Saturday, September 21, 2024

विवेक की खेती ,दुनिया का सबसे उपजाऊ जमीन मनुष्य का मस्तिष्क

 

जैसे उपजाऊ जमीन में अच्छी फसल उगाने के लिए मेहनत, देखभाल और सही दिशा की आवश्यकता होती है, वैसे ही मनुष्य के मस्तिष्क में विवेक की खेती के लिए सतर्कता, ज्ञान और सही मार्गदर्शन की जरूरत होती है। यह विचार हमें बताता है कि हमारे मस्तिष्क को सही विचारों और मूल्यों से पोषित करना कितना महत्वपूर्ण है।

**मीठा झूठ**



सूरज अपनी लालिमा बिखेरते हुए धीरे-धीरे पहाड़ियों के पीछे छिप रहा था। गाँव के छोटे से मकान की छत पर बैठी आर्या आसमान में बदलते रंगों को देख रही थी। उसके मन में एक अजीब सी बेचैनी थी। आज वो अपने जीवन के सबसे बड़े निर्णय का सामना कर रही थी, और उस निर्णय का आधार था—एक मीठा झूठ।


आर्या का बचपन इस छोटे से पहाड़ी गाँव में बीता था। उसके पिता, रमेश, गाँव के सबसे ईमानदार और नेक इंसान थे। उन्होंने उसे सिखाया था कि सत्य हमेशा सबसे बड़ा होता है। लेकिन आज की परिस्थिति में सत्य को अपनाना आर्या के लिए मुश्किल हो रहा था। 


दो साल पहले आर्या की मुलाकात समीर से हुई थी। समीर शहर का एक अमीर और प्रतिष्ठित व्यवसायी था। उनकी मुलाकातें धीरे-धीरे दोस्ती में बदल गईं और फिर वो दोस्ती प्यार में बदल गई। समीर ने आर्या से शादी का वादा किया और उसके भविष्य के सपनों को नई उड़ान दी। लेकिन कुछ दिन पहले समीर ने उसे बताया कि उसकी शादी उसके परिवार द्वारा तय की जा चुकी है, और वह उस रिश्ते को तोड़ने की स्थिति में नहीं है। आर्या का दिल टूट गया, लेकिन समीर ने उसे कहा, "मैं तुमसे प्यार करता हूँ, पर मैं अपने परिवार को दुखी नहीं कर सकता।"


आर्या को समझ नहीं आ रहा था कि वो क्या करे। गाँव में उसकी शादी की बातें हो रही थीं, और उसके माता-पिता भी उसकी शादी के लिए उत्साहित थे। लेकिन उसका दिल अभी भी समीर के प्यार में उलझा हुआ था। उसे सच बताकर अपने माता-पिता की उम्मीदें तोड़नी नहीं थी, लेकिन झूठ बोलकर वो खुद को भी धोखा नहीं देना चाहती थी।


उसने अंततः एक निर्णय लिया। उसने अपने माता-पिता से कहा, "मुझे शहर में नौकरी मिल गई है, और मैं वहाँ जाकर कुछ साल काम करना चाहती हूँ।" यह सुनकर उसके माता-पिता खुश हो गए, उन्हें लगा कि उनकी बेटी शहर में नाम कमाएगी। 


असल में, आर्या ने शहर जाने का फैसला इसलिए किया ताकि वह खुद को समीर से दूर कर सके और अपनी जिंदगी को नए सिरे से शुरू कर सके। उसने झूठ तो बोला था, लेकिन वह झूठ किसी को ठेस पहुँचाने के लिए नहीं, बल्कि अपने दिल के घावों को भरने के लिए था।


शहर में उसने एक नई जिंदगी शुरू की। धीरे-धीरे वह अपने पुराने दर्द को पीछे छोड़ने लगी। उसने खुद को समझाया कि कभी-कभी मीठे झूठ भी जरूरी होते हैं, ताकि हम अपनी ज़िंदगी में आगे बढ़ सकें।


समय बीतता गया, और आर्या ने अपने जीवन को नए सिरे से जीना सीखा। उसके मीठे झूठ ने न केवल उसके माता-पिता को खुश रखा, बल्कि उसे भी एक नई दिशा दी।


