Monday, December 22, 2025

संपादकीय | पहाड़ निशाने पर क्यों हैं?

 

संपादकीय | पहाड़ निशाने पर क्यों हैं?

क्यों पहाड़ियों के पीछे पड़े हो?
यह सवाल आज सिर्फ़ एक समुदाय का नहीं, बल्कि पूरे देश की विकास-दृष्टि पर प्रश्नचिह्न है। पहाड़ इसलिए निशाने पर हैं क्योंकि वे अब पहले जैसे प्रहरी नहीं रहे—न अपने जंगलों के, न अपनी ज़मीन के, न अपने भविष्य के।

एक समय था जब पहाड़ी समाज खुद अपनी रक्षा-रेखा था। जंगल कटता तो आवाज़ उठती थी, नदी रोकी जाती तो विरोध होता था, ज़मीन छीनी जाती तो संघर्ष खड़ा हो जाता था। आज वही समाज रोज़गार की मजबूरी, पलायन, और राजनीतिक उपेक्षा के चलते बिखर चुका है। प्रहरी कमजोर नहीं हुआ, उसे अकेला छोड़ दिया गया

अरावली की स्थिति इस सच्चाई की गवाही देती है। जब किसी पहाड़ी श्रृंखला को सिर्फ़ खनन, रियल एस्टेट और त्वरित मुनाफ़े की नज़र से देखा जाता है, तो वह पहाड़ नहीं, मलबा बन जाती है। अरावली आज चेतावनी है—कल उत्तराखंड का आईना। फर्क बस इतना है कि यहाँ आपदा भूस्खलन बनकर आती है, वहाँ धूल बनकर उड़ती है।

उत्तराखंड का पहाड़ी आज ना घर का रहा, ना घाट का
गाँव उजड़ गए, शहरों ने अपनाया नहीं।
खेती छूटी, नौकरी मिली नहीं।
संस्कृति पीछे छूट गई, पहचान अधूरी रह गई।

यह त्रासदी किसी प्राकृतिक आपदा का परिणाम नहीं, बल्कि नीतिगत अंधेपन का नतीजा है। विकास के नाम पर पहाड़ को संसाधन समझा गया, समाज नहीं। सड़कें बनीं, पर रोज़गार नहीं। परियोजनाएँ आईं, पर स्थानीय भागीदारी नहीं। फैसले हुए, पर पहाड़ से पूछकर नहीं।

असल सवाल यह नहीं कि पहााड़ियों के पीछे क्यों पड़े हो,
असल सवाल यह है कि पहााड़ी खुद अपने पीछे क्यों नहीं खड़े हो रहे?

जब तक पहाड़ के मुद्दे चुनावी एजेंडा नहीं बनेंगे,
जब तक पर्यावरण, पलायन, स्थानीय रोजगार और भूमि अधिकार नीति के केंद्र में नहीं आएँगे,
और जब तक पहाड़ी समाज खुद संगठित होकर सवाल नहीं पूछेगा—
तब तक पहाड़ सिर्फ़ भावनाओं में जिएगा, नीतियों में नहीं।

आज ज़रूरत है पहाड़ को बचाने की नहीं,
पहाड़ को फिर से प्रहरी बनाने की।
वरना आने वाली पीढ़ियाँ पूछेंगी—
जब पहाड़ ढह रहा था, तब हम चुप क्यों थे?

Sunday, December 21, 2025

जब पत्रकार ही खबरों की हत्या करने लगें

संपादकीय | जब पत्रकार ही खबरों की हत्या करने लगें

लोकतंत्र की सबसे मज़बूत नींव स्वतंत्र और निर्भीक पत्रकारिता मानी जाती है। कहा जाता है कि पत्रकार समाज की आँख और कान होता है, जो सत्ता के अंधेरे को उजाले में लाता है। लेकिन सवाल यह है कि जब यही पत्रकार सच को दफना दे, खबरों की हत्या कर दे, तो लोकतंत्र का क्या होगा?

