Sunday, September 15, 2024

अंतर्राष्ट्रीय लोकतंत्र दिवस १५ सितम्बर : लोकतंत्र के मूल्यों की पुनर्स्थापना का दिन


प्रत्येक वर्ष 15 सितंबर को अंतर्राष्ट्रीय लोकतंत्र दिवस मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 2007 में इस दिन की स्थापना की, ताकि लोकतंत्र के महत्व को रेखांकित किया जा सके और दुनिया भर में लोकतांत्रिक सिद्धांतों को प्रोत्साहित किया जा सके। यह दिन उन प्रयासों और चुनौतियों की ओर ध्यान आकर्षित करता है, जिनका सामना लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं और संस्थाओं को विश्वभर में करना पड़ता है।


### लोकतंत्र का महत्व


लोकतंत्र केवल एक राजनीतिक व्यवस्था नहीं है, बल्कि यह एक जीवनशैली और विचारधारा है। इसमें नागरिकों को अपनी सरकार चुनने, निर्णय लेने, और अपने अधिकारों के संरक्षण का अवसर मिलता है। लोकतंत्र का आधार है जनसत्ता, जहां प्रत्येक व्यक्ति की आवाज़ को सुना जाता है और सत्ता लोगों की सहमति से चलती है। 


लोकतंत्र न केवल राजनीतिक व्यवस्था को स्थायित्व देता है, बल्कि यह मानवाधिकारों, स्वतंत्रता और समानता की गारंटी भी प्रदान करता है। समाज की प्रगति और विकास के लिए यह आवश्यक है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने विचार और राय व्यक्त करने का अधिकार हो, और उनके मौलिक अधिकारों की रक्षा हो।


### लोकतंत्र की चुनौतियाँ


हालांकि लोकतंत्र एक आदर्श व्यवस्था है, लेकिन इसके सामने कई चुनौतियाँ भी हैं। दुनिया भर में राजनीतिक अस्थिरता, सत्ता का दुरुपयोग, भ्रष्टाचार, असमानता, और अधिकारों का हनन जैसे मुद्दे लोकतंत्र को कमजोर करते हैं। कुछ देशों में तानाशाही, सैन्य शासन या अधिनायकवादी व्यवस्थाएं लोकतंत्र को चुनौती देती हैं। इसके अलावा, आज के डिजिटल युग में, गलत सूचना और सोशल मीडिया के दुरुपयोग से भी लोकतंत्र के लिए खतरे बढ़ गए हैं। 


इन सबके बावजूद, लोकतंत्र को बचाने और मजबूत करने के लिए जनता की जागरूकता, सहभागिता और सशक्तिकरण की आवश्यकता होती है। जागरूक नागरिक और निष्पक्ष संस्थाएँ लोकतंत्र की रक्षा के स्तंभ होते हैं। 


### भारत में लोकतंत्र का स्वरूप


भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, जहां 1950 में संविधान के लागू होने के बाद से नियमित चुनाव होते आ रहे हैं। भारतीय लोकतंत्र में विभिन्न जाति, धर्म, और भाषा के लोग एक साथ मिलकर अपनी सरकार का चुनाव करते हैं। भारत में लोकतंत्र की जड़ें गहरी हैं, लेकिन इसके बावजूद कई सामाजिक और राजनीतिक चुनौतियाँ बनी रहती हैं, जिनसे निपटने के लिए सुधार की आवश्यकता है।


### निष्कर्ष


अंतर्राष्ट्रीय लोकतंत्र दिवस हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ क्या है, और हम इसे कैसे और सशक्त बना सकते हैं। यह एक ऐसा दिन है जब हम अपने समाज और सरकार के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को याद करते हैं और यह सुनिश्चित करते हैं कि हम एक निष्पक्ष, पारदर्शी और समानता पर आधारित व्यवस्था को बनाए रखने के लिए काम करें।


लोकतंत्र की सफलता नागरिकों की जागरूकता, सहभागिता और अधिकारों के प्रति सजगता पर निर्भर करती है। इसलिए, इस दिन हमें यह प्रण लेना चाहिए कि हम न केवल अपने अधिकारों का उपयोग करें, बल्कि अपने कर्तव्यों का भी पालन करें, ताकि एक मजबूत और समृद्ध लोकतंत्र का निर्माण हो सके।

