Monday, January 26, 2026

शव पानी में तैरता है, लेकिन जिंदा डूब जाता है: एक सामाजिक चेतावनी

शव पानी में तैरता है, लेकिन जिंदा डूब जाता है: एक सामाजिक चेतावनी

हम अक्सर समाचारों में पढ़ते हैं कि कोई व्यक्ति नदी, तालाब या पोखर में डूब गया, और कुछ दिनों बाद शव पानी में तैरता हुआ मिला। विज्ञान की दृष्टि से इसका सरल कारण है: जिंदा व्यक्ति का शरीर पानी से भारी होता है और डूब सकता है, जबकि मृत्यु के बाद शरीर में गैस बन जाती है और उसका घनत्व कम हो जाता है, इसलिए वह पानी में ऊपर तैरता है।

लेकिन इस साधारण भौतिक प्रक्रिया के पीछे छिपा है गंभीर संदेश—हमारी सुरक्षा, सतर्कता और समाज की जिम्मेदारी।

1. जीवन की अनमोलता और सुरक्षा

जिन लोगों को तैरना नहीं आता या जो पानी के किनारे अनजाने में समय बिताते हैं, उनका जोखिम सबसे अधिक होता है। जीवन का संरक्षण केवल व्यक्तिगत सावधानी नहीं है, बल्कि समाज और राज्य की जिम्मेदारी भी है। हर जलाशय, नदी और पोखर के पास सुरक्षा संकेत, बचाव उपकरण और निगरानी होना चाहिए।

2. सामाजिक चेतना और शिक्षा

स्कूलों और कॉलेजों में जल सुरक्षा का पाठ्यक्रम अनिवार्य होना चाहिए।

माता-पिता और समाज को बच्चों और युवाओं को तैराकी और पानी में सुरक्षा के नियम सिखाने चाहिए।

केवल डराने से काम नहीं चलेगा; विज्ञान और समझ को जीवन का हिस्सा बनाना होगा।


3. विज्ञान और मानव जिम्मेदारी

शव के तैरने और जिंदा डूबने की घटना हमें याद दिलाती है कि जीवन असुरक्षित है, पर ज्ञान और तैयारी सुरक्षा प्रदान कर सकती है।

चेतना और तैयारी ही है जो जिंदगियों को बचा सकती है।

यह सिर्फ एक वैज्ञानिक तथ्य नहीं, बल्कि सामाजिक संदेश भी है: सावधानी, सुरक्षा और जिम्मेदारी अपनाएँ।


निष्कर्ष

जैसे शव पानी में तैरता है क्योंकि उसका घनत्व कम हो गया है, वैसे ही समाज में सुरक्षा और जागरूकता का अभाव जीवन को डुबो सकता है। हमें चाहिए कि हम व्यक्तिगत और सामूहिक जिम्मेदारी से काम करें, ताकि कोई अनजानी त्रासदी जीवन को निगल न पाए।

मनुष्य के दिमाग में दौड़ते दो घोड़े

मनुष्य के दिमाग में दौड़ते दो घोड़े

मनुष्य का मस्तिष्क एक रणभूमि है, जहाँ हर क्षण दो घोड़े दौड़ते रहते हैं—
एक सकारात्मक सोच का, दूसरा नकारात्मक सोच का।
जीत उसी की होती है जिसे हम अधिक खुराक देते हैं।

यह खुराक कोई भोजन नहीं, बल्कि हमारे विचार, शब्द, आदतें और दृष्टिकोण हैं।
हम दिन भर क्या सोचते हैं, किस बात पर ध्यान देते हैं, किस तरह की भाषा बोलते हैं—यही तय करता है कि कौन-सा घोड़ा ताकतवर बनेगा।

नकारात्मक घोड़ा डर से पलता है।
वह असफलताओं की यादों, अपमान के अनुभवों, “लोग क्या कहेंगे” की चिंता और “मुझसे नहीं होगा” जैसी सोच से मजबूत होता है।
यह घोड़ा तेज़ दिखता है, पर अंततः मनुष्य को थका देता है।