आज “खबर न चलाने” की संस्कृति केवल चूक नहीं, बल्कि एक सुनियोजित अपराध बनती जा रही है। दबाव, प्रलोभन, भय या सौदेबाज़ी के कारण जब जनहित से जुड़ी सूचनाएँ जनता तक नहीं पहुँचतीं, तब यह केवल पत्रकारिता का पतन नहीं, बल्कि जनता के सूचना के अधिकार की हत्या है।

संविधान ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी है, लेकिन यह स्वतंत्रता जिम्मेदारी के साथ आती है। अनुच्छेद 19(1)(a) पत्रकार को बोलने का अधिकार देता है, पर अनुच्छेद 19(2) यह भी स्पष्ट करता है कि यह अधिकार जनहित के विरुद्ध नहीं हो सकता। जब कोई पत्रकार जानबूझकर सच छिपाता है, तो वह इस अधिकार का दुरुपयोग करता है।

दुर्भाग्यपूर्ण सच्चाई यह है कि भारत में खबरों की हत्या को सीधे अपराध मानने वाला कोई स्पष्ट कानून नहीं है। हाँ, परिस्थितियों के अनुसार भारतीय दंड संहिता, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम या सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के तहत कार्रवाई संभव है, लेकिन यह सब अप्रत्यक्ष और सीमित है।

प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया जैसी संस्थाएँ नैतिक निंदा तो कर सकती हैं, पर दंड देने की शक्ति उनके पास नहीं है। यही कारण है कि खबरों की हत्या करने वाले अक्सर बेखौफ रहते हैं।

यह स्थिति लोकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक है। क्योंकि अगर खबरें बिकने लगें, दबने लगें या सौदों का हिस्सा बन जाएँ, तो जनता सच और झूठ में फर्क कैसे करेगी? सत्ता से सवाल कौन पूछेगा?

अब समय आ गया है कि देश यह तय करे—
क्या खबर दबाना सिर्फ अनैतिक कृत्य है या जनहित के खिलाफ अपराध?

ज़रूरत है:

खबर दबाने और जानबूझकर सूचना छिपाने को दंडनीय अपराध घोषित करने की

एक स्वतंत्र मीडिया लोकपाल की

और पत्रकारिता में पारदर्शिता व जवाबदेही सुनिश्चित करने की


क्योंकि अगर पत्रकार ही सच का गला घोंटने लगे,
तो याद रखना चाहिए—
खबरों की हत्या के बाद, बारी लोकतंत्र की होती है।

Friday, December 19, 2025

जैन धर्म: क्षत्रिय जन्म, परंतु कर्म प्रधान दर्शन

lसंपादकीय | जैन धर्म: क्षत्रिय जन्म, परंतु कर्म प्रधान दर्शन

भारतीय धार्मिक परंपरा में जैन धर्म को अक्सर किसी एक सामाजिक वर्ग से जोड़कर देखा जाता है। यह प्रश्न बार-बार उठता है कि क्या जैन धर्म क्षत्रिय कुल से जुड़ा हुआ था, और यदि हाँ, तो आज जैन समाज में व्यापारी वर्ग की प्रधानता क्यों दिखाई देती है। इस प्रश्न का उत्तर इतिहास, दर्शन और सामाजिक विकास—तीनों को साथ रखकर समझना आवश्यक है।

जैन परंपरा के अनुसार अंतिम तीर्थंकर महावीर स्वामी क्षत्रिय कुल में जन्मे थे। उनके पिता राजा सिद्धार्थ और माता रानी त्रिशला थीं। इसी प्रकार प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव को भी इक्ष्वाकु वंश का क्षत्रिय राजा माना जाता है। जैन ग्रंथों में अधिकांश तीर्थंकरों का संबंध राजवंशों से बताया गया है। इस दृष्टि से यह कहना ऐतिहासिक रूप से गलत नहीं कि तीर्थंकरों का जन्म क्षत्रिय कुलों में हुआ।

लेकिन यहीं पर एक बड़ी भ्रांति जन्म लेती है। जैन धर्म जन्म आधारित श्रेष्ठता को नहीं, बल्कि कर्म आधारित उन्नति को स्वीकार करता है। जैन दर्शन का मूल सिद्धांत है—आत्मा स्वतंत्र है, शुद्ध है और अपने कर्मों से बंधती तथा मुक्त होती है। न तो कोई ईश्वर किसी को ऊँचा-नीचा बनाता है और न ही जन्म किसी को मोक्ष का अधिकारी या अयोग्य ठहराता है।

