मूल निवास की व्यवस्था के ऐतिहासिक संदर्भ:
ब्रिटिश काल: ब्रिटिश शासन के दौरान विभिन्न राज्यों और रियासतों में निवास स्थान के आधार पर कुछ विशेषाधिकार दिए जाते थे। लेकिन यह व्यवस्था मुख्य रूप से शासकों के अधिकारों और स्थानीय शासन की आवश्यकताओं पर आधारित थी।
भारतीय संविधान (1950): भारतीय संविधान लागू होने के बाद, भारत एक संघीय ढांचे में बंटा और राज्यों को अपने नागरिकों के लिए मूल निवास प्रमाणपत्र जारी करने का अधिकार दिया गया। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि राज्यों के स्थायी निवासियों को सरकारी सेवाओं, नौकरियों, और शैक्षणिक संस्थानों में कुछ विशेष लाभ मिल सकें।
राज्यों के विशेष अधिकार: संविधान के अनुच्छेद 16(3) के तहत, संसद को यह अधिकार दिया गया कि वह कुछ पदों और नौकरियों में नियुक्ति के लिए निवास स्थान से संबंधित कानून बना सके। इसके अलावा, अनुच्छेद 19(1)(e) के तहत भारतीय नागरिकों को देश में कहीं भी बसने और काम करने का अधिकार दिया गया है, लेकिन राज्यों के पास निवास प्रमाणपत्र जारी करने का अधिकार बना रहता है।
विभिन्न राज्यों की नीतियाँ: आजादी के बाद, विभिन्न राज्यों ने अपने-अपने निवासियों को लाभ देने के लिए मूल निवास की व्यवस्था को अपनाया। प्रत्येक राज्य ने इसके लिए अपनी अलग-अलग पात्रता शर्तें बनाई हैं, जैसे कि कितने साल राज्य में निवास किया गया हो, संपत्ति का स्वामित्व, या अन्य प्रमाण जो किसी व्यक्ति की स्थायी नागरिकता को साबित करें।
मूल निवास प्रमाणपत्र की वर्तमान व्यवस्था राज्य-विशिष्ट है, और हर राज्य इसके लिए अलग-अलग नियम और शर्तें निर्धारित करता है। इसका उद्देश्य स्थानीय निवासियों को शिक्षा, रोजगार, और सरकारी योजनाओं में प्राथमिकता देना है।
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