विवेक की खेती ,दुनिया का सबसे उपजाऊ जमीन मनुष्य का मस्तिष्क

 "विवेक की खेती" से तात्पर्य है कि जब हम अपने विचारों और निर्णयों में विवेक, समझदारी और नैतिकता का समावेश करते हैं, तो यह हमें आंतरिक रूप से समृद्ध बनाता है। मनुष्य का मस्तिष्क वास्तव में सबसे उपजाऊ ज़मीन है, क्योंकि इसमें न केवल विचारों और भावनाओं की वृद्धि होती है, बल्कि इससे हमारे कार्य और जीवन के निर्णय भी प्रभावित होते हैं।

जैसे उपजाऊ जमीन में अच्छी फसल उगाने के लिए मेहनत, देखभाल और सही दिशा की आवश्यकता होती है, वैसे ही मनुष्य के मस्तिष्क में विवेक की खेती के लिए सतर्कता, ज्ञान और सही मार्गदर्शन की जरूरत होती है। यह विचार हमें बताता है कि हमारे मस्तिष्क को सही विचारों और मूल्यों से पोषित करना कितना महत्वपूर्ण है।

Saturday, September 14, 2024

क्या होगा अगर उत्तराखंड में पहाड़ों में रोजगार,स्वस्थ्य ,शिक्षा और खेती में उदासीनता आ जाएगी और पलायन बड जायेगा

 यदि उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में रोजगार, स्वास्थ्य, शिक्षा, और खेती के प्रति उदासीनता बढ़ जाती है और पलायन बढ़ने लगता है, तो इसके कई नकारात्मक प्रभाव हो सकते हैं:

1. गांवों का खाली होना और सामाजिक संरचना का टूटना:

  • जनसंख्या घटाव: रोजगार की कमी के कारण लोग बेहतर अवसरों की तलाश में शहरों की ओर पलायन करेंगे, जिससे गांवों की जनसंख्या में कमी आएगी।
  • सामाजिक ढांचा कमजोर होगा: गांवों में बुजुर्ग और महिलाएं रह जाएंगी, जिससे सामुदायिक जीवन कमजोर हो जाएगा और पारंपरिक सामाजिक संरचना टूट जाएगी। यह सामुदायिक संस्थाओं जैसे महिला मंगल दल और युवा मंगल दल के कार्यों पर भी नकारात्मक असर डालेगा।

2. कृषि और स्थानीय संसाधनों की अनदेखी:

  • खेती बर्बाद हो जाएगी: जब लोग गांव छोड़कर जाएंगे, तो खेती और पारंपरिक कृषि गतिविधियां धीमी हो जाएंगी। इससे कृषि उत्पादन कम होगा और स्थानीय अर्थव्यवस्था कमजोर होगी।
  • बंजर भूमि: खेती न होने से जमीन बंजर हो जाएगी, जिससे पर्यावरणीय असंतुलन पैदा हो सकता है, और जलवायु परिवर्तन की समस्या बढ़ सकती है।

3. सांस्कृतिक और पारंपरिक धरोहर का नुकसान:

  • संस्कृति का ह्रास: पहाड़ी क्षेत्रों की समृद्ध सांस्कृतिक और पारंपरिक धरोहर लुप्त हो जाएगी, क्योंकि गांवों में लोग कम हो जाएंगे जो त्योहारों, रिवाजों और अन्य सांस्कृतिक गतिविधियों को जारी रखें।
  • परंपरागत ज्ञान का नुकसान: खेती, हर्बल औषधियों, और पारंपरिक जल प्रबंधन जैसे स्थानीय ज्ञान का नुकसान होगा।

4. पर्यावरणीय प्रभाव:

  • वनों और जल संसाधनों पर दबाव: पहाड़ों में जनसंख्या कम होने से जल और जंगल का सही प्रबंधन नहीं हो पाएगा। इससे जंगलों में आग, भू-स्खलन जैसी समस्याओं में वृद्धि हो सकती है।
  • वन्य जीव संरक्षण पर असर: खाली होते गांवों से प्राकृतिक संतुलन में बदलाव आ सकता है, और वन्यजीवों के रहन-सहन में बाधा उत्पन्न हो सकती है।

