी जटिल माना जाता है। लेकिन हाल के समय में यहां के राजनीतिक समीकरणों में स्पष्ट बदलाव देखने को मिल रहा है।
सत्ता की नजदीकी और प्रभाव
स्थानीय राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि जो नेता सत्ता और संगठन के करीब हैं, उनकी “राजनीतिक पकड़” मजबूत होती जा रही है। सरकारी कार्यक्रमों में उनकी उपस्थिति, प्रशासनिक बैठकों में सक्रियता और मीडिया में दृश्यता यह संकेत देती है कि प्रभाव का केंद्र बदल रहा है।
वहीं कुछ ऐसे पुराने चेहरे, जो कभी कोटद्वार की राजनीति में निर्णायक माने जाते थे, अब सीमित दायरे में सिमटते दिखाई दे रहे हैं।
गुटबाजी और संगठनात्मक खींचतान
कोटद्वार की राजनीति में गुटबाजी कोई नई बात नहीं है। लेकिन वर्तमान परिदृश्य में यह और स्पष्ट होकर सामने आ रही है। पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर मतभेद, टिकट की संभावनाएं और क्षेत्रीय संतुलन जैसे मुद्दे अंदरूनी तनाव को जन्म दे रहे हैं।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यही गुटबाजी कई बार चुनावी रणनीति को प्रभावित करती है।
स्थानीय मुद्दे बनाम राजनीतिक बयान
कोटद्वार शहर और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी समस्याएं आज भी मौजूद हैं—
ट्रैफिक और शहरी अव्यवस्था
रोजगार के सीमित अवसर
पहाड़ी गांवों से लगातार पलायन
स्वास्थ्य और शिक्षा ढांचे की चुनौतियां
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि राजनीतिक बयानबाजी से अधिक जरूरी है जमीनी स्तर पर ठोस काम।
नई पीढ़ी की दस्तक
कोटद्वार में युवा नेताओं की सक्रियता भी बढ़ी है। सोशल मीडिया और जनसंपर्क के माध्यम से वे अपनी पहचान बनाने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यहां अब भी व्यक्तिगत संपर्क और क्षेत्रीय नेटवर्क की अहम भूमिका है।
आगे की राह
कोटद्वार की राजनीति फिलहाल संक्रमण के दौर में है। सत्ता से निकटता रखने वाले नेता फिलहाल मजबूत स्थिति में नजर आते हैं, लेकिन अंतिम फैसला जनता ही करेगी।
अगर विकास और जनहित के मुद्दों पर ठोस पहल नहीं हुई, तो आने वाले समय में राजनीतिक तस्वीर फिर बदल सकती है।
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