दूसरी ओर, सकारात्मक घोड़ा विश्वास से जीवित रहता है।
वह आशा, धैर्य, आत्मसम्मान, सीखने की इच्छा और समाधान खोजने की आदत से ऊर्जा पाता है।
यह घोड़ा धीरे चलता है, पर मंज़िल तक पहुँचाता है।

आधुनिक न्यूरोसाइंस भी यही कहता है कि जिस विचार को हम बार-बार दोहराते हैं, मस्तिष्क उसी के लिए रास्ता बना लेता है।
यानी हमारा दिमाग वही बन जाता है, जिसे हम रोज़ अभ्यास कराते हैं।

यहीं से जीवन की दिशा तय होती है—
सोच बदलेगी तो भावना बदलेगी,
भावना बदलेगी तो कर्म बदलेगा,
और कर्म बदलेगा तो परिणाम अपने-आप बदल जाएंगे।

इसलिए प्रश्न यह नहीं है कि हमारे मन में नकारात्मक विचार आते हैं या नहीं—वे तो आते ही हैं।
असल प्रश्न यह है कि हम उन्हें खुराक देते हैं या नहीं।

हर सुबह, हर निर्णय, हर प्रतिक्रिया में हम अपने घोड़े को चुनते हैं।
जो समाज, परिवार और व्यक्ति सकारात्मक घोड़े को पालते हैं, वही कठिन समय में भी खड़े रहते हैं।

अंततः जीवन की दौड़ में जीत उसी की होती है
जो अपने दिमाग में सही घोड़े को रोज़ खिला रहा होता है।

रिश्तों का बदलता व्याकरण

संपादकीय | रिश्तों का बदलता व्याकरण

“भावुक लोग संबंध को संभालते हैं, प्रैक्टिकल लोग संबंध का फायदा उठाते हैं, और प्रोफेशनल लोग फायदा देखकर संबंध बनाते हैं।”
यह पंक्ति केवल एक विचार नहीं, बल्कि आज के सामाजिक चरित्र का आईना है।

एक समय था जब रिश्ते भरोसे, त्याग और संवेदना की बुनियाद पर खड़े होते थे। संबंध निभाना जीवन की सबसे बड़ी पूंजी मानी जाती थी। आज वही रिश्ते लाभ–हानि के गणित में उलझते दिखाई देते हैं। सवाल यह नहीं कि समय बदला है, सवाल यह है कि क्या इंसान भी अपने मूल से दूर होता जा रहा है?

भावुक लोग आज भी समाज की रीढ़ हैं। वे रिश्तों को इसलिए निभाते हैं क्योंकि उनके लिए संबंध स्वयं में एक मूल्य है। वे टूटते रिश्तों को जोड़ने की कोशिश करते हैं, भले ही इसकी कीमत उन्हें अकेले चुकानी पड़े। दुर्भाग्य यह है कि ऐसे लोग अक्सर ‘कमज़ोर’ समझ लिए जाते हैं, जबकि असल में वही सबसे मजबूत होते हैं।

प्रैक्टिकल लोग यथार्थ की बात करते हैं। उनका तर्क है कि जीवन केवल भावनाओं से नहीं चलता। लेकिन जब व्यावहारिकता अवसरवाद में बदल जाती है, तब संबंध एक साधन मात्र रह जाते हैं। ज़रूरत तक रिश्ता, सुविधा तक साथ—यही सोच सामाजिक खोखलेपन को जन्म देती है।

सबसे अधिक चिंता का विषय हैं प्रोफेशनल रिश्ते—जहाँ इंसान नहीं, फायदा केंद्र में होता है। यहाँ मुस्कान भी रणनीति होती है और संवाद भी निवेश। जब लाभ समाप्त, तो संबंध समाप्त। यही प्रवृत्ति राजनीति, मीडिया, कॉरपोरेट और यहाँ तक कि सामाजिक संगठनों तक में स्पष्ट दिखती है।

समस्या भावुक, प्रैक्टिकल या प्रोफेशनल होने में नहीं है। समस्या तब पैदा होती है जब भावनाओं का पूरी तरह बहिष्कार कर दिया जाता है। एक स्वस्थ समाज के लिए ज़रूरी है कि व्यावहारिकता में मानवीय संवेदना बनी रहे और पेशेवर अनुशासन में नैतिकता जीवित रहे।