महावीर स्वामी स्वयं इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं। वे राजा थे, परंतु उन्होंने राजसत्ता, वैभव और कुल-गौरव को त्यागकर संयम और तप का मार्ग चुना। जैन धर्म में राजा का महत्व उसके सिंहासन से नहीं, बल्कि उसके त्याग से तय होता है। यही कारण है कि जैन परंपरा में साधु सर्वोच्च आदर्श है—वह चाहे किसी भी कुल में जन्मा हो।

समय के साथ सामाजिक परिस्थितियाँ बदलीं। युद्ध, हिंसा और सत्ता संघर्ष से दूरी बनाए रखने के लिए जैन समाज ने ऐसे व्यवसाय अपनाए जो अहिंसा के अधिक अनुकूल थे। व्यापार, लेखा, शिक्षा और दान—ये क्षेत्र जैन मूल्यों से सहज रूप से मेल खाते थे। परिणामस्वरूप जैन समाज में वैश्य वर्ग की संख्या बढ़ी। यह परिवर्तन धार्मिक आदेश नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और नैतिक चयन था।

आज आवश्यकता इस बात की है कि जैन धर्म को किसी जाति या वर्ग के खांचे में बंद न किया जाए। जैन धर्म का संदेश स्पष्ट है—अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह और आत्मसंयम। यह संदेश हर मनुष्य के लिए है, चाहे वह किसी भी कुल, वर्ग या पृष्ठभूमि से आता हो।

अंततः कहा जा सकता है कि जैन धर्म की जड़ें भले ही क्षत्रिय राजपरिवारों में दिखाई देती हों, लेकिन उसकी शाखाएँ और फल समस्त मानवता के लिए हैं। यह धर्म सत्ता से नहीं, साधना से; जन्म से नहीं, कर्म से; और बाहरी पहचान से नहीं, आंतरिक शुद्धता से मनुष्य का मूल्य तय करता है। यही जैन दर्शन की सबसे बड़ी प्रासंगिकता और शक्ति है।

Thursday, December 18, 2025

विरोध से परिपक्वता तक

संपादकीय | विरोध से परिपक्वता तक

“मुख़ालिफ़त से मिरी शख़्सियत सँवरती है,
मैं दुश्मनों का बड़ा एहतिराम करता हूँ!”
यह पंक्तियाँ केवल शायरी नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक चेतना का घोषवाक्य हैं। आज के दौर में, जहाँ असहमति को देशद्रोह और सवाल को साज़िश मान लिया जाता है, वहाँ यह सोच एक ज़रूरी हस्तक्षेप है।

लोकतंत्र का मूल स्वभाव ही प्रश्न करना है। सत्ता, समाज और विचार—तीनों तभी स्वस्थ रहते हैं जब उन पर सवाल उठते रहें। इतिहास गवाह है कि जिन व्यवस्थाओं ने आलोचना से मुँह मोड़ा, वे आत्ममुग्धता का शिकार होकर अंततः ढह गईं। इसके उलट, जिन समाजों ने विरोध को सुना, बहस को जगह दी और असहमति को सम्मान दिया, वे समय के साथ अधिक मज़बूत हुए।

आज दुर्भाग्य यह है कि विरोध करने वाला “दुश्मन” बना दिया जाता है। असहमति रखने वाला नागरिक नहीं, बल्कि “एजेंडा” माना जाता है। सोशल मीडिया से लेकर संसद तक, भाषा में शिष्टता की जगह कटुता ने ले ली है। नतीजा यह कि संवाद टूट रहा है और लोकतंत्र शोर में बदलता जा रहा है।