5. शहरीकरण की समस्याएं:

  • शहरों पर दबाव बढ़ेगा: पहाड़ों से पलायन करने वाले लोग शहरों में जाकर बसेंगे, जिससे शहरी क्षेत्रों में जनसंख्या दबाव, बेरोजगारी, और बुनियादी सेवाओं की कमी जैसी समस्याएं बढ़ेंगी।
  • असमान विकास: शहरीकरण से आर्थिक और सामाजिक असमानता बढ़ सकती है, जिससे समाज में असंतोष और तनाव उत्पन्न हो सकता है।

6. स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में गिरावट:

  • स्वास्थ्य सेवाओं की अनदेखी: पहाड़ों में प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएं पहले से ही कमजोर हैं। उदासीनता से ये सेवाएं और भी खराब हो जाएंगी, जिससे बीमारी और मृत्यु दर में वृद्धि हो सकती है।
  • शिक्षा की गुणवत्ता में गिरावट: पहाड़ों के स्कूल और शिक्षा संस्थानों में न तो पर्याप्त शिक्षक होंगे और न ही सुविधाएं, जिससे बच्चों का भविष्य अंधकारमय हो सकता है।

7. राजनीतिक और आर्थिक अस्थिरता:

  • असंतोष और आंदोलन: पहाड़ी क्षेत्रों में रोजगार और विकास के अवसरों की कमी के कारण सामाजिक असंतोष और विरोध-प्रदर्शन की स्थिति बन सकती है।
  • आर्थिक रूप से पिछड़ापन: पहाड़ों से पलायन के कारण इन क्षेत्रों का आर्थिक विकास ठप हो जाएगा, जिससे राज्य की समग्र आर्थिक वृद्धि पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

समाधान के सुझाव:

  • स्थानीय रोजगार के अवसर: स्थानीय उद्योगों, पर्यटन, कृषि, और हस्तशिल्प के माध्यम से रोजगार के अवसर उत्पन्न करना आवश्यक है।
  • स्वास्थ्य और शिक्षा में सुधार: पहाड़ी क्षेत्रों में प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं और शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए विशेष योजनाएं लागू करनी चाहिए।
  • कृषि में नवाचार: कृषि में वैज्ञानिक विधियों और तकनीकी नवाचारों को बढ़ावा देना चाहिए ताकि पहाड़ी क्षेत्रों की खेती को समृद्ध बनाया जा सके।
  • सामाजिक संगठनों की भूमिका: स्थानीय संगठनों जैसे महिला मंगल दल और युवा मंगल दल को सक्रिय रूप से शामिल कर सामुदायिक विकास के प्रयासों को बढ़ावा देना होगा।

पलायन रोकने के लिए इन क्षेत्रों में सक्रिय प्रयास जरूरी हैं, ताकि पहाड़ों का समृद्ध सांस्कृतिक, आर्थिक और पर्यावरणीय स्वरूप सुरक्षित रह सके।

भारत की वर्ल्ड हैपिनेस इंडेक्स में पोजिशन और उसको बदलने के तरीके

 2023 में भारत का वर्ल्ड हैपिनेस इंडेक्स (World Happiness Index) में स्थान 126वां था। यह इंडेक्स संयुक्त राष्ट्र की एक पहल है, जो विभिन्न देशों में नागरिकों की खुशी और संतोष का आकलन करती है। यह GDP, सामाजिक समर्थन, जीवन प्रत्याशा, स्वतंत्रता, उदारता, और भ्रष्टाचार की कम दर जैसे कारकों के आधार पर निर्धारित किया जाता है।


भारत की रैंकिंग सुधारने के लिए निम्नलिखित कदम उठाए जा सकते हैं:


1. **आर्थिक विकास**: गरीबी कम करना और सभी वर्गों को आर्थिक विकास में शामिल करना।

2. **स्वास्थ्य सेवाएं**: बेहतर और सुलभ स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करना जिससे जीवन प्रत्याशा और स्वास्थ्य सूचकांक में सुधार हो।