आज ज़रूरत इस बात की है कि हम अपने रिश्तों से यह पूछें—
क्या यह संबंध सिर्फ लाभ के लिए है, या विश्वास के लिए भी?
क्योंकि जो समाज रिश्तों को केवल फायदे से तौलता है, वह अंततः इंसान को भी एक वस्तु बना देता है।

रिश्ते अगर बोझ लगने लगें, तो समझिए हमने भावनाओं को नहीं, इंसानियत को खो दिया है।

“रोज़ नए-नए मार्गों की खोज करना ही जीवन है”—यह केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन है।

“रोज़ नए-नए मार्गों की खोज करना ही जीवन है”—
यह केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन है।

जीवन ठहराव में नहीं, जिज्ञासा में सांस लेता है। जो हर दिन वही रास्ता चलता है, वह सुरक्षित तो रहता है, पर विकसित नहीं होता। नए मार्ग केवल भौगोलिक नहीं होते—वे विचारों के होते हैं, संवेदनाओं के होते हैं, साहस और आत्ममंथन के होते हैं।

नए मार्ग चुनने का अर्थ है प्रश्न करना, जोखिम उठाना और असफलताओं से सीखना। यही प्रक्रिया मनुष्य को साधारण से असाधारण बनाती है। इतिहास गवाह है कि जिन लोगों ने प्रचलित रास्तों से हटकर सोचा, वही परिवर्तन के वाहक बने।

जीवन वास्तव में एक सतत यात्रा है—जहाँ मंज़िल से अधिक महत्वपूर्ण होता है रास्ता, और हर नया रास्ता हमें स्वयं से थोड़ा और परिचित कराता है। इसलिए जीवन को जीना है, तो खोजते रहिए—क्योंकि खोज ही जीवन की सबसे सच्ची पहचान है।

जब खेल संवाद बने और संवेदना कर्म, तब गणतंत्र जीवंत होता है



✍️ विशेष संपादकीय

जब खेल संवाद बने और संवेदना कर्म, तब गणतंत्र जीवंत होता है

77वें गणतंत्र दिवस पर कोटद्वार के राजकीय स्पोर्ट्स स्टेडियम में आयोजित क्रिकेट सद्भावना मैत्री मैच केवल एक खेल आयोजन नहीं था, बल्कि यह उस लोकतांत्रिक चेतना का सार्वजनिक प्रकटीकरण था, जिसकी नींव हमारे संविधान में निहित है। प्रेस क्लब कोटद्वार द्वारा अपने पूर्व अध्यक्ष स्वर्गीय सुधीन्द्र नेगी जी की स्मृति में आयोजित यह आयोजन समाज के विभिन्न वर्गों को एक साझा मंच पर लाने का सार्थक प्रयास रहा।

आज के समय में जब संवाद की जगह अक्सर शोर और टकराव ले लेते हैं, तब वकील, पुलिस, मीडिया और सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों का एक मैदान पर उतरना अपने आप में एक संदेश था—कि असहमति के बावजूद सहअस्तित्व संभव है। खेल के दौरान दिखी प्रतिस्पर्धा मर्यादित रही और यही इस आयोजन की सबसे बड़ी उपलब्धि थी।

ट्रॉफी भले ही बार एसोसिएशन कोटद्वार के हिस्से आई हो, पर वास्तविक जीत उस सौहार्द की रही, जो हर मैच के साथ मजबूत होता गया। ऐसे आयोजन हमें यह भी याद दिलाते हैं कि गणतंत्र केवल अधिकारों का उत्सव नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारियों का संकल्प भी है।

इस पूरे आयोजन को अर्थवत्ता तब मिली, जब खेल के बाद गणतंत्र दिवस के अवसर पर प्रेस क्लब कोटद्वार की ओर से कुष्ठ आश्रम में सेवा का कार्य किया गया। प्रेस क्लब के सचिव दिनेश एवं कार्यकारिणी सदस्यों द्वारा आश्रम में भोजन वितरण कर यह संदेश दिया गया कि लोकतंत्र की असली परीक्षा मैदान या मंच पर नहीं, बल्कि समाज के सबसे उपेक्षित व्यक्ति तक हमारी संवेदना पहुंचने में होती है।