वास्तव में विरोधी वह आईना होता है जो हमारी कमज़ोरियाँ दिखाता है। आलोचक वह शिक्षक है जो बिना शुल्क लिए हमें बेहतर बनने का अवसर देता है। जो व्यक्ति या सत्ता अपने आलोचकों का सम्मान करना सीख लेती है, वही परिपक्व कहलाने की हक़दार होती है। आत्मविश्वास तालियों से नहीं, सवालों से बनता है।

इसलिए ज़रूरत है कि हम विरोध को सहन करना नहीं, स्वीकार करना सीखें। असहमति से डरने के बजाय उससे संवाद करें। क्योंकि जो समाज अपने “दुश्मनों” का सम्मान करना जानता है, वही वास्तव में अपने लोकतंत्र की रक्षा करता है।

आज के भारत में यह सोच सिर्फ़ साहित्यिक सौंदर्य नहीं, बल्कि एक राजनीतिक और सामाजिक आवश्यकता है। विरोध से सँवरने की क्षमता ही हमें भीड़ से नागरिक और सत्ता से लोकतंत्र बनाती है।

Tuesday, December 16, 2025

कर्ज़ की राजनीति और आम आदमी का आत्मविश्वास

संपादकीय | कर्ज़ की राजनीति और आम आदमी का आत्मविश्वास

देश के प्रधानमंत्री जब विदेश यात्रा पर निकलते हैं, तो वह केवल राजनयिक दौरा नहीं होता, बल्कि आर्थिक आत्मविश्वास का सार्वजनिक प्रदर्शन भी होता है। निवेश, रणनीतिक साझेदारी और वैश्विक मंचों पर भारत की मौजूदगी—इन सबका संदेश यही होता है कि देश आगे बढ़ रहा है। इसी बीच देश और राज्यों पर बढ़ते कर्ज़ के आँकड़े भी सामने आते हैं। हैरानी यह है कि इन आँकड़ों के बावजूद व्यवस्था निर्बाध चलती रहती है। सरकारें आश्वस्त हैं, योजनाएँ जारी हैं और घोषणाओं का सिलसिला थमता नहीं।

यही दृश्य आम नागरिक के मन में एक अजीब-सा आत्मविश्वास पैदा करता है। जब देश और प्रदेश कर्ज़ लेकर विकास का दावा कर सकते हैं, तो आम आदमी भी अपने सीमित दायरे में वही तर्क अपनाने लगता है। घरेलू बजट हो या व्यक्तिगत जीवन—उधार अब संकट नहीं, बल्कि ‘मैनेजमेंट’ का हिस्सा बनता जा रहा है। फर्क सिर्फ पैमाने का है, सोच की दिशा एक जैसी होती जा रही है।

सरकारें कर्ज़ को भविष्य के निवेश के रूप में प्रस्तुत करती हैं। कहा जाता है कि आज लिया गया कर्ज़ कल की समृद्धि का आधार बनेगा। पर सवाल यह है कि क्या हर कर्ज़ उत्पादक होता है? क्या हर उधार विकास में बदलता है, या फिर उसका बड़ा हिस्सा केवल व्यवस्था को चलाए रखने में खर्च हो जाता है? यही सवाल राज्यों के वित्त से लेकर आम आदमी की जेब तक समान रूप से लागू होता है।

चिंता का विषय यह नहीं है कि कर्ज़ लिया जा रहा है, बल्कि यह है कि कर्ज़ को सामान्य और अनिवार्य मान लिया गया है। जब सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग कर्ज़ को सहजता से स्वीकार करते हैं, तो समाज के निचले स्तर तक यही संदेश जाता है कि उधार लेकर चलना कोई असामान्य बात नहीं। धीरे-धीरे आत्मनिर्भरता की जगह किस्तों की संस्कृति ले लेती है।

लोकतंत्र में सरकारें जवाबदेह होती हैं और आर्थिक फैसलों की समीक्षा ज़रूरी है। देश और राज्यों के कर्ज़ का बोझ आखिरकार जनता पर ही आता है—करों के रूप में, महंगाई के रूप में और भविष्य की सीमाओं के रूप में। इसलिए यह बहस जरूरी है कि विकास और कर्ज़ के बीच संतुलन कहाँ है।

