Thursday, October 10, 2024

क्या शराब भारतीय सरकार की नज़र में नशा है

 हां, भारतीय सरकार की नज़र में शराब एक नशा है, लेकिन इसे एक कानूनी रूप से नियंत्रित पदार्थ के रूप में वर्गीकृत किया गया है। इसका मतलब है कि शराब का उत्पादन, बिक्री और उपयोग सरकार द्वारा नियंत्रित और लाइसेंस प्राप्त है, और इसके उपभोग के लिए कानूनी उम्र तय की गई है।

शराब और नशे के संदर्भ में भारतीय सरकार का दृष्टिकोण:

  1. कानूनी स्थिति: भारत में शराब की बिक्री और सेवन वैध है, लेकिन यह राज्य सरकारों के नियमन के तहत आता है। हर राज्य में शराब पर अलग-अलग कानून होते हैं। कुछ राज्यों में शराब पर पूरी तरह से प्रतिबंध है, जैसे गुजरात, बिहार, मणिपुर, और नागालैंड, जहां शराब का उत्पादन, बिक्री और उपभोग अवैध है।

  2. नियंत्रण और लाइसेंस: शराब की बिक्री के लिए विशेष लाइसेंस की आवश्यकता होती है, और इसे केवल लाइसेंस प्राप्त दुकानों, होटलों, या बार में ही बेचा जा सकता है। शराब का सेवन केवल तय की गई कानूनी उम्र (जो अलग-अलग राज्यों में भिन्न हो सकती है, जैसे 18 से 25 वर्ष के बीच) के बाद ही किया जा सकता है।

  3. स्वास्थ्य और सामाजिक प्रभाव: भारतीय सरकार शराब को नशा मानती है और इसके अनियंत्रित उपयोग से जुड़े स्वास्थ्य और सामाजिक खतरों को पहचानती है। शराब के अत्यधिक सेवन से स्वास्थ्य समस्याएँ, दुर्घटनाएँ, और सामाजिक समस्याएँ (जैसे घरेलू हिंसा, अपराध) हो सकती हैं। इसलिए, सरकार और स्वास्थ्य एजेंसियाँ शराब के दुरुपयोग के खतरों के बारे में जागरूकता अभियान भी चलाती हैं।

  4. शराब पर कर (Excise Duty): शराब से सरकार को भारी राजस्व प्राप्त होता है। इसे नियंत्रित करने और इसके दुरुपयोग को रोकने के लिए सरकार शराब पर भारी कर लगाती है। इस राजस्व का उपयोग स्वास्थ्य और सामाजिक कल्याण के कार्यक्रमों में किया जाता है।

शराब और अन्य नशीले पदार्थों में अंतर:

  • शराब भारत में कानूनी रूप से विनियमित है और इसका उत्पादन और बिक्री सरकार की अनुमति के तहत होती है।
  • अन्य नशीले पदार्थ जैसे हेरोइन, कोकीन, और गांजा का उपयोग, व्यापार, और उत्पादन अवैध है और इन पर सख्त कानून हैं।

इस प्रकार, शराब को एक प्रकार का नशा माना जाता है, लेकिन इसे नियंत्रित तरीके से उपभोग किया जा सकता है, जबकि अन्य नशीली दवाओं पर पूर्ण प्रतिबंध है।

नशीले पदार्थों की अवैध गतिविधि और वैध गतिविधि क्या है ?