स्वर्गीय सुधीन्द्र नेगी जी की स्मृति में खेला गया यह आयोजन और उसके साथ जुड़ा यह सेवा कार्य, दोनों मिलकर यही कहते हैं कि स्मरण तब सार्थक होता है, जब वह कर्म में ढलता है। गणतंत्र दिवस ऐसे ही प्रयासों से जीवंत बनता है—जहां खेल संवाद बने और संवेदना सामाजिक कर्तव्य।

— दिनेश गुसाईं
(वरिष्ठ पत्रकार )



Saturday, January 24, 2026

मानव शरीर: चलता-फिरता वर्कशॉप



📰 मानव शरीर: चलता-फिरता वर्कशॉप

उपशीर्षक:

कोशिकाओं से अंगों तक, शरीर की अद्भुत रिपेयरिंग मशीन


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🔹 शरीर की सबसे छोटी वर्कशॉप: कोशिकाएं

हर कोशिका में अपने आप को ठीक करने की क्षमता होती है। DNA रिपेयर, प्रोटीन का पुनर्निर्माण, और नष्ट कोशिकाओं की जगह नई कोशिकाओं का निर्माण—यह सब निरंतर होता रहता है।

इन्फोग्राफिक आइडिया: कोशिका + DNA repair enzymes + नई कोशिकाओं का चित्र


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🔹 अंग और ऊतक स्तर की मरम्मत

हड्डियां: टूटी हड्डी नई हड्डियों से जुड़ती है।

त्वचा: कट या घाव स्वतः भर जाता है।

जिगर: अपनी क्षतिग्रस्त हिस्सों को तेजी से पुनर्निर्मित करता है।

हृदय: मरम्मत धीमी लेकिन लगातार होती रहती है।


इन्फोग्राफिक आइडिया: बाहरी घाव और हड्डी रिपेयर की प्रक्रिया का क्रमबद्ध चित्र


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🔹 प्रतिरक्षा प्रणाली: हमारी सुरक्षा तंत्र

घाव या संक्रमण होने पर सफेद रक्त कोशिकाएं तुरंत सक्रिय होती हैं। सूजन, दर्द और ऊतक निर्माण — ये शरीर की मरम्मत प्रक्रिया के संकेत हैं।

इन्फोग्राफिक आइडिया: घाव पर प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया दिखाता एनिमेशन या चरणबद्ध चित्र


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🔹 शरीर = 24×7 ऑटो-रिपेयर मशीन

शरीर की यह वर्कशॉप लगातार चलती रहती है।

इनपुट: पोषण, पानी, ऑक्सीजन, नींद

प्रोसेसिंग: कोशिकाएं, हार्मोन, प्रतिरक्षा प्रणाली

आउटपुट: ऊर्जा, मरम्मत, रोग प्रतिरोध

वेस्ट मैनेजमेंट: किडनी, पसीना, श्वसन


इन्फोग्राफिक आइडिया: शरीर को कारखाना/वर्कशॉप की तरह दिखाना, इनपुट → प्रोसेस → आउटपुट → वेस्ट


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🔹 निष्कर्ष

मानव शरीर एक अद्भुत वर्कशॉप है, जो खुद को लगातार मरम्मत और बनाए रखती है। हमारी जिम्मेदारी है कि इसे सही पोषण, पर्याप्त नींद और मानसिक संतुलन देकर लंबे समय तक स्वस्थ रखा जाए।

 क्योंकि जब शरीर स्वस्थ रहेगा, तभी हम जीवन की चुनौतियों का सामना पूरी ताकत और ऊर्जा के साथ कर पाएंगे।


