दो पन्नों की विदाई और पत्रकारिता के एक पूरे युग की कहानी
सुंदर चंद ठाकुर को मिला सम्मान सिर्फ एक संपादक की विदाई नहीं, बल्कि उस पत्रकारिता का सम्मान है जिसमें अनुभव, जोखिम, साहित्य, अनुशासन और जनसरोकार साथ चलते हैं
किसी संपादक की विदाई पर अखबार का दो विशेष पन्ने प्रकाशित करना सामान्य घटना नहीं है। अखबार रोज निकलता है, हजारों खबरें आती हैं और अगले दिन पुरानी हो जाती हैं। लेकिन कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जिनकी विदाई को भी अखबार अपने इतिहास का हिस्सा बनाना चाहता है।
कैप्टन सुंदर चंद ठाकुर की विदाई इसी श्रेणी की घटना है।
31 अगस्त 2026 को नवभारत टाइम्स, मुंबई के रेजिडेंट एडिटर पद से उनकी सेवानिवृत्ति हुई। लगभग 16 वर्षों तक मुंबई संस्करण की संपादकीय जिम्मेदारी संभालने वाले ठाकुर की विदाई पर प्रकाशित विशेष पन्ने केवल एक व्यक्ति के सम्मान का दस्तावेज नहीं हैं; वे यह सवाल भी खड़ा करते हैं कि आखिर एक संपादक को महान क्या बनाता है—पद, लोकप्रियता, संस्थान या उसके पीछे छोड़ी हुई पेशेवर विरासत?
सुंदर चंद ठाकुर की कहानी इसलिए अलग है क्योंकि उनका पत्रकारिता में प्रवेश किसी पारंपरिक रास्ते से नहीं हुआ।
वे भारतीय सेना में अधिकारी रहे। 1997 में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर टाइम्स ऑफ इंडिया समूह में सिक्योरिटी ऑफिसर बने। फिर उसी संस्थान के हिंदी अखबार नवभारत टाइम्स के संपादकीय विभाग में पहुंचे। यह परिवर्तन अपने आप में जोखिम लेने की क्षमता का उदाहरण है।
और शायद पत्रकारिता में सबसे जरूरी चीज यही है—जोखिम लेने का साहस।
सुरक्षित रास्ते पर चलते हुए कोई व्यक्ति अच्छा कर्मचारी बन सकता है, लेकिन पत्रकार बनने के लिए कई बार अपने भीतर के प्रश्नों का पीछा करना पड़ता है।
ठाकुर ने यही किया।
उन्होंने सेना के अनुशासन को पीछे नहीं छोड़ा, बल्कि उसे पत्रकारिता की कार्यशैली में साथ लेकर आए। साहित्य से अपने रिश्ते को भी कायम रखा। वे कवि और लेखक रहे। फिटनेस उनकी जीवनशैली का हिस्सा रही और वे लंबे समय से मैराथन दौड़ते रहे हैं।
यानी एक व्यक्ति के भीतर सैनिक, पत्रकार, संपादक, लेखक और फिटनेस साधक—कई व्यक्तित्व साथ-साथ चलते रहे।
यही पत्रकारिता की असली खूबसूरती है।
इस पेशे की दुनिया इतनी बड़ी है कि एक उम्र भी प्रयोग करने के लिए छोटी पड़ सकती है।
लेकिन आज पत्रकारिता के सामने एक बड़ा संकट भी है।
सूचना बहुत है, सत्यापन कम।
आवाजें बहुत हैं, सुनने की क्षमता कम।
कंटेंट बहुत है, संदर्भ कम।
और पत्रकारिता के नाम पर ऐसा बहुत कुछ भी प्रसारित हो रहा है जिसे पत्रकारिता कहना स्वयं पत्रकारिता के साथ अन्याय होगा।
सोशल मीडिया और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने इस संकट को और जटिल बना दिया है। अब खबर लिखने के लिए केवल शब्दों की जरूरत नहीं; खबर की विश्वसनीयता साबित करने के लिए जांच, स्रोत, दस्तावेज और जमीन से जुड़ा अनुभव चाहिए।
ऐसे समय में सुंदर चंद ठाकुर की पेशेवर यात्रा एक महत्वपूर्ण संदेश देती है—
पत्रकारिता केवल सूचना का कारोबार नहीं है। यह दृष्टि का निर्माण है।
एक अच्छा संपादक केवल कॉपी पर लाल निशान नहीं लगाता। वह अपने पत्रकारों को सवाल करना सिखाता है।
वह उन्हें यह समझाता है कि सरकार का बयान खबर हो सकता है, लेकिन उसके दावे की जांच पत्रकारिता है।
वायरल वीडियो खबर हो सकता है, लेकिन उसकी सत्यता जांचना पत्रकारिता है।
किसी गरीब की समस्या खबर हो सकती है, लेकिन उस समस्या के पीछे मौजूद व्यवस्था को समझना पत्रकारिता है।
और सत्ता से सवाल पूछना केवल साहस नहीं—लोकतंत्र के प्रति जिम्मेदारी है।
सुंदर चंद ठाकुर की विदाई इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि उन्होंने अपने पीछे केवल पद नहीं छोड़ा, बल्कि एक ऐसी पेशेवर यात्रा छोड़ी है जिसमें लगातार सीखने और खुद को बदलने की क्षमता दिखाई देती है।
उनकी अपनी विदाई संबंधी टिप्पणियों में भी निष्पक्ष, विश्वसनीय और जनसरोकार वाली पत्रकारिता को प्राथमिकता देने की बात सामने आती है।
यही वह बिंदु है जहां आज की पत्रकारिता को अपने आप से सवाल करना चाहिए।
क्या हम पत्रकारिता को पेशा मान रहे हैं या जिम्मेदारी?
अगर पत्रकारिता केवल नौकरी है तो रिटायरमेंट के साथ कहानी खत्म हो जाती है।
लेकिन अगर पत्रकारिता सामाजिक जिम्मेदारी है तो पद खत्म होने के बाद भी पत्रकार की भूमिका खत्म नहीं होती।
शायद इसी कारण ठाकुर अपनी अगली पारी को भी समाज से जोड़ना चाहते हैं। रिपोर्टों के अनुसार वे मानसिक फिटनेस, नेतृत्व विकास, मीडिया, डिजिटल कंटेंट, फिटनेस और आध्यात्मिक विकास के क्षेत्रों में काम करने की योजना बना रहे हैं तथा उत्तराखंड में मैराथन और युवा कार्यक्रमों पर भी काम करना चाहते हैं।
यह उस व्यक्ति की कहानी है जो रिटायरमेंट को अंत नहीं मानता।
एक पारी समाप्त होती है, दूसरी शुरू हो जाती है।
और शायद यही जीवन का सबसे बड़ा सबक है।
पत्रकारिता में आज हमें ऐसे ही उदाहरणों की जरूरत है। ऐसे लोग जो नई पीढ़ी को यह बता सकें कि पत्रकार बनने के लिए केवल कैमरा, मोबाइल या सोशल मीडिया अकाउंट पर्याप्त नहीं है।
पढ़ना पड़ेगा।
जमीन पर जाना पड़ेगा।
सवाल पूछने पड़ेंगे।
स्रोतों की जांच करनी पड़ेगी।
और सबसे कठिन—अपने भीतर के पूर्वाग्रहों पर भी सवाल करना पड़ेगा।
सुंदर चंद ठाकुर को नवभारत टाइम्स मुंबई द्वारा दिए गए दो विशेष पन्नों का महत्व इसी संदर्भ में समझना चाहिए।
यह केवल विदाई नहीं है।
यह उस पेशेवर संस्कृति की स्वीकारोक्ति है जिसमें किसी व्यक्ति का मूल्य उसकी कुर्सी से बड़ा हो जाता है।
कुर्सी किसी को संपादक बना सकती है, लेकिन सम्मान अर्जित करने के लिए पूरी जिंदगी लगती है।
और शायद यही इस विदाई की सबसे बड़ी सीख है।
अखबार के दो पन्ने सुंदर चंद ठाकुर के लिए थे, लेकिन सवाल पूरी पत्रकारिता के लिए है—हम अपने पीछे कितने पन्ने छोड़ेंगे?
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