 नशीले पदार्थों की अवैध गतिविधियाँ वे हैं जो कानून द्वारा निषिद्ध हैं और समाज के लिए गंभीर खतरों का कारण बनती हैं। इनमें नशीली दवाओं की तस्करी, गैरकानूनी उत्पादन, वितरण, और बिक्री शामिल हैं। इन गतिविधियों का मुख्य उद्देश्य मुनाफे के लिए दवाओं का अवैध व्यापार करना होता है, जिससे समाज में नशे की लत, अपराध, और हिंसा जैसी समस्याएँ बढ़ती हैं। तस्करी के रास्ते से यह पदार्थ आम तौर पर सीमाओं के पार भेजे जाते हैं और इससे कई देशों में राष्ट्रीय सुरक्षा पर भी असर पड़ता है।

दूसरी ओर, नशीले पदार्थों की वैध गतिविधियाँ वे हैं जो चिकित्सा, अनुसंधान, और वैज्ञानिक उद्देश्यों के लिए की जाती हैं। उदाहरण के लिए, मोर्फिन, कोडीन, और अन्य नियंत्रित दवाएँ अस्पतालों और फार्मेसियों में दर्द प्रबंधन और गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए इस्तेमाल की जाती हैं। इन्हें सरकार और चिकित्सा नियामक संस्थाओं द्वारा नियंत्रित और लाइसेंस प्राप्त संगठनों द्वारा ही बनाया और वितरित किया जा सकता है। यह पूरी तरह से कानून के दायरे में आता है और इनका उद्देश्य चिकित्सा लाभ प्रदान करना होता है।

अवैध और वैध के बीच का अंतर यह है कि जहां अवैध गतिविधियों का मकसद आर्थिक लाभ और सामाजिक नुकसान होता है, वहीं वैध गतिविधियों का उद्देश्य सार्वजनिक स्वास्थ्य और चिकित्सा लाभ होता है।

नार्को कोआर्डिनेशन सेंटर (एनकॉर्ड) uttarakhand

 नार्को कोआर्डिनेशन सेंटर (एनकॉर्ड) एक केंद्र सरकार की पहल है, जिसका उद्देश्य नशीली दवाओं के मामलों की प्रभावी जांच, रोकथाम, और नशीले पदार्थों के तस्करों के खिलाफ समन्वित कार्रवाई सुनिश्चित करना है। एनकॉर्ड का गठन गृह मंत्रालय (Ministry of Home Affairs) के अंतर्गत किया गया है। यह विभिन्न राज्यों के पुलिस, नारकोटिक्स विभाग, और अन्य संबंधित एजेंसियों के बीच तालमेल स्थापित करता है, ताकि नशीले पदार्थों की अवैध गतिविधियों को रोका जा सके।

उत्तराखंड में भी एनकॉर्ड की इकाइयाँ सक्रिय हैं, जो राज्य की सीमा से गुजरने वाली नशीली दवाओं के तस्करों पर नजर रखती हैं। उत्तराखंड की भौगोलिक स्थिति, जिसमें कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सीमाएं आती हैं, इसे नशीले पदार्थों की तस्करी के लिए एक संवेदनशील क्षेत्र बनाती है। एनकॉर्ड के तहत राज्य में विभिन्न स्तरों पर बैठकें आयोजित की जाती हैं, जहाँ पुलिस, नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB), और अन्य एजेंसियों के बीच समन्वय किया जाता है।

एनकॉर्ड के मुख्य कार्यों में शामिल हैं:

  1. तस्करी विरोधी कार्रवाई: नशीले पदार्थों की तस्करी को रोकने के लिए सुरक्षा एजेंसियों का समन्वय।
  2. सूचना साझा करना: राज्यों और केंद्र के बीच नशीली दवाओं के मामलों से संबंधित जानकारी का आदान-प्रदान।
  3. सतर्कता बढ़ाना: स्थानीय पुलिस और अन्य कानून प्रवर्तन एजेंसियों को नशीले पदार्थों के मामलों में सतर्क और प्रशिक्षित करना।
  4. नियंत्रण और रोकथाम: नशीले पदार्थों के इस्तेमाल और उसकी तस्करी के खिलाफ कदम उठाना।

उत्तराखंड में एनकॉर्ड का उद्देश्य राज्य के युवाओं को नशीली दवाओं के प्रभाव से बचाना और राज्य में कानून-व्यवस्था को बेहतर बनाए रखना है।

Monday, September 30, 2024

वृद्धावस्था को क्या दिव्यांगता में नहीं लाया जा सकता है ?