हम सभी ऊर्जा हैं : कंपन करता हुआ मानव अस्तित्व

हम सभी ऊर्जा हैं : कंपन करता हुआ मानव अस्तित्व

— एक वैचारिक संपादकीय

आधुनिक विज्ञान, दर्शन और आध्यात्म—तीनों आज एक ऐसे बिंदु पर आकर मिलते दिखाई देते हैं, जहाँ मानव को केवल मांस-हड्डियों का ढांचा नहीं, बल्कि ऊर्जा का एक सक्रिय स्रोत माना जा रहा है। यह विचार कि “हम सभी ऊर्जा हैं, जो अलग-अलग आवृत्तियों में कंपन कर रही हैं” अब केवल आध्यात्मिक कल्पना नहीं, बल्कि वैज्ञानिक समझ का भी हिस्सा बनता जा रहा है।

विज्ञान स्पष्ट करता है कि इस ब्रह्मांड में कुछ भी स्थिर नहीं है। परमाणु से लेकर आकाशगंगा तक—सब कुछ गति और कंपन में है। जिसे हम ठोस वस्तु समझते हैं, वह भी सूक्ष्म स्तर पर ऊर्जा तरंगों का ही रूप है। ऐसे में मनुष्य, जो इसी ब्रह्मांड का हिस्सा है, उससे अलग कैसे हो सकता है?

मानव शरीर स्वयं एक जीवित ऊर्जा प्रणाली है। मस्तिष्क की तरंगें, हृदय की विद्युत गतिविधि, तंत्रिका तंत्र में दौड़ते संकेत—ये सभी इस बात का प्रमाण हैं कि हमारा अस्तित्व ऊर्जा के निरंतर प्रवाह पर आधारित है। दिलचस्प तथ्य यह है कि हमारी भावनाएँ और विचार इन ऊर्जा तरंगों को प्रभावित करते हैं। तनाव शरीर को असंतुलित करता है, जबकि शांति और सकारात्मकता ऊर्जा को लयबद्ध बनाती है।

यही कारण है कि कुछ लोगों की उपस्थिति हमें सुकून देती है, तो कुछ स्थानों या परिस्थितियों में बेचैनी महसूस होती है। आम भाषा में जिसे हम “वाइब्स” कहते हैं, वह वास्तव में ऊर्जा के कंपन का ही अनुभव है। यह अनुभव न तो अंधविश्वास है और न ही कोरी कल्पना—बल्कि चेतना की सूक्ष्म समझ है।

भारतीय दर्शन तो सदियों पहले ही कह चुका है—
“अहं ब्रह्मास्मि”
अर्थात मैं वही ब्रह्म हूँ, वही ऊर्जा, वही चेतना। उपनिषदों और योग दर्शन में चेतना को कंपनशील ऊर्जा माना गया है, जिसे साधना, ध्यान और संयम के माध्यम से ऊँचे स्तर तक ले जाया जा सकता है।

आज के समय में, जब समाज तनाव, हिंसा और असंतुलन से जूझ रहा है, यह समझ और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि हम यह स्वीकार कर लें कि हमारे विचार और भावनाएँ केवल निजी नहीं, बल्कि सामूहिक ऊर्जा को प्रभावित करती हैं, तो शायद हम अधिक जिम्मेदार नागरिक और संवेदनशील मनुष्य बन सकें।

विकास का अर्थ केवल भौतिक प्रगति नहीं है। वास्तविक विकास है—
अपनी आंतरिक आवृत्ति को ऊँचा उठाना।
नकारात्मकता से सकारात्मकता की ओर,
डर से समझ की ओर,
और द्वेष से करुणा की ओर।

अंततः, मनुष्य कोई स्थिर इकाई नहीं, बल्कि एक चलती-फिरती ऊर्जा है। सवाल सिर्फ इतना है—
हम किस आवृत्ति पर कंपन कर रहे हैं?

यही प्रश्न हमारे वर्तमान को भी परिभाषित करता है और भविष्य को भी।

न्यूज़ विचार और व्यव्हार

उपग्रह चेतावनी दे रहे हैं, क्या हम सुन रहे हैं?

  उपग्रह चेतावनी दे रहे हैं, क्या हम सुन रहे हैं? उत्तराखंड की हरियाली पर मंडराता जलवायु संकट हिमालय चुप नहीं है—वह बदल रहा है। और यह बदलाव ...