3. **शिक्षा की गुणवत्ता**: उच्च गुणवत्ता की शिक्षा प्रदान कर लोगों के कौशल और रोजगार अवसरों को बढ़ाना।

4. **सामाजिक समर्थन**: समाज में मजबूत समर्थन और भाईचारे की भावना को बढ़ावा देना, जिससे मानसिक स्वास्थ्य में सुधार हो।

5. **भ्रष्टाचार में कमी**: सरकारी और निजी क्षेत्रों में पारदर्शिता और ईमानदारी बढ़ाकर भ्रष्टाचार को कम करना।

6. **स्वतंत्रता और अधिकार**: नागरिकों को अधिक स्वतंत्रता देना और उनके अधिकारों की रक्षा करना।

7. **पर्यावरण संरक्षण**: स्वच्छ पर्यावरण और टिकाऊ विकास की दिशा में काम करना जिससे जीवन की गुणवत्ता में सुधार हो।


इन प्रयासों से देश में समग्र जीवन स्तर में सुधार हो सकता है और भारत की वर्ल्ड हैपिनेस इंडेक्स में रैंकिंग बढ़ सकती है।

Monday, September 9, 2024

पत्रकार और पक्षकार में क्या फर्क है ?



ChatGPTपत्रकार और पक्षकार
  1. पत्रकार (Journalist):

    • पत्रकार का मुख्य उद्देश्य निष्पक्ष और तथ्यात्मक जानकारी देना होता है।
    • वह किसी मुद्दे या घटना को बिना व्यक्तिगत विचार या पूर्वाग्रह के रिपोर्ट करता है।
    • पत्रकारिता का मूल सिद्धांत है जनता को सत्य और सटीक जानकारी प्रदान करना, ताकि लोग स्वयं सही निर्णय ले सकें।
    • पत्रकार तटस्थ होते हैं और किसी राजनीतिक या विचारधारात्मक पक्ष की ओर झुके बिना कार्य करते हैं।
  2. पक्षकार (Partisan):

    • पक्षकार किसी विशेष विचारधारा, राजनीतिक दल या समूह का समर्थन करता है।
    • वह अपनी राय या उस विचारधारा को मजबूती से प्रस्तुत करता है, जिसमें वह विश्वास करता है।
    • पक्षकार का उद्देश्य किसी खास पक्ष को समर्थन देना होता है और वह अक्सर जानकारी को उसी दृष्टिकोण से प्रस्तुत करता है।
    • उसकी रिपोर्टिंग या बयानबाजी में तटस्थता नहीं होती, बल्कि एकतरफा होती है।

सारांश:
पत्रकार तथ्यों पर आधारित और निष्पक्ष जानकारी देते हैं, जबकि पक्षकार किसी खास पक्ष या विचारधारा का समर्थन करते हैं।

दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 (SIPDA)




दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 (Rights of Persons with Disabilities Act, 2016) भारत में दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकारों की सुरक्षा और उनके समग्र विकास के लिए एक महत्वपूर्ण कानून है। इसे अंग्रेजी में RPwD Act

यह अधिनियम पहले के दिव्यांगजन (समान अवसर, अधिकारों का संरक्षण और पूर्ण भागीदारी) अधिनियम, 1995 का स्थान लेता है और 2007 में भारत द्वारा हस्ताक्षरित संयुक्त राष्ट्र के दिव्यांगजन अधिकार कन्वेंशन (UNCRPD) के अनुरूप बनाया गया है। यह अधिनियम दिव्यांगजनों के अधिकारों और कल्याण के लिए एक व्यापक और प्रगतिशील दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है।

दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 (RPwD Act, 2016) की प्रमुख विशेषताएं:

  1. दिव्यांगता की नई परिभाषा और वर्गीकरण:

    • पहले की अपेक्षा, इस अधिनियम में दिव्यांगता की परिभाषा को विस्तारित किया गया है। इसमें दिव्यांगता के कुल 21 प्रकार शामिल किए गए हैं, जबकि 1995 के अधिनियम में केवल 7 प्रकार थे।
    • इसमें शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, और मानसिक बीमारियों से जुड़ी दिव्यांगताएँ शामिल की गई हैं। इनमें प्रमुख प्रकार हैं:
      • मस्कुलर डिस्ट्रॉफी
      • एसिड अटैक के शिकार लोग
      • पार्किंसन डिजीज
      • ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर
      • मल्टीपल स्क्लेरोसिस
      • हीमोफिलिया, थैलेसीमिया
      • सेरेब्रल पाल्सी
      • लोकोमोटर डिसएबिलिटी, आदि
  2. आरक्षण (Reservation):

    • सरकारी नौकरियों में दिव्यांगजनों के लिए आरक्षण 3% से बढ़ाकर 4% कर दिया गया है।
    • शिक्षा संस्थानों में भी दिव्यांगजनों के लिए 5% आरक्षण का प्रावधान किया गया है।
  3. समान अवसर और गैर-भेदभाव:

    • इस अधिनियम के तहत यह सुनिश्चित किया गया है कि दिव्यांग व्यक्तियों के साथ किसी भी तरह का भेदभाव न हो और उन्हें जीवन के सभी क्षेत्रों में समान अवसर मिले।
    • दिव्यांग व्यक्तियों को सभी सार्वजनिक सेवाओं और सुविधाओं तक आसानी से पहुँचने के लिए सार्वजनिक स्थानों को सुगम बनाने का प्रावधान किया गया है। इसे सुगम्य भारत अभियान (Accessible India Campaign) के माध्यम से लागू किया जा रहा है।
  4. शिक्षा का अधिकार:

    • इस अधिनियम के तहत दिव्यांग बच्चों के लिए समावेशी शिक्षा का प्रावधान किया गया है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि दिव्यांग बच्चे सामान्य बच्चों के साथ नियमित स्कूलों में शिक्षा प्राप्त कर सकें।
    • विशेष आवश्यकताओं वाले बच्चों के लिए विशेष शिक्षकों और संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं।
  5. स्वास्थ्य और पुनर्वास:

    • दिव्यांगजनों को स्वास्थ्य सेवाओं तक समान पहुँच सुनिश्चित की गई है। उन्हें सस्ती और सुलभ स्वास्थ्य सेवाएँ प्रदान की जानी हैं।
    • पुनर्वास सेवाएँ और दिव्यांगता के निदान के लिए विशेष केंद्र स्थापित किए गए हैं ताकि उनकी विशेष जरूरतों को पूरा किया जा सके।
  6. सुरक्षा और अधिकारों का संरक्षण:

    • दिव्यांग व्यक्तियों के खिलाफ किसी भी प्रकार की हिंसा, दुर्व्यवहार, या भेदभाव को रोकने के लिए कड़े प्रावधान किए गए हैं।
    • राज्य सरकारों को यह सुनिश्चित करना होगा कि दिव्यांगजनों के अधिकारों का हनन न हो और उनके लिए विशेष अदालतें भी स्थापित की जा सकें।
  7. आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा:

    • दिव्यांग व्यक्तियों को सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के माध्यम से वित्तीय सहायता प्रदान की जाएगी। उनके लिए विशेष रूप से अनुकूलित सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा योजनाओं को लागू करने का प्रावधान किया गया है।
    • दिव्यांगजनों को स्वरोजगार, प्रशिक्षण और कौशल विकास के अवसर प्रदान किए जाएंगे ताकि वे आत्मनिर्भर बन सकें।
  8. राष्ट्रीय और राज्य आयोग का गठन:

    • दिव्यांगजनों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए एक राष्ट्रीय आयोग और राज्य स्तर पर आयोग गठित किए जाएंगे। ये आयोग उनकी शिकायतों को सुनने, उनके अधिकारों की रक्षा करने और जागरूकता फैलाने का काम करेंगे।

SIPDA (Scheme for Implementation of Persons with Disabilities Act):

SIPDA इस अधिनियम के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए एक योजना है। इसका उद्देश्य दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 के तहत विभिन्न योजनाओं और नीतियों को लागू करना है। इसके अंतर्गत विभिन्न उपाय और योजनाएँ लागू की जाती हैं, जैसे:

  1. सुगम्य भारत अभियान: इस योजना के तहत सार्वजनिक भवनों, परिवहन, और अन्य बुनियादी सुविधाओं को दिव्यांगजनों के लिए सुगम बनाने के उपाय किए जाते हैं।
  2. टेक्नोलॉजी का उपयोग: दिव्यांगजनों के लिए सहायक उपकरण और तकनीकी उपकरणों का विकास और वितरण।
  3. प्रशिक्षण और पुनर्वास: दिव्यांग व्यक्तियों के लिए रोजगार के अवसरों को बढ़ाने के लिए प्रशिक्षण और पुनर्वास कार्यक्रमों का आयोजन।
  4. स्वास्थ्य और पुनर्वास केंद्र: दिव्यांगजनों की विशेष स्वास्थ्य सेवाओं और पुनर्वास के लिए केंद्रों की स्थापना।

निष्कर्ष:

दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 और SIPDA योजना का उद्देश्य भारत में दिव्यांग व्यक्तियों को उनके अधिकारों की सुरक्षा और उन्हें समाज में मुख्यधारा से जोड़ने के लिए आवश्यक संसाधन, सुविधाएँ और अवसर प्रदान करना है। यह अधिनियम समावेशी समाज की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जहाँ हर व्यक्ति को समान अधिकार और अवसर मिलें।

देश में मूल निवास की व्यवस्था कब से है



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मूल निवास की व्यवस्था के ऐतिहासिक संदर्भ:

  1. ब्रिटिश काल: ब्रिटिश शासन के दौरान विभिन्न राज्यों और रियासतों में निवास स्थान के आधार पर कुछ विशेषाधिकार दिए जाते थे। लेकिन यह व्यवस्था मुख्य रूप से शासकों के अधिकारों और स्थानीय शासन की आवश्यकताओं पर आधारित थी।

  2. भारतीय संविधान (1950): भारतीय संविधान लागू होने के बाद, भारत एक संघीय ढांचे में बंटा और राज्यों को अपने नागरिकों के लिए मूल निवास प्रमाणपत्र जारी करने का अधिकार दिया गया। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि राज्यों के स्थायी निवासियों को सरकारी सेवाओं, नौकरियों, और शैक्षणिक संस्थानों में कुछ विशेष लाभ मिल सकें।

  3. राज्यों के विशेष अधिकार: संविधान के अनुच्छेद 16(3) के तहत, संसद को यह अधिकार दिया गया कि वह कुछ पदों और नौकरियों में नियुक्ति के लिए निवास स्थान से संबंधित कानून बना सके। इसके अलावा, अनुच्छेद 19(1)(e) के तहत भारतीय नागरिकों को देश में कहीं भी बसने और काम करने का अधिकार दिया गया है, लेकिन राज्यों के पास निवास प्रमाणपत्र जारी करने का अधिकार बना रहता है।

  4. विभिन्न राज्यों की नीतियाँ: आजादी के बाद, विभिन्न राज्यों ने अपने-अपने निवासियों को लाभ देने के लिए मूल निवास की व्यवस्था को अपनाया। प्रत्येक राज्य ने इसके लिए अपनी अलग-अलग पात्रता शर्तें बनाई हैं, जैसे कि कितने साल राज्य में निवास किया गया हो, संपत्ति का स्वामित्व, या अन्य प्रमाण जो किसी व्यक्ति की स्थायी नागरिकता को साबित करें।

मूल निवास प्रमाणपत्र की वर्तमान व्यवस्था राज्य-विशिष्ट है, और हर राज्य इसके लिए अलग-अलग नियम और शर्तें निर्धारित करता है। इसका उद्देश्य स्थानीय निवासियों को शिक्षा, रोजगार, और सरकारी योजनाओं में प्राथमिकता देना है।

न्यूज़ विचार और व्यव्हार

जब मीडिया सत्ता की ढाल बने, तब जनता की पत्रकारिता ज़रूरी

जब मीडिया सत्ता की ढाल बने, तब जनता की पत्रकारिता ज़रूरी लोकतंत्र के चार स्तंभों में मीडिया को इसलिए जगह दी गई थी ताकि वह सत्ता पर निगरानी र...