सूरज की अंतिम किरणें जब आसमान से ओझल हो गईं, आर्या के मन का बोझ भी धीरे-धीरे हल्का हो गया। झूठ तो उसने बोला था, पर उस झूठ ने उसकी ज़िंदगी को फिर से संवारने में मदद की।

Monday, September 16, 2024

लत सिर्फ एक आदत नहीं, बल्कि एक जटिल बीमारी है,किसी भी प्रकार की लत को अक्सर मानसिक विकलांगता या बीमारी के रूप में देखा जाता है ।

 किसी भी प्रकार की लत को अक्सर मानसिक विकलांगता या बीमारी के रूप में देखा जाता है, क्योंकि यह व्यक्ति की मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव डालती है। लत को **"एडिक्शन"** (Addiction) के रूप में भी जाना जाता है, और यह एक **मनोवैज्ञानिक विकार** है, जिसमें व्यक्ति किसी विशेष व्यवहार या पदार्थ के प्रति अत्यधिक आसक्ति विकसित कर लेता है। 


### लत और मानसिक विकलांगता का संबंध:


1. **मस्तिष्क में रासायनिक बदलाव:**

   - लत का सीधा संबंध मस्तिष्क में रासायनिक परिवर्तन से होता है। जब कोई व्यक्ति नशीले पदार्थों या लतकारी व्यवहार (जैसे, जुआ, इंटरनेट, गेमिंग, सोशल मीडिया) में शामिल होता है, तो मस्तिष्क में डोपामाइन और अन्य न्यूरोट्रांसमीटर का असामान्य स्राव होता है। यह अस्थाई रूप से सुख का अनुभव कराता है, लेकिन धीरे-धीरे यह एक आदत बन जाती है।

   

2. **नियंत्रण की कमी:**

   - लत के कारण व्यक्ति अपनी इच्छाशक्ति पर नियंत्रण खो देता है। उसे पता होता है कि यह आदत नुकसानदेह है, फिर भी वह इसे छोड़ नहीं पाता। इसका कारण यह है कि मस्तिष्क बार-बार उस पदार्थ या व्यवहार को दोहराने के लिए प्रेरित करता है।


3. **भावनात्मक और मानसिक असर:**

   - लत का शिकार व्यक्ति मानसिक और भावनात्मक रूप से कमजोर हो जाता है। वह अकेलापन, चिंता, अवसाद, और आत्म-सम्मान की कमी जैसी मानसिक समस्याओं का सामना करता है। लत उसकी सामाजिक और व्यक्तिगत ज़िम्मेदारियों पर भी नकारात्मक प्रभाव डालती है।


4. **व्यवहारिक विकार:**

   - लत व्यक्ति के सामान्य व्यवहार में बदलाव लाती है। जैसे, चिड़चिड़ापन, क्रोध, असंतुलन, सामाजिक दूरी, और कभी-कभी आक्रामकता। ये मानसिक विकलांगता के लक्षण हो सकते हैं, जिनका इलाज जरूरी होता है।


### लत का उपचार:


1. **मनोचिकित्सा (Psychotherapy):**

   - **संज्ञानात्मक-व्यवहार थेरेपी (Cognitive Behavioral Therapy)** जैसे उपचार लत को समझने और उससे निपटने में मदद करते हैं। यह व्यक्ति की नकारात्मक सोच और व्यवहार को पहचानने और बदलने में मदद करता है।


2. **मेडिकल उपचार:**

   - कुछ मामलों में, डॉक्टर मानसिक विकारों और लत के लिए औषधि लिख सकते हैं। यह मस्तिष्क के रासायनिक संतुलन को बहाल करने में मदद करता है और व्यक्ति की लत से मुक्ति की प्रक्रिया को आसान बनाता है।


3. **पुनर्वास केंद्र (Rehabilitation Centers):**

   - लत के गंभीर मामलों में पुनर्वास केंद्रों की सहायता ली जाती है, जहां व्यक्तियों को संरक्षित और सहायक वातावरण में उपचार दिया जाता है।


4. **सहयोग समूह (Support Groups):**

   - कई सहयोगी समूह, जैसे **Alcoholics Anonymous (AA)** और **Narcotics Anonymous (NA)**, लत से जूझ रहे व्यक्तियों को सामुदायिक समर्थन प्रदान करते हैं।