 वृद्धावस्था को अपने आप में दिव्यांगता नहीं कहा जा सकता, लेकिन यह एक ऐसी अवस्था होती है जिसमें अक्सर शारीरिक, मानसिक और संवेदी क्षमताओं में कमी आ सकती है। इस उम्र में लोग विभिन्न स्वास्थ्य समस्याओं से ग्रस्त हो सकते हैं, जैसे चलने-फिरने में कठिनाई, सुनने और देखने में कमी, या मानसिक क्षमताओं में गिरावट। हालाँकि, सभी वृद्ध लोग दिव्यांग नहीं होते, लेकिन उम्र के साथ शारीरिक चुनौतियाँ बढ़ सकती हैं, जिससे उन्हें विशेष सहायता की आवश्यकता हो सकती है।


दिव्यांगता का मतलब किसी व्यक्ति की शारीरिक या मानसिक क्षमता में दीर्घकालिक और महत्वपूर्ण कमी होती है। अगर वृद्ध व्यक्ति में कोई विशेष क्षमता की कमी होती है, जैसे चलने, सुनने या देखने की, तो उसे दिव्यांगता के अंतर्गत रखा जा सकता है। 


सरकार द्वारा भी वृद्धावस्था और दिव्यांगता को अलग-अलग श्रेणियों में रखा जाता है और दोनों के लिए अलग-अलग योजनाएँ बनाई जाती हैं।

Sunday, September 29, 2024

पेचकस (screwdriver) बदलने से परिणाम में बदलाव की संभावना

 पेचकस (screwdriver) बदलने से परिणाम में बदलाव की संभावना इसलिए होती है क्योंकि विभिन्न पेचकसों की डिज़ाइन, आकार और उपयोग करने का तरीका अलग होता है। उदाहरण के लिए:


1. **प्रकार का अंतर**: फ़िलिप्स और स्लॉटेड स्क्रू के लिए अलग-अलग पेचकस होते हैं। गलत पेचकस का उपयोग करने से स्क्रू सही तरीके से कसने या ढीला करने में समस्या हो सकती है।

   

2. **आकार**: अगर पेचकस का सिरा स्क्रू के सिर के आकार से मेल नहीं खाता है, तो यह स्क्रू को नुकसान पहुंचा सकता है या कसने-खोलने में मुश्किल पैदा कर सकता है।


3. **गुणवत्ता और सामग्री**: पेचकस की गुणवत्ता भी परिणाम को प्रभावित कर सकती है। सस्ते या कमजोर पेचकस से काम सही तरीके से नहीं हो पाता।


इसलिए, सही परिणाम प्राप्त करने के लिए स्क्रू के अनुसार सही प्रकार और आकार का पेचकस चुनना ज़रूरी है।

भलाई में पत्थर पड़ना एक कहानी की माध्यम से

 "भलाई में पत्थर पड़ना" एक कहावत है, जो अक्सर उस स्थिति को दर्शाने के लिए इस्तेमाल की जाती है जब कोई अच्छा काम करने की कोशिश करता है, लेकिन बदले में उसे कठिनाई या अपमान झेलना पड़ता है। इसे एक कहानी के माध्यम से समझाया जा सकता है:


**कहानी: दयालु किसान और भिखारी**


एक बार की बात है, एक छोटे से गांव में एक दयालु किसान रहता था। वह हमेशा दूसरों की मदद करने के लिए तैयार रहता था। एक दिन, किसान अपनी खेत से घर लौट रहा था, तभी उसने रास्ते में एक भिखारी को देखा, जो भूखा और थका हुआ था। भिखारी ने किसान से मदद की गुहार लगाई। किसान ने दया दिखाई और उसे अपने घर ले जाकर खाना खिलाया और आराम करने की जगह दी।