प्रधानमंत्री की विदेश यात्राएँ हों या राज्यों की विकास योजनाएँ—इनका मूल्यांकन केवल प्रतीकों और भाषणों से नहीं, बल्कि ठोस आर्थिक परिणामों से होना चाहिए। उसी तरह, आम आदमी के लिए भी यह ज़रूरी है कि वह सरकारों से मिले ‘आत्मविश्वास’ को आँख बंद कर न अपनाए।

कर्ज़ पर चलती अर्थव्यवस्था कुछ समय तक रफ्तार बनाए रख सकती है, लेकिन स्थायी प्रगति के लिए वित्तीय अनुशासन अपरिहार्य है। वरना एक दिन यह सवाल केवल सरकारों से नहीं, बल्कि हर नागरिक से पूछा जाएगा—
“चल तो रहा था, लेकिन किस कीमत पर?”

Wednesday, December 10, 2025

विकास बनाम पर्यावरण: क्या तपोवन की 1700 पेड़ों की बलि जरूरी है?

 विकास बनाम पर्यावरण: क्या तपोवन की 1700 पेड़ों की बलि जरूरी है?

नासिक कुंभ मेला दुनिया का सबसे बड़ा आध्यात्मिक और सांस्कृतिक आयोजन है। मिट्टी, संस्कृति और अध्यात्म की सुगंध से बना यह आयोजन स्वयं में महान है। लेकिन विडंबना यह है कि उसी आध्यात्मिक ऊर्जा के केंद्र—तपोवन—में आज 1700 से अधिक पेड़ों की कटाई का प्रस्ताव रखा गया है।

प्रश्न यह नहीं है कि कुंभ के लिए सुविधाएँ क्यों चाहिए। प्रश्न यह है कि सुविधाएँ प्रकृति की कीमत पर क्यों?
आज दुनिया सतत विकास की बात कर रही है। शहर आधुनिकता के साथ ‘ग्रीन इंफ्रास्ट्रक्चर’ को जोड़ रहे हैं। ऐसे समय में धार्मिक आयोजन के लिए हज़ारों पेड़ काटना नासिक को पीछे ले जाने वाला कदम है।

पेड़ केवल लकड़ी नहीं—एक जीवित तंत्र है। वे हवा शुद्ध करते हैं, मिट्टी को बाँधते हैं, गर्मी कम करते हैं और मानव–जीवन के लिए सुरक्षा कवच का काम करते हैं। तपोवन जैसे हरित क्षेत्र में पेड़ों की इतनी बड़ी कटाई न केवल पर्यावरणीय नुकसान है, बल्कि सांस्कृतिक विरासत पर भी प्रहार है।

क्या विकल्प नहीं हैं?
बिल्कुल हैं। आधुनिक बायोटॉयलेट, पोर्टेबल सैनिटेशन यूनिट, मोबाइल वॉशरूम, और पर्यावरण-अनुकूल अस्थायी ढाँचे दुनिया के अनेक बड़े आयोजनों में अपनाए जा चुके हैं। यह ऐसे समाधान हैं जिनसे पेड़ों को छुए बिना आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध कराई जा सकती हैं।

समाज और प्रशासन दोनों के लिए यह समय आत्मचिंतन का है। धार्मिक आयोजन के नाम पर प्रकृति का नुकसान हमारी आस्था का उद्देश्य नहीं हो सकता।
तपोवन को बचाना केवल 1700 पेड़ों को बचाना नहीं है—यह नासिक की पहचान, संस्कृति और भविष्य को सुरक्षित रखना है।

अब नागरिकों को जिम्मेदारी के साथ अपनी आवाज़ उठानी होगी ताकि विकास और पर्यावरण एक साथ चल सकें।

Monday, December 8, 2025

कविता: शरीर और मन का अनुनाद



1️⃣ कविता: शरीर और मन का अनुनाद

सांसों की चुप रोशनी में,
मन का एक चराग जलता है।
शरीर की थकी गलियों में,
शांति का कोई पंछी पलता है।

जब धड़कनें विचारों के साथ
एक ही लय में चलती हैं,
तब भीतर का टूटा संगीत
फिर से सुर पाता है।

तन की मिट्टी और मन का आकाश,
दोनों एक ही क्षण में खुलते हैं,
और इंसान अपने भीतर छिपा
सच पहचानने लगता है।

न कोई युद्ध, न कोई शोर—
सिर्फ भीतर का धीमा कंपन।
जहाँ शरीर शांत, मन प्रसन्न,
और आत्मा गाती है—
"यही मेरा घर, यही मेरा ध्यान।"


2️⃣ संपादकीय: शरीर और मन का अनुनाद—समकालीन जीवन की गुम होती लय

हम आधुनिक दुनिया में तेज़ी से भागते हुए अक्सर भूल जाते हैं कि इंसान दो हिस्सों में बँटा हुआ नहीं है—एक शरीर और दूसरा मन। वास्तविकता यह है कि दोनों एक ही समग्र अस्तित्व के दो स्वर हैं। जब ये स्वर तालमेल में होते हैं, तभी जीवन का संगीत पूर्ण होता है; और जब इनमें दरार पड़ती है, तो हमारा पूरा अस्तित्व असंतुलन में डगमगाने लगता है।

आज का मनुष्य तनाव, भागदौड़ और अनिश्चितताओं के बीच जी रहा है। तकनीक की चमक और सूचनाओं की बाढ़ के बीच मन लगातार उत्तेजित रहता है, जबकि शरीर अनियमित जीवनशैली की मार झेलता है। परिणाम यह कि दोनों की लय टूट जाती है। यही टूटन चिंता, अनिद्रा, अवसाद और थकान के रूप में सामने आती है।

शरीर–मन अनुनाद कोई अध्यात्मिक कल्पना नहीं है; यह विज्ञान और व्यवहार दोनों की कसौटी पर खरी उतरने वाली वास्तविकता है। ध्यान, श्वास साधना और सचेत चाल-ढाल आज पूरी दुनिया में स्वास्थ्य-विज्ञान द्वारा स्वीकार की जा चुकी प्रक्रियाएँ हैं। यह प्रमाणित है कि धीमी और गहरी सांसें मस्तिष्क के तनाव केंद्रों को शांत करती हैं, और बदले में शरीर के हार्मोनल तंत्र को संतुलित करती हैं।

दूसरी ओर, शरीर की उपेक्षा सीधे मन की गुणवत्ता पर चोट करती है। खराब नींद, असंतुलित भोजन या निष्क्रियता केवल शारीरिक बीमारियाँ नहीं लातीं—वे विचारों को धुँधला, भावनाओं को चिड़चिड़ा और निर्णयों को अस्थिर बनाती हैं।

समस्या यह नहीं कि मनुष्य व्यस्त है; समस्या यह है कि वह अपनी लय से कट चुका है।
समाधान भी उतना ही सरल है—
शांत सांसें, सचेत अस्तित्व, और शरीर व मन के बीच संवाद।

आज की दुनिया को सिर्फ तेज़ गति नहीं, बल्कि सही लय की आवश्यकता है।
और यह लय तब मिलती है जब हम स्वीकार करते हैं कि शरीर और मन विरोध नहीं, बल्कि साथी हैं—एक-दूसरे की ऊर्जा को बढ़ाने वाले।

हमारे समाज, शिक्षा और कार्य-संस्कृति को भी इस समझ को अपनाने की ज़रूरत है। जीवन की गुणवत्ता केवल आर्थिक विकास से नहीं, बल्कि आंतरिक लय के संतुलन से तय होती है।

शरीर और मन के इस अनुनाद को पुनः खोज लेना, आधुनिक मनुष्य के लिए न केवल उपयोगी बल्कि आवश्यक है — क्योंकि लय में होता मनुष्य  सक्षम और शांत होता है।



न्यूज़ विचार और व्यव्हार

जब मीडिया सत्ता की ढाल बने, तब जनता की पत्रकारिता ज़रूरी

जब मीडिया सत्ता की ढाल बने, तब जनता की पत्रकारिता ज़रूरी लोकतंत्र के चार स्तंभों में मीडिया को इसलिए जगह दी गई थी ताकि वह सत्ता पर निगरानी र...