### मानसिक विकलांगता के रूप में लत की मान्यता:


वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (WHO) और अमेरिकन साइकियाट्रिक एसोसिएशन (APA) के अनुसार, लत एक **मनोवैज्ञानिक विकार** है और इसे मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं की श्रेणी में रखा गया है। इसका उपचार मानसिक और शारीरिक दोनों स्तरों पर किया जाता है। 


लत सिर्फ एक आदत नहीं, बल्कि एक जटिल बीमारी है, जिसमें मानसिक, शारीरिक, और सामाजिक कारकों का मिश्रण होता है। इससे निपटने के लिए पेशेवर मदद और सामाजिक समर्थन की आवश्यकता होती है।

उत्तराखंड विक्टिम कम्पेंसेशन स्कीम

 उत्तराखंड सरकार ने कहा है कि वह एसिड अटैक की पीड़िताओं को 5 से 6 हजार रुपए महीने तक की पेंशन देगी,पंजाब सरकार ने जून 2017 में एसिड पीड़ितों को 8 हजार रुपए पेंशन देने की घोषणा करते हुए नोटिफिकेशन जारी किया था

यह स्कीम एसिड पीड़ितों कोआर्थिक रूप से सुरक्षित और स्वावलंबी बनने में मिलेगी मदद।

उत्तराखंड में करीब 10 से 11 एसिड अटैक की पीड़िताएं मौजूद हैं, जिनको आर्थिक रूप से सुरक्षित बनाने के लिए राज्य सरकार ने ये फैसला लिया है।

एसिड अटैक उत्तराखंड सहित पूरे भारत में एक गंभीर अपराध है, और इससे पीड़ित व्यक्तियों की सहायता और पुनर्वास के लिए विभिन्न नीतियां और कानून लागू किए गए हैं। उत्तराखंड सरकार और भारत सरकार, दोनों स्तरों पर एसिड अटैक पीड़ितों के समर्थन के लिए निम्नलिखित प्रमुख पहलें की गई हैं: ### 1. **कानूनी सहायता और मुआवजा:** - **क्रिमिनल लॉ अमेंडमेंट एक्ट, 2013** के तहत, एसिड अटैक को गंभीर अपराध के रूप में परिभाषित किया गया है। दोषियों के खिलाफ सख्त सजा का प्रावधान है, जिसमें न्यूनतम 10 साल की कैद हो सकती है, और यह सजा उम्रकैद तक बढ़ाई जा सकती है। - पीड़ितों को तुरंत और समय पर मुआवजा प्रदान करने के लिए **उत्तराखंड विक्टिम कम्पेंसेशन स्कीम** लागू की गई है। मुआवजे की राशि का निर्धारण राज्य सरकार द्वारा किया जाता है, और यह पीड़ित की चिकित्सा और पुनर्वास के लिए होती है। ### 2. **मेडिकल सहायता:** - पीड़ितों को मुफ्त और समय पर चिकित्सा सुविधाएं प्रदान करने के लिए सरकार द्वारा अस्पतालों और मेडिकल संस्थानों को निर्देशित किया गया है। उत्तराखंड सरकार ने यह सुनिश्चित किया है कि सरकारी और कुछ निजी अस्पताल एसिड अटैक पीड़ितों का मुफ्त इलाज करें। - पीड़ितों को विशेष प्लास्टिक सर्जरी और दीर्घकालिक चिकित्सा देखभाल की सुविधा दी जाती है। ### 3. **पुनर्वास और रोजगार:** - एसिड अटैक पीड़ितों के पुनर्वास के लिए **कौशल विकास कार्यक्रम** चलाए जाते हैं, ताकि उन्हें आत्मनिर्भर बनाया जा सके। इसके तहत उन्हें रोजगार देने के लिए विभिन्न सरकारी योजनाओं से जोड़ा जाता है। - पीड़ितों के लिए **रिजर्वेशन** का प्रावधान भी किया गया है, जिससे वे सरकारी नौकरियों में भाग ले सकें और सामान्य जीवन जी सकें। ### 4. **एसिड की बिक्री पर नियंत्रण:** - एसिड की बिक्री पर सख्त नियंत्रण के लिए **Poison Act, 1919** के तहत नियम बनाए गए हैं। उत्तराखंड सरकार ने निर्देश जारी किए हैं कि एसिड केवल उन्हीं दुकानों पर बेचा जाए, जिनके पास वैध लाइसेंस हो। - एसिड खरीदने के लिए पहचान प्रमाण और कारण बताना अनिवार्य है, और प्रत्येक बिक्री का रिकॉर्ड रखना होता है। ### 5. **समाजिक जागरूकता और सिविल सोसाइटी की भागीदारी:** - राज्य सरकार के साथ कई गैर सरकारी संगठन (NGOs) और सामाजिक संगठन एसिड अटैक पीड़ितों की सहायता के लिए कार्य कर रहे हैं। वे पीड़ितों के अधिकारों की रक्षा, मानसिक स्वास्थ्य सेवा, और समाज में पुन: एकीकरण के लिए प्रयास करते हैं। - **उत्तराखंड महिला आयोग** और अन्य महिला संगठन पीड़ितों की सुरक्षा और पुनर्वास के लिए सक्रिय हैं, और जागरूकता अभियान चलाते हैं ताकि ऐसे हमलों को रोका जा सके। उत्तराखंड में एसिड अटैक पीड़ितों के लिए सरकार द्वारा किए गए ये प्रयास और नीतियां इस सामाजिक अपराध को रोकने और पीड़ितों को न्याय दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

Sunday, September 15, 2024

अंतर्राष्ट्रीय लोकतंत्र दिवस १५ सितम्बर : लोकतंत्र के मूल्यों की पुनर्स्थापना का दिन


प्रत्येक वर्ष 15 सितंबर को अंतर्राष्ट्रीय लोकतंत्र दिवस मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 2007 में इस दिन की स्थापना की, ताकि लोकतंत्र के महत्व को रेखांकित किया जा सके और दुनिया भर में लोकतांत्रिक सिद्धांतों को प्रोत्साहित किया जा सके। यह दिन उन प्रयासों और चुनौतियों की ओर ध्यान आकर्षित करता है, जिनका सामना लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं और संस्थाओं को विश्वभर में करना पड़ता है।


### लोकतंत्र का महत्व


लोकतंत्र केवल एक राजनीतिक व्यवस्था नहीं है, बल्कि यह एक जीवनशैली और विचारधारा है। इसमें नागरिकों को अपनी सरकार चुनने, निर्णय लेने, और अपने अधिकारों के संरक्षण का अवसर मिलता है। लोकतंत्र का आधार है जनसत्ता, जहां प्रत्येक व्यक्ति की आवाज़ को सुना जाता है और सत्ता लोगों की सहमति से चलती है। 


लोकतंत्र न केवल राजनीतिक व्यवस्था को स्थायित्व देता है, बल्कि यह मानवाधिकारों, स्वतंत्रता और समानता की गारंटी भी प्रदान करता है। समाज की प्रगति और विकास के लिए यह आवश्यक है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने विचार और राय व्यक्त करने का अधिकार हो, और उनके मौलिक अधिकारों की रक्षा हो।


### लोकतंत्र की चुनौतियाँ


हालांकि लोकतंत्र एक आदर्श व्यवस्था है, लेकिन इसके सामने कई चुनौतियाँ भी हैं। दुनिया भर में राजनीतिक अस्थिरता, सत्ता का दुरुपयोग, भ्रष्टाचार, असमानता, और अधिकारों का हनन जैसे मुद्दे लोकतंत्र को कमजोर करते हैं। कुछ देशों में तानाशाही, सैन्य शासन या अधिनायकवादी व्यवस्थाएं लोकतंत्र को चुनौती देती हैं। इसके अलावा, आज के डिजिटल युग में, गलत सूचना और सोशल मीडिया के दुरुपयोग से भी लोकतंत्र के लिए खतरे बढ़ गए हैं। 


इन सबके बावजूद, लोकतंत्र को बचाने और मजबूत करने के लिए जनता की जागरूकता, सहभागिता और सशक्तिकरण की आवश्यकता होती है। जागरूक नागरिक और निष्पक्ष संस्थाएँ लोकतंत्र की रक्षा के स्तंभ होते हैं। 


### भारत में लोकतंत्र का स्वरूप


भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, जहां 1950 में संविधान के लागू होने के बाद से नियमित चुनाव होते आ रहे हैं। भारतीय लोकतंत्र में विभिन्न जाति, धर्म, और भाषा के लोग एक साथ मिलकर अपनी सरकार का चुनाव करते हैं। भारत में लोकतंत्र की जड़ें गहरी हैं, लेकिन इसके बावजूद कई सामाजिक और राजनीतिक चुनौतियाँ बनी रहती हैं, जिनसे निपटने के लिए सुधार की आवश्यकता है।


### निष्कर्ष


अंतर्राष्ट्रीय लोकतंत्र दिवस हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ क्या है, और हम इसे कैसे और सशक्त बना सकते हैं। यह एक ऐसा दिन है जब हम अपने समाज और सरकार के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को याद करते हैं और यह सुनिश्चित करते हैं कि हम एक निष्पक्ष, पारदर्शी और समानता पर आधारित व्यवस्था को बनाए रखने के लिए काम करें।


लोकतंत्र की सफलता नागरिकों की जागरूकता, सहभागिता और अधिकारों के प्रति सजगता पर निर्भर करती है। इसलिए, इस दिन हमें यह प्रण लेना चाहिए कि हम न केवल अपने अधिकारों का उपयोग करें, बल्कि अपने कर्तव्यों का भी पालन करें, ताकि एक मजबूत और समृद्ध लोकतंत्र का निर्माण हो सके।

विवेक की खेती ,दुनिया का सबसे उपजाऊ जमीन मनुष्य का मस्तिष्क

 "विवेक की खेती" से तात्पर्य है कि जब हम अपने विचारों और निर्णयों में विवेक, समझदारी और नैतिकता का समावेश करते हैं, तो यह हमें आंतरिक रूप से समृद्ध बनाता है। मनुष्य का मस्तिष्क वास्तव में सबसे उपजाऊ ज़मीन है, क्योंकि इसमें न केवल विचारों और भावनाओं की वृद्धि होती है, बल्कि इससे हमारे कार्य और जीवन के निर्णय भी प्रभावित होते हैं।

जैसे उपजाऊ जमीन में अच्छी फसल उगाने के लिए मेहनत, देखभाल और सही दिशा की आवश्यकता होती है, वैसे ही मनुष्य के मस्तिष्क में विवेक की खेती के लिए सतर्कता, ज्ञान और सही मार्गदर्शन की जरूरत होती है। यह विचार हमें बताता है कि हमारे मस्तिष्क को सही विचारों और मूल्यों से पोषित करना कितना महत्वपूर्ण है।

Saturday, September 14, 2024

क्या होगा अगर उत्तराखंड में पहाड़ों में रोजगार,स्वस्थ्य ,शिक्षा और खेती में उदासीनता आ जाएगी और पलायन बड जायेगा

 यदि उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में रोजगार, स्वास्थ्य, शिक्षा, और खेती के प्रति उदासीनता बढ़ जाती है और पलायन बढ़ने लगता है, तो इसके कई नकारात्मक प्रभाव हो सकते हैं:

1. गांवों का खाली होना और सामाजिक संरचना का टूटना:

  • जनसंख्या घटाव: रोजगार की कमी के कारण लोग बेहतर अवसरों की तलाश में शहरों की ओर पलायन करेंगे, जिससे गांवों की जनसंख्या में कमी आएगी।
  • सामाजिक ढांचा कमजोर होगा: गांवों में बुजुर्ग और महिलाएं रह जाएंगी, जिससे सामुदायिक जीवन कमजोर हो जाएगा और पारंपरिक सामाजिक संरचना टूट जाएगी। यह सामुदायिक संस्थाओं जैसे महिला मंगल दल और युवा मंगल दल के कार्यों पर भी नकारात्मक असर डालेगा।

2. कृषि और स्थानीय संसाधनों की अनदेखी:

  • खेती बर्बाद हो जाएगी: जब लोग गांव छोड़कर जाएंगे, तो खेती और पारंपरिक कृषि गतिविधियां धीमी हो जाएंगी। इससे कृषि उत्पादन कम होगा और स्थानीय अर्थव्यवस्था कमजोर होगी।
  • बंजर भूमि: खेती न होने से जमीन बंजर हो जाएगी, जिससे पर्यावरणीय असंतुलन पैदा हो सकता है, और जलवायु परिवर्तन की समस्या बढ़ सकती है।

3. सांस्कृतिक और पारंपरिक धरोहर का नुकसान:

  • संस्कृति का ह्रास: पहाड़ी क्षेत्रों की समृद्ध सांस्कृतिक और पारंपरिक धरोहर लुप्त हो जाएगी, क्योंकि गांवों में लोग कम हो जाएंगे जो त्योहारों, रिवाजों और अन्य सांस्कृतिक गतिविधियों को जारी रखें।
  • परंपरागत ज्ञान का नुकसान: खेती, हर्बल औषधियों, और पारंपरिक जल प्रबंधन जैसे स्थानीय ज्ञान का नुकसान होगा।

4. पर्यावरणीय प्रभाव:

  • वनों और जल संसाधनों पर दबाव: पहाड़ों में जनसंख्या कम होने से जल और जंगल का सही प्रबंधन नहीं हो पाएगा। इससे जंगलों में आग, भू-स्खलन जैसी समस्याओं में वृद्धि हो सकती है।
  • वन्य जीव संरक्षण पर असर: खाली होते गांवों से प्राकृतिक संतुलन में बदलाव आ सकता है, और वन्यजीवों के रहन-सहन में बाधा उत्पन्न हो सकती है।

5. शहरीकरण की समस्याएं:

  • शहरों पर दबाव बढ़ेगा: पहाड़ों से पलायन करने वाले लोग शहरों में जाकर बसेंगे, जिससे शहरी क्षेत्रों में जनसंख्या दबाव, बेरोजगारी, और बुनियादी सेवाओं की कमी जैसी समस्याएं बढ़ेंगी।
  • असमान विकास: शहरीकरण से आर्थिक और सामाजिक असमानता बढ़ सकती है, जिससे समाज में असंतोष और तनाव उत्पन्न हो सकता है।

6. स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में गिरावट:

  • स्वास्थ्य सेवाओं की अनदेखी: पहाड़ों में प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएं पहले से ही कमजोर हैं। उदासीनता से ये सेवाएं और भी खराब हो जाएंगी, जिससे बीमारी और मृत्यु दर में वृद्धि हो सकती है।
  • शिक्षा की गुणवत्ता में गिरावट: पहाड़ों के स्कूल और शिक्षा संस्थानों में न तो पर्याप्त शिक्षक होंगे और न ही सुविधाएं, जिससे बच्चों का भविष्य अंधकारमय हो सकता है।

7. राजनीतिक और आर्थिक अस्थिरता:

  • असंतोष और आंदोलन: पहाड़ी क्षेत्रों में रोजगार और विकास के अवसरों की कमी के कारण सामाजिक असंतोष और विरोध-प्रदर्शन की स्थिति बन सकती है।
  • आर्थिक रूप से पिछड़ापन: पहाड़ों से पलायन के कारण इन क्षेत्रों का आर्थिक विकास ठप हो जाएगा, जिससे राज्य की समग्र आर्थिक वृद्धि पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

समाधान के सुझाव:

  • स्थानीय रोजगार के अवसर: स्थानीय उद्योगों, पर्यटन, कृषि, और हस्तशिल्प के माध्यम से रोजगार के अवसर उत्पन्न करना आवश्यक है।
  • स्वास्थ्य और शिक्षा में सुधार: पहाड़ी क्षेत्रों में प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं और शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए विशेष योजनाएं लागू करनी चाहिए।
  • कृषि में नवाचार: कृषि में वैज्ञानिक विधियों और तकनीकी नवाचारों को बढ़ावा देना चाहिए ताकि पहाड़ी क्षेत्रों की खेती को समृद्ध बनाया जा सके।
  • सामाजिक संगठनों की भूमिका: स्थानीय संगठनों जैसे महिला मंगल दल और युवा मंगल दल को सक्रिय रूप से शामिल कर सामुदायिक विकास के प्रयासों को बढ़ावा देना होगा।

पलायन रोकने के लिए इन क्षेत्रों में सक्रिय प्रयास जरूरी हैं, ताकि पहाड़ों का समृद्ध सांस्कृतिक, आर्थिक और पर्यावरणीय स्वरूप सुरक्षित रह सके।

न्यूज़ विचार और व्यव्हार

जब मीडिया सत्ता की ढाल बने, तब जनता की पत्रकारिता ज़रूरी

जब मीडिया सत्ता की ढाल बने, तब जनता की पत्रकारिता ज़रूरी लोकतंत्र के चार स्तंभों में मीडिया को इसलिए जगह दी गई थी ताकि वह सत्ता पर निगरानी र...