कई दिनों तक किसान ने भिखारी की पूरी देखभाल की। धीरे-धीरे भिखारी ने अपनी ताकत वापस पा ली और स्वस्थ हो गया। किसान ने सोचा कि अब भिखारी अपने रास्ते जाएगा, लेकिन भिखारी ने और दिन रुकने का आग्रह किया। किसान ने फिर से उसे अपने घर में ठहरने दिया।


काफी दिनों बाद, एक दिन जब किसान अपने खेत में काम कर रहा था, तो भिखारी ने किसान के घर में चोरी करने की योजना बनाई। जब किसान खेत से वापस आया, तो उसने देखा कि उसका सारा कीमती सामान गायब है और भिखारी भी कहीं नहीं दिख रहा था। किसान को बहुत दुख हुआ कि जिस व्यक्ति की उसने मदद की, उसी ने उसे धोखा दिया।


इस घटना से किसान को यह समझ में आया कि हमेशा भलाई का परिणाम अच्छा नहीं होता, कई बार लोग आपकी दया का गलत फायदा उठाते हैं। 


**शिक्षा**:

इस कहानी से यह सिखने को मिलता है कि कभी-कभी अच्छे कामों का बदला भी बुरा मिल सकता है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि हमें दूसरों की मदद करना बंद कर देना चाहिए। हर इंसान एक जैसा नहीं होता। 


यह कहानी "भलाई में पत्थर पड़ना" कहावत को सही रूप से दर्शाती है।

Saturday, September 28, 2024

सामाजिक कार्यकर्ता कैंसे संघठनों में परिवर्तन कैंसे ला सकता है

 सामाजिक कार्यकर्ता संगठनों में परिवर्तन लाने के लिए कई रणनीतियों और तरीकों का उपयोग कर सकते हैं। ये प्रयास संगठन के आंतरिक ढांचे, कार्यप्रणाली, मिशन और सामाजिक प्रभाव को बेहतर बनाने पर केंद्रित होते हैं। यहाँ कुछ प्रमुख तरीके दिए गए हैं जिनसे सामाजिक कार्यकर्ता संगठन में परिवर्तन ला सकते हैं:

1. संगठन की संरचना और नेतृत्व में सुधार

  • नेतृत्व में बदलाव: सामाजिक कार्यकर्ता संगठन में नेतृत्व के स्तर पर सुधार करने का प्रयास कर सकते हैं, जिससे अधिक जवाबदेही, पारदर्शिता और समावेशिता को बढ़ावा दिया जा सके।
  • टीम विकास: टीम के सदस्यों के कौशल और क्षमताओं का विकास करके संगठन की दक्षता को बढ़ाया जा सकता है। प्रशिक्षण और कार्यशालाएं इस दिशा में सहायक हो सकती हैं।
  • विविधता और समावेशन: सामाजिक कार्यकर्ता संगठन में विविधता को बढ़ावा देने का काम कर सकते हैं, जिससे विभिन्न पृष्ठभूमियों और अनुभवों वाले लोग निर्णय लेने की प्रक्रिया में शामिल हो सकें।

2. संवाद और जागरूकता फैलाना

  • सदस्यों और समुदाय के बीच संवाद: संगठनों में बदलाव लाने के लिए संवाद आवश्यक है। सामाजिक कार्यकर्ता संगठन के सदस्यों के साथ मिलकर संगठन के उद्देश्यों और प्रक्रियाओं पर चर्चा कर सकते हैं।
  • सामुदायिक जागरूकता: समुदाय को संगठनों के उद्देश्यों और योजनाओं के बारे में जागरूक करना आवश्यक है। सामाजिक कार्यकर्ता जनसमूह तक पहुँचकर उन्हें संगठन में सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरित कर सकते हैं।

3. संगठन के मिशन और उद्देश्य को फिर से परिभाषित करना

  • स्पष्ट विजन और मिशन: संगठन का स्पष्ट और दूरदर्शी मिशन आवश्यक है। सामाजिक कार्यकर्ता मिशन और उद्देश्य को बदलकर उन्हें अधिक प्रासंगिक और सटीक बना सकते हैं ताकि वह समाज की बदलती जरूरतों के अनुरूप हों।
  • लंबी अवधि की योजनाएँ: सामाजिक कार्यकर्ता संगठन के दीर्घकालिक लक्ष्यों को फिर से परिभाषित करने और नई दिशा निर्धारित करने के लिए रणनीतिक योजनाएं बना सकते हैं।

4. संसाधनों और निधियों का प्रभावी प्रबंधन

  • निधियों का सही उपयोग: सामाजिक कार्यकर्ता संगठन के संसाधनों का बेहतर प्रबंधन सुनिश्चित कर सकते हैं। इससे संगठन के कामकाज में अधिक पारदर्शिता और वित्तीय स्थिरता आ सकती है।
  • नई फंडिंग और पार्टनरशिप: नए फंडिंग स्रोतों की तलाश और महत्वपूर्ण साझेदारी स्थापित करके संगठन को और अधिक सशक्त बनाया जा सकता है।

5. संगठनात्मक संस्कृति में बदलाव

  • प्रोत्साहन और पुरस्कार प्रणाली: सामाजिक कार्यकर्ता संगठन के भीतर काम करने की संस्कृति को प्रेरित करने के लिए प्रोत्साहन और पुरस्कार प्रणाली को सुधार सकते हैं। इससे सदस्यों को अपने काम के प्रति और अधिक प्रेरणा मिलेगी।
  • समय पर आंतरिक सुधार: समय-समय पर संगठनात्मक सुधार और नीतियों का पुनरीक्षण संगठन के विकास के लिए आवश्यक होता है। सामाजिक कार्यकर्ता आंतरिक समस्याओं की पहचान कर समय पर सुधार कर सकते हैं।

6. तकनीक और नवाचार का उपयोग

  • डिजिटल परिवर्तन: संगठन के कामकाज में तकनीकी सुधार जैसे कि डिजिटल प्लेटफार्मों का उपयोग, डेटा प्रबंधन और संचार प्रक्रियाओं को सुधारने के लिए नवाचार ला सकते हैं।
  • सामाजिक मीडिया का उपयोग: सोशल मीडिया और अन्य ऑनलाइन साधनों का उपयोग करके संगठन की पहुंच और प्रभाव को बढ़ाया जा सकता है।

7. कानूनी और राजनीतिक प्रक्रियाओं का समर्थन

  • नीति सुधारों की वकालत: सामाजिक कार्यकर्ता सरकार और नीति निर्माताओं के साथ मिलकर संगठनों के लिए अनुकूल नीति सुधारों की वकालत कर सकते हैं। इससे संगठन को कानूनी और प्रशासनिक समर्थन प्राप्त होता है।
  • अधिकारिता और भागीदारी: सामाजिक कार्यकर्ता संगठन के सदस्यों और हितधारकों को अधिकारिता देकर उन्हें अधिक भागीदारीपूर्ण और सक्रिय बना सकते हैं।

सामाजिक कार्यकर्ताओं का प्रभाव संगठन के सदस्यों के बीच विश्वास और सामूहिक भागीदारी पर निर्भर करता है। परिवर्तन लाने के लिए कार्यकर्ताओं को सामूहिक दृष्टिकोण अपनाना पड़ता है ताकि संगठन अपने लक्ष्यों की प्राप्ति में और अधिक सक्षम हो सके।

न्यूज़ विचार और व्यव्हार

जब मीडिया सत्ता की ढाल बने, तब जनता की पत्रकारिता ज़रूरी

जब मीडिया सत्ता की ढाल बने, तब जनता की पत्रकारिता ज़रूरी लोकतंत्र के चार स्तंभों में मीडिया को इसलिए जगह दी गई थी ताकि वह सत्ता पर